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Sunday, August 28, 2022

प्रतिष्ठित व्यास सम्मान से नवाजे गए असगर वजाहत

फतेहपुर, शमशाद खान । जनपद का नाम पूरी दुनिया में रोशन करने वाले असगर वजाहत को उनके नाटक महाबली पर बेहद प्रतिष्ठित व्यास सम्मान से उन्हें नवाजा गया।असगर वजाहत ने कहा कि तुलसीदास जी के जीवन पर आधारित उनके नाटक महाबली पर 25 अगस्त को प्राप्त हो रहा पुरस्कार व्यास सम्मान उनकी बड़ी उपलब्धियों में एक है क्योंकि उन्होंने इस नाटक की रचना कर अपने को धन्य पाया है। एक बातचीत में प्रख्यात लेखक ने बताया कि महाबली हिंदी के महाकवि तुलसीदास के जीवन के दो प्रसंगों से प्रेरित नाटक उन लोगों के लिए विशेष महत्त्व रखता है जो तुलसीदास और उनके महाकाव्य रामचरित मानस में रुचि रखते हैं। रामचरित मानस का उत्तर भारत के समाज में एक विशेष महत्व है।उत्तर भारत के लोग संसार में जहां-जहां गए हैं वे अपने साथ रामचरितमानस ले गए हैं।इस कारण राम की कथा का अंतर्राष्ट्रीय महत्व है।तुलसीदास के समय में राम कथा केवल संस्कृत भाषा में उपलब्ध थी।तुलसीदास ने राम कथा को लोकप्रिय बनाने के लिए उसे जन भाषा अवधी में लिखने का बीड़ा उठाया।उस समय संस्कृत जानने वाले पंडितों ने तुलसीदास के इस प्रयास का विरोध किया

असगर वजाहत को व्यास सम्मान सौंपते अतिथि।

क्योंकि उन्हें लगा कि यदि राम कथा जन भाषा में आ जाएगी तो उनका महत्व कम हो जाएगा।तुलसीदास ने अपने समय के बहुत सशक्त सत्तापक्ष के विरोध का सामना करते हुए राम कथा को जन भाषा में लिखा।इसका अर्थ यह है कि उन्होंने एक विचार का लोकतांत्रिकरण किया।यह पक्ष नाटक में बहुत रोचक और नाटकीय ढंग से सामने आता है।नाटक का दूसरा पक्ष तुलसीदास और राज सत्ता के संबंधों पर केंद्रित है।तुलसीदास दूसरे समकालीन कवियों की तरह राज आश्रय में कभी नहीं गए।16 वीं शताब्दी में तुलसी का समकालीन मुगल सम्राट अकबर था जिसे यह जुनून था कि देश के सभी प्रतिभावान लोगों को अपने दरबार में जमा कर ले।इतिहास यह प्रमाणित नहीं करता कि अकबर ने तुलसीदास को दरबार में आने का निमंत्रण दिया था लेकिन यह प्रमाणित होता है कि अकबर राम कथा और तुलसीदास से अच्छी तरह परिचित था क्योंकि उसने सोने का एक सिक्का ढलवाया था जिस पर राम और सीता का चित्र बना हुआ था।यह सिक्का राम टका कहलाता था।अब्दुल रहीम खानखाना और राजा टोडरमल दो ऐसे व्यक्ति थे जो अकबर के नवरत्न भी थे और तुलसीदास के मित्र भी थे।नाटक में यह कल्पना की गई है कि अकबर ने उनके माध्यम से तुलसीदास जी को राज दरबार में बुलाया था लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया। बातचीत में बताया कि करीब चार-पांच साल काम करने और अनेक मित्रों के सहयोग सेमहाकवि तुलसीदास पर केंद्रित नाटक महाबली पूरा हो गया है।इस नाटक के एक अंश का पाठ करीब एक साल पहले साहित्य अकादमी,दिल्ली में किया गया था।नाटक में तुलसीदास के जीवन के दो पक्षों को मुख्य रूप से सामने रखा गया है।पहला पक्ष विचार का लोकतांत्रीकरण है और दूसरा पक्ष राज सत्ता और कला के संबंधों पर केंद्रित है।16वीं शताब्दी में कुछ बड़े आदर्शों और मानवीय मूल्यों को जनसाधारण तक ले जाने का काम कोई सरल काम नहीं था।भीषण विरोध के बाद भी तुलसीदास ने इसे किया था। राज सत्ता के साथ उनके कोई संबंध नहीं थे और इस बात के प्रमाण भी नहीं मिलते कि राजसता ने कभी उन्हें आमंत्रित किया हो।लेकिन उस समय के शासक सम्राट अकबर तुलसीदास से अपरिचित भी नहीं रहे होंगे क्योंकि इसका प्रमाण वह राम टका सोने का सिक्का है जो तुलसी युगीन सम्राट अकबर ने जारी किया था।


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