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Sunday, August 7, 2022

हजरते हुर्र अलैहिस्सलाम पर नाज करती है शहादत

दौलत व ओहदे को ठोकर मार हुर्र ने दिया हुसैन का साथ 

फतेहपुर, शमशाद खान । मोहर्रम का पर्व गम का पर्व है। इसी माह में कर्बला का वाक्या पेश आया। यजीद अपनी ताकत के बल पर हजरत इमाम हुसैन पर दबाव बना रहा था कि वह उसके बातिल हांथ पर बैत कर लें। उसका मकसद था कि हजरत इमाम हुसैन अगर उसके दस्ते बातिल पर बैत कर लेंगें तो इस्लाम को आसानी से मिटाया जा सकता है और इस तरह उसके अजदाद जो जंग में मारे गये थे उसका बदला लिया जा सकता है। जिसके चलते वह हजरत इमाम हुसैन पर बैत होने का दबाव बना रहा था। हजरत इमाम हुसैन ने कर्बला के मैदान भूखे-प्यासे रहकर शहादत कबूल कर ली, लेकिन उसके हांथ पर बैत नहीं किया। 


यजीदी फौज के सिपहसालार हजरत हुर्र अलैहिस्सलाम थे। जिन्हें यजीद ने भारी फौज के साथ इमाम हुसैन से जंग करने पर मामूर किया था। हजरते हुर्र नेक दिल पाकीजा ख्याल और पाकीजा और मुकद्दस जात का साथ देने वालों में से थे। इमाम हुसैन से जंग के लिये जब वह भेज दिये गये तो दरिया के चारों तरफ फौजियों का पहरा था और आप कई दिनों से भूखे-प्यासे थे। हजरत इमाम हुसैन अपने खेमें बेचैनी से टलह रहे है। आपके साथियों में भी बेचैनी है। सभी इमाम हुसैन की बेचैनी का सबब जानना चाह रहे है। हिम्मत करके पूछा गया कि या हजरत आज इतनी बेकरारी क्यों है। जवाब मिला कि हुर्र का इंतेजार है। उधर यजीद की फौज में भी बड़ी बेकरारी थी कि हुर्र हमला क्यों नहीं कर रहे है। बार-बार खुफिया यजीद को हुर्र के रवैये की जानकारी दे रहे थे। यजीद ने पैगाम भी भेजा था कि हमला किया जाये। बड़े-बड़े तोहफे और पदोन्न्ति से नवाजा जायेगा। इधर हुर्र अलैहिस्सलाम भी बेकरारी से टहल रहे है। हिम्मत करके पूछा गया कि आप हमला क्यों नहीं कर रहे है और इतनी बेचैनी से क्यों टहल रहे है। हजरते हुर्र ने जवाब दिया कि हुर्र अपने आपको जन्नत और दोजख के बीच पाता है। फैसला नहीं कर पा रहा है कि क्या करे। एक तरफ दौलत और बड़े-बड़े इनामात है। बड़े-बड़े ओहदे है। हीरे जवाहरात है, लेकिन दूसरी तरफ भूख अफलास है। यह जवाब देने के बाद हजरत हुर्र अलैहिस्सलाम ने एक फैसला लिया और घोड़े पर बैठकर ऐड़ दी और हजरत इमाम के कदमों में जा गिरे। आपने बड़ी मोहब्बत से उनको सीने से लगा लिया और जंग में लड़ने की इजाजत दे दी। हजरत हुर्र अलैहिस्सलाम यजीद की फौज से लड़ते हुए शहीद हो गये। जिस वक्त आपकी शहादत हो रही थी और तीरों छलनी जिस्म के साथ आप हजरत इमाम के पास गये तो इमाम हुसैन ने आपको अपने जानूं पर लिटा लिया। आपने हजरत इमाम हुसैन को हसरत से देखा और अल्लाह से जा मिलें। हजरत हुर्र अलैहिस्सलाम की कुर्बानी इसीलिये बड़ी मशहूर है। क्योंकि आपने हक का दामन थाम लिया और बातिल यजीद का साथ छोड़ दिया। जबकि आपको उसने बड़े-बड़े ओहदे का लालच भी दिया, लेकिन आपने हक पर कुर्बान होकर जिंदा जावेद हो जाना बेहतर समझा। बातिल का साथ देकर दौलत और ओहदे तो मिल जाते, लेकिन सब कुछ आरजी होता। जहां दुनिया खत्म होती सब कुछ खत्म हो जाता। इसीलिये आपने इमाम हुसैन के खैमे की ओर जाना ही बेहतर समझा।


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