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Thursday, July 21, 2022

राजनीति में परिवारवाद ले डूबा श्रीलंका को..................................................

देवेश प्रताप सिंह राठौर

      श्रीलंका आज आपात स्थिति में है तो इसके पीछे कर्ज, खराब अर्थव्यवस्था ही नहीं कई राजनीतिक कारण भी जिम्मेदार हैं, श्रीलंका की राजनीति में भाई भतीजावाद चरम पर पहुंच गया है, जिसकी कीमत देश को चुकानी पड़ रही है दक्षिण एशिया में, कोई दूसरा राजनीतिक वंश इतना आत्मविश्वास से भाई-भतीजावादी नहीं कर रहा जितना राजपक्षे परिवार कर रहे हैं,  श्रीलंका में बिगड़े हालात पर काबू पाने के लिए सरकार ने जिस तरह के कदम उठाने की घोषणा की है, उससे जनता के उग्र प्रदर्शनों को दबाने में तात्कालिक तौर पर मदद मिल सकती है। मगर सवाल है कि जिन नीतियों और फैसलों की वजह से श्रीलंका इस दशा में पहुंच गया है, क्या जनता पर सख्ती उसका समाधान है? आखिर राष्ट्रपति को देश छोड़ कर भागने की नौबत आई, तो इसके पीछे इतनी बड़ी वजह तो होगी ही कि वे जनता और उसके सवालों का सामना करने में खुद को समर्थ नहीं पा रहे थे।श्रीलंका फिलहाल जिस तरह के उथल-पुथल से गुजर रहा है, उससे समझा जा सकता है कि वहां की सत्ता कैसे अदूरदर्शी नेताओं के हाथ में कैद रही। उनकी लगातार अहं में जकड़ी जिद और मनमानी नीतियों का ही नतीजा है कि देश की आम जनता को वहां की सरकार के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंकना पड़ा। पहले वहां लोगों ने राष्ट्रपति भवन पर कब्जा कर लिया


और प्रधानमंत्री के आवास में आग लगा दी। ताजा खबर यह है कि खुद राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे सैन्य विमान से मालदीव भाग गए, जबकि उन्होंने तेरह जुलाई को इस्तीफा देने की घोषणा की थी।किसी भी देश के शासक को इस बात का अहसास हो जाना चाहिए कि वहां जो नीतियां लागू की जा रही हैं, उनका असर क्या पड़ेगा। जब गोटबाया राजपक्षे श्रीलंका की सत्ता पर संपूर्ण नियंत्रण अपने पास केंद्रित कर रहे थे, आर्थिक मसलों पर बिना किसी की सहभागिता और अन्य पक्षों से विचार-विमर्श के फैसले ले रहे थे, तब क्या उन्हें इस बात का अंदाजा नहीं था कि इसके नतीजे क्या होने वाले हैं? अब आज श्रीलंका में हालात पूरी तरह हाथ से निकल गए हैं, वहां पेट्रोल या डीजल तो दूर, लोगों के सामने भोजन तक संकट खड़ा हो गया है तो इसके लिए क्या उनका रुख ही मुख्य रूप से जिम्मेदार नहीं है?

देश के संसाधनों के समुचित उपयोग के जरिए आत्मनिर्भरता की जमीन मजबूत करने के बजाय अंतरराष्ट्रीय बैंकों या अन्य देशों के कर्ज के जाल में फंसा कर किसका हित किया जाता है? किसी भी स्थिति में लिए गए कर्ज का भुगतान किसे और किस रूप में करना पड़ता है? दरअसल, श्रीलंका इस बात का साक्षात उदाहरण है कि पद हासिल करने के बाद निजी महत्त्वाकांक्षाओं के लिए कैसे कोई नेता समूचे देश को अपनी अदूरदर्शिता के झंझावात में झोंक देता है। लापरवाही से भरे नीतिगत फैसलों और कई स्तरों पर लिए गए कर्ज ने श्रीलंका को इस दशा में पहुंचा दिया कि लोगों को अराजक होने के अलावा कोई रास्ता नहीं दिखा। फिलहाल विपक्ष ने वहां रानिल विक्रमसिंघे को कार्यवाहक राष्ट्रपति मानने से इनकार कर दिया है।अब वहां सर्वदलीय सरकार का गठन करके जनता के आक्रोश को थामने और समाधान की कोई राह निकालने की कोशिश हो रही है, लेकिन सवाल है कि आर्थिक मोर्चे पर देश की जो दशा हो चुकी है, उसका हल तुरंत कैसे निकलेगा? तात्कालिक तौर पर अन्य देशों या अंतरराष्ट्रीय संस्थानों से मदद लेकर स्थिति संभालने की कोशिश हो सकती है, लेकिन अगर फिर से और कर्ज को ही हल के तौर पर देखा जाता है तो क्या वह संकट का एक नया जाल नहीं होगा!श्रीलंका की आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो चली है कि वहां की जनता त्राहिमाम कर रही है। इन सबसे परेशान हो कर आज जनता ने विद्रोह कर दिया और सड़कों पर उग्र प्रदर्शन करने लगें। हजारों की संख्या में श्रीलंका के नागरिक सड़कों पर उतर आएं और उग्र प्रदर्शन करने लगें। प्रदर्शनकारियों ने कोलंबों स्थित राष्ट्रपति भवन को घेर लिया और तोड़-फोड़ करने लगे। हालत बिगड़ता देख श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे अपना आवास छोड़कर भाग गए। लेकिन क्या आपको पता है कि श्री लंका का यह हाल कैसे हुआ। इससे पहले श्रीलंका की ऐसी हालत कभी नहीं रही। हम आपको यहां बतएंगे कि कैसे इस देश को यहां के राजनीतिज्ञों ने मिलकर खोंखला किया। देश के आर्थिक स्थितियों का सीधा कंट्रोल वहां की सरकार के पास होती है। अभी इस हालत की जिम्मेदार वहां के सरकार में बैठे राजपक्षे परिवार है। जिन्होंने मिलकर श्रीलंका की लुटिया डुबा दी। श्रीलंका को भुखमरी के कागार पर ला कर खड़ा कर दिया। श्रीलंका के आर्थिक संकट का जिम्मेदार राजपक्षे परिवार कैसे बना यह हम आपको बताएंगेश्रीलंका में सरकार में राजपक्षे परिवार के पांच लोग शामिल थे। इनमें राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे, प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे, वित्त मंत्री बासिल राजपक्षे, सिंचाई मंत्री चामल राजपक्षे और खेल मंत्री नामल राजपक्षे थे। इन सबके पास सरकार के सबसे शक्तिशाली पद थे। ये जो चाहते श्रीलंका में वहीं होता था। इनमें से गोटबाया को छोड़कर बाकी सबने इस्तीफा दे दिया था। बस गोटबाया राजपक्षे ही थे जो सरकार में अभी तक टिके हुए थे। राजपक्षे परिवार पर यह आरोप है कि उन्होंने 5.31 अरब डॉलर यानी 42 हजार करोड़ रुपए अवैध तरीके से देश से बाहर अपने खाते में डालवाया है। हो भी क्यों न आखिर राजपक्षे परिवार के पास श्रीलंका के नेशनल बजट के 70% पर सीधा इनकी पकड़ थी। इनके हाथों में वहां के तिजोरी की चाभी हुआ करती थी। इन सब में हाथ था महिंदा राजपक्षे के करीबी अजित निवार्ड कबराल का जो सेंट्रल बैंक ऑफ श्रीलंका के गवर्नर थे। इन 5 पंचों ने लंका को बर्बाद कर दिया राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे, प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे, वित्त मंत्री बासिल राजपक्षे, सिंचाई मंत्री चामल राजपक्षे और खेल मंत्री नामल राजपक्षे यह श्रीलंका परिवारवाद फल फूल रहा था जिस देश में परिवारवाद चलता है उस देश की राजनीति समीकरण और देश का विकास ना के बराबर होता है तथा उस देश की जनता महंगाई और आर्थिक रूप से टूट जाती है,और अन्य प्रकार के देश के अंदर कार्यों के प्रति विकास के प्रति बिल्कुल ही ठप हो जाता है और जनता काफी परेशान रहती है।

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