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Friday, September 23, 2022

समरकंद में रही धमक भारत की..............

देवेश प्रताप सिंह राठौर............

............. उज़्बेकिस्तान   के  समरकंद    अनेक क्षेत्रीय और वैश्विक निहितार्थ हैं। आने वाले दिनों में इस सम्मेलन की गूंज वैश्विक कूटनीति में महसूस हो सकती है। एक ही सम्मेलन में हमलावर रूस, साम्राज्यवादी चीन, अडिग ईरान, विशाल उभरते भारत और दर-दर मदद मांगते पाकिस्तान की मौजूदगी पर बहुत से देशों की नजर होगी। विशेष रूप से अमेरिका और नाटो के देशों की इस पर पैनी निगाह होगी। दूसरी ओर, एक हद तक अलग-थलग पडे़ पुतिन इन दिनों विश्व स्तर पर मंच खोज रहे हैं, जो उन्हें शंघाई सहयोग संगठन से बेहतर कहीं और नहीं मिल सकता। वह अवश्य दर्शाना चाहेंगे कि चीन और भारत जैसे विशालकाय देश उनके साथ खड़े हैं। लगभग 18 देशों के इस सहयोग संगठन को अपने खेलों का आयोजन करने की सलाह देकर पुतिन ने यह बताने की कोशिश की है कि इस संगठन का भविष्य उज्ज्वल हो सकता है। क्या आर्थिक सहयोग से आगे बढ़कर ये देश सोचने लगे हैं? क्या


इन देशों में आर्थिक सहयोग को लेकर कोई शिकायत नहीं रही? सच यह कि किसी भी अन्य प्रकार के सहयोग को विस्तार देने से पहले इस संगठन के देशों को ईमानदारी से आर्थिक सहयोग को मजबूत बनाना चाहिए।बहरहाल, शंघाई सहयोग संगठन  को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी एससीओ के सदस्य देश वैश्विक अर्थव्यवस्था में लगभग 30 प्रतिशत का योगदान देते हैं और विश्व की 40 प्रतिशत आबादी इन देशों में निवास करती है। भारत एससीओ सदस्यों के बीच अधिक सहयोग और आपसी विश्वास का समर्थन करता है। प्रधानमंत्री ने इन देशों के बीच बेहतर आपूर्ति शृंखला बनाने की यथोचित पैरवी की है। हालांकि, यह काम बहुत कठिन है। पाकिस्तान जहां हमें सामरिक रूप से तनाव दे रहा है, वहीं चीन के निशाने पर हमारी समग्र अर्थव्यवस्था भी है। यही कारण है कि चीन नीति के तहत भारत को आत्मनिर्भर बनने से रोकना चाहता है। चीन पहले से दुनिया का मैन्युफेक्चरिंग हब है और भारत अब उभरने की घोषणा कर रहा है। भारत का बाजार एससीओ के देशों में फैले, तो भारत को लाभ है। पर सच्चाई यह है कि दर-दर मदद मांग रहा पाकिस्तान भी भारत के प्रति अनुकूल रवैया रखने के लिए तैयार नहीं है। फिर सवाल यहीं आकर अटक जाता है कि भारत ऐसे संगठन से दिलोजान से कितना जुड़े, जिसके कुछ सदस्य देश आतंकवाद के प्रत्यक्ष या परोक्ष पक्षधर हैं?गौर कीजिए, चीन या पाकिस्तान के शासनाध्यक्षों के साथ प्रधानमंत्री मोदी की मुलाकात नहीं हुई है। प्रधानमंत्री ने इन दोनों देशों के नेताओं से दूरी बरतते हुए अपना साफ संदेश दे दिया है। बंदूकें और बातचीत एक साथ कैसे चले? भारत यदि चीन को आतंकवाद का दर्द दे रहा होता, तो चीन के नेता क्या करते? अत: हैरत की बात नहीं कि समरकंद में मंच पर मोदी और जिनपिंग अगल-बगल ही खड़े दिखे, पर दोनों ने हाथ तक नहीं मिलाए और न मुस्कराए। यह दूरी तो चीन को ही दूर करनी पड़ेगी। क्या रूस इसके लिए चीन को मनाएगा और चीन आगे बढ़कर पाकिस्तान को सही राह दिखाएगा? वैसे विश्व राजनय में ऐसी भावुक उम्मीदों का स्थान नहीं होता, ज्यादातर देश या कारगर संगठन आर्थिक स्वार्थ से ही संचालित होते हैं। भलाई इसी में है कि भारत भी अपने आर्थिक हित को सबसे ऊपर रखे और आतंकवाद पर अपनी नाखुशी का इजहार करते हुए दबाव बनाए रहे।

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