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Friday, June 10, 2022

कृषि परिस्थिति के अनरूप ही अपनानी होगी खेती बाड़ी की तकनीक

फतेहपुर, शमशाद खान । जनपद कृषि के लिए ऐसा जनपद है जहां गंगा यमुना के दोआबा के साथ ऊसर, बीहड़ एवं सिंचित, असिंचित क्षेत्र की खेती होती है। कृषि विज्ञान केन्द्र ने कृषि परिस्थिति के अनरूप खेती बाडी की तकनीक को विकसित किया है। जिसे जानकर खेती करने की आवश्कता है।

कृषि विज्ञान केन्द्र थरियाँव की वैज्ञानिक डा. साधना वैश प्रभारी अधिकारी के नेतृत्व में जनपद में खरीफ फसलों के लाभकारी उत्पादन हेतु तकनीकी सुझाव दिए जा रहे हैं। किसी भी जनपद का विकास जनपद की खेती विकसित होने पर निर्भर होता है। जनपद में यदि खेती अच्छी होती है तो विविधीकरण के साथ व्यस्त खेती होती है तथा पूरे जनपद का विकास समन्वित होता हैं। अच्छी खेती की होड़, प्रतिस्पर्धा एवं खेती में रुझान बढने से लोग आर्थिक रुप

किसानों को तकनीक समझाते कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक।

से मजबूत तो होते ही है सामाजिक विकास भी होता है। आज की खेती में सबसे अधिक ध्यान देने की आवश्कता हैं ’भूमि’ के घटते ’स्वास्थ्य’ जिसमे सबसे अधिक चिन्ताजनक धान-गेहूं फसल चक्र की खेती वाला क्षेत्र हैं। धान-गेहूँ फसल चक्र की खेती में जीवांश कार्बन स्तर की गिरावट तथा भूमि की भौतिक, रासायनिक एवं जैविक तीनो दशा असंतुलित हो रही है। जनपद में मुख्य छह कृषि परिस्थितिकीय हैं। सभी की वर्तमान स्थित अलग-अलग है। सभी क्षेत्रों में अलग-अलग संभावनाए हैं तथा जनपद की छह प्रकार की खेती की स्थिति के अनरूप तकनीकी प्रबंधन, निवेश व संसाधन की आवश्यकता को जानना होगा और उसी के अनरूप प्रदर्शन, प्रशिक्षण, योजनाओं का क्रियान्वयन तथा बीज, उर्वरक व दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करनी होगा। जनपद में धान-गेहूँ की खेती के साथ गंगा किनारे का क्षेत्र, ऊसर भूमि का क्षेत्र ढालू भूमि आदि क्षेत्र है। इन क्षेत्रों में प्रथम आवश्कता है भूमि व खेत की मिट्टी का संरक्षण तथा भूमि की भौतिक, रासायनिक, जैविक तीनों दशाओं को मजबूत करना। ये तीनो दशाओं को संतुलित करने के लिए कई तकनीकी प्रबंधन एवं विधाए हैं लेकिन उसमे तुरंत कारगर उपाय ढेचा की हरी खाद बहुत ही लाभकारी है। इसके पूर्ब कई गोष्ठियों, प्रशिक्षण के साथ समाचार पत्रों के माध्यम से ढेचा की हरी खाद खेत में पलटने की सलाह दी जा रही है। धान की रोपाई के पूर्व 45-50 दिन के ढेंचा की हरी खाद पलटने की सलाह दी जा रही हैं। ढेचा हरी खाद पलटकर तुरंत धान की रोपाई करे तथा यूरिया की मात्रा आधी कर दे। धान की खेती में रोपाई व रोपाई के बाद की तकनीकी को जाने और लागू करे। धान के खेत के चारों मेड के किनारे ढेचा बोकर बीज तैयार करें। धान के खेत के मेड पर अरहर बोकर दाल से स्वावलंबी बने। खेती को आय परक बनाने हेतु कृषि विज्ञान केन्द्र से तकनीकी प्राप्त कर खेती करने तथा योजनाएं संचालित होने से खेती लाभकारी होगी। प्रभावी किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ), प्रसार कार्यकर्ताओं को किसानों तक तकनीक पहुंचाने हेतु तकनीक दक्षता एवं सम्प्रेषण कौशल में प्रशिक्षित करने हेतु माड्यूल तैयार किया गया है। विभाग प्रशिक्षण आयोजित कराकर प्रसार कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करा सकते हैं।


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