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Friday, August 5, 2022

फिक्र हर सोज यहां काश्त नहीं कर सकती........

इतिहास के पन्नो में मोहर्रम की सात तारीख

फतेहपुर, शमशाद खान । मोहर्रम के महीने की सात तारीख कर्बला के प्यासों की याद तथा हजरत इमाम हुसैन (अ.) के भाई हजरत इमाम हसन (अ.) के पुत्र हजर कासिम की शाहदत के रूप में मनाई जाती है। आज की मजलिसों में वक्तागण विशेषतः इन्ही दोनों तथ्यों का वर्णन करते हैं। वाक्यात इस तरह है जब शिम्र ने चार मोहर्रम को फरात नदी पर पहरा लगाकर नवासए रसूल उनके परिवार व साथियों पर पानी बंद कर दिया तो इन लोगों के पास मश्कों में जितना पानी था वह दो दिन तक चला किन्तु सात मोहर्रम को हुसैन (अ.) के किसी भी खेमे में पानी नहीं रह गया और बच्चे प्यास से रोने व बिलखने लगे। हर तरफ से अल अतश (प्यास) की आवाजें आने लगी थीं। इन बच्चों में मुख्य रूप से इमाम की छोटी चार साला बच्ची सफीना थीं जो बार-बार पानी-पानी कहकर रो रही थीं, किन्तु यजीद की क्रूर फौज ने उनको पानी नहीं दिया और उन्हें देख-देख कर हंसते व व्यंग करते थे। इसी की याद


स्वरूप सात मोहर्रम को जगह-जगह ठंडे पानी की सबीलें रखी जाती हैं और यह आवाज लगायी जाती है भूलो न तशनगी को शेह तश्ना काम की प्यासों पियो सबील यह नजरे इमाम है। सात मोहर्रम का दिन हजरत इमाम हुसैन के बड़े भाई के पुत्र जनाबे कासिम के बलिदान के यादगार स्वरूप मनाया जाता है और उनकी याद में ताबूत हजरत कासिम (पलंग) का जुलूस निकाला जाता है। हजरत कासिम की आयु कर्बला में मात्र 13 वर्ष थीं और वह इतने सुंदर थे कि उन्हें बनी हाशिम में गुलबदन (फूल रूपी बदन) की उपमा दी जाती थी। इमाम हुसैन अपने इस भतीजे को बहुत प्यार करते थे। नौ मोहर्रम की रात्रि जब वह निश्चित हो गया कि कल युद्ध होगा और इमाम हुसैन व उनके साथियों को शहीद किया जायेगा तो अपने अपने भाई की वसीयत के कारण अपनी पुत्री फात्मा कुबरा की शादी निकाह पढ़कर कर दिया। इस प्रकार हजरत कासिम दामादे इमाम भी हो गये। सुबह जब युद्ध आरंभ हुआ और इमाम हुसैन के परिवार के जवान व बच्चे अपनी बलि देने लगे तो हजरत कासिम भी अपने चचा के पास आए और युद्ध करने की आज्ञा मांगी। इमाम यह सुनकर दुखी हुए और आज्ञा नहीं दी। बार-बार आज्ञा मांगने पर इमाम हुसैन ने जब आज्ञा दी तो वह मैदान में आये। इनसे युद्ध करने के लिये एक देव सा व्यक्ति अरजके शामी निकला किन्तु हजरत कासिम विचलित नहीं हुए, उससे मुकाबला किया और उसे मार गिराया। यह देखकर शत्रु की फौज ने आक्रमण कर इन्हें चारो तरफ से घेर लिया और हमला करने लगे। अंत में हजरत कासिम लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। इमाम हुसैन व उनके भाई हजरत अब्बास (अ.) ने जब अपने भतीजे को दुश्मनों से घिरा देखा तो दोनों ने दोनों ओर से आक्रमण कर दिया, जिससे दुश्मन की फौज में भगदड़ मच गयी और हजरत कासिम की लाश घोड़ों के टापों से कुचल कर टुकड़े-टुकड़े हो गई। 


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