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Wednesday, May 11, 2022

कार्यपालिका सही कार्य करें, न्यायपालिका जाने की जरूरत नहीं है..

 देवेश प्रताप सिंह राठौर 

(वरिष्ठ पत्रकार)

................ कार्यपालिका कार्य के प्रति संवेदनशील नहीं है जिस कारण लोग न्यायपालिका की शरण में जाते हैं इसलिए न्यायपालिका में मुकदमे और केसों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है,देश की बात हो या राज्य की बात हो प्रश्न उठते हैं कि न्यायपालिका में केस पेंडिंग है, न्याय मिलने में विलंब होता है, केस और मुकदमों की संख्याएं अधिक हैं, जजों जजों की संख्या कम है, कोर्ट कचहरी में केसों की संख्या अधिक होने के कारण तारीख पर तारीख चलती है और जब किसी विभाग कार्यपालिका के किए गए कार्यों के संदर्भ में जब कभी कोर्ट तारीख पर उसको कागज एवं जवाब दावा सबमिट करने के लिए समय दिया जाता है तो वहां से प्रार्थना पत्र पहुंच जाता है तारीख आगे की दे दी जाए इसी तरह तारीख आगे लेते लेते कहते हैं, परेशान कौन होता है कर्मचारी होता है वह साधारण व्यक्ति होता है , कर्मचारी पास परिवार के विषय में सोचना है और उसे भी निभाना है, उसके सामने रोजी-रोटी की भी परेशानी है हर तरफ से परेशानियों के बावजूद वह न्याय के लिए दर-दर भटकता है, जब कभी हम सोचते हैं और लोग तुरंत उंगली उठाने लगते हैं,दोष देने लगते हैं कोर्ट को जबकि कार्यपालिका मुख्य दोषी है, 


इस देश में कार्यपालिका अपना कार्य राज्य की सरकारें हो या किसी विभाग के कार्य हो चाहे पुलिस प्रशासन हो ,चाहे थाना हो, चाहे सरकारी विभागों, चाहे जिले के जिलाधिकारी हो, चाहे जिले के अधीनस्थ सरकारी विभाग हो,चाहे पुलिस अधीक्षक हो वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक , कोतवाली ,थाना हो, चुकी हो बहुत सी समस्याएं ऐसी ही होती है जिनका निस्तारण वहीं पर हो सकता है जो वहां पर ही निस्तारण हो सकती हैं अगर यह लोग ईमानदारी के साथ कार्य करें परेशान ना करें जनता कब कोर्ट में जाती है जब उसे कार्यपालिका से न्याय नहीं मिलता है चक्कर काटते काटते उसकी चप्पल घिस  जाती है, मजबूर हो कर कोर्ट का सहारा लेता है।


दूसरी बात और आपके सामने रखना चाहता हूं जो एक बहुत ही लोगों की और जिला प्रशासन की सोच बन चुकी है वह आज से नहीं पूर्व से चली आई है जहां पर क्राइम नहीं होता है अपराध नहीं होते हैं उस जिले में अधिकारियों की खाओ कमाओ नीत कम होती है इसलिए कार्यपालिका अधिकतर कार्यों का निस्तारण नहीं करती क्योंकि लीगल भी है उसके बावजूद भी उसे परेशान किया जाता है उस स्थिति में वह कहां जाए उसके पास एक ही विकल्प बचता है वह है देश की सर्वोच्च पावरफुल शक्तिमान ताकतवर न्याय करने वाली न्यायपालिका जिसे हमकहते हैं।


जब कोई व्यक्ति किसी विभाग या किसी संस्थान के विरुद्ध न्यायपालिका की शरण में जाता है वह व्यक्ति अकेला होता है और जिस संस्था जिस कर्मचारी जिस विभाग के खिलाफ मुकदमा उत्पीड़न का दर्ज करता है, उसके पास पूरे लीगल डिपार्टमेंट है सरकारी तंत्र है ऐसी स्थिति में क्या जल्दी किसी को न्याय मिल सकता है।


बहुत से हमने मुकदमे और केस देखा है लोअर कोर्ट ने जिला स्तर को कोर्ट ने केस को निर्णय सुनाया इमानदारी के साथ और उस विभाग के लोग हाई कोर्ट चले गए क्योंकि उनके पास तो सरकारी तंत्र है लीगल विभाग है और आने जाने का ta-da सब बनता है, इस तरह के मुकदमे तो 10 वर्ष से तारीख पड़ती है, न्यायपालिका इतना अपना रुतबा उसमें रखता है तारीख आसानी से ले लेकर आगे बढ़ाता रहता है, फर्क तो उस व्यक्ति की जिंदगी में पड़ता है उस परिवार एक एक पैसे के लिए मोहताज हो जाता है जब कार्यपालिका कोर्ट में जवाब दावा अन्य चीजों को प्रस्तुत करने में सालों लगा देते हैं ,कोर्ट में कार्यपालिका के अधिकारी जवाब नहीं पेश करते हैं तारीख पर तारीख चलती है सालों जब अधिक हो जाता है तब कोर्ट थोड़ा  सख्त होती है उसी समय उनके सवाल जवाब और जवाब दावा पहुंच जाते हैं, कोर्ट के पास ,और यह सब समय 10 वर्षों का समय सिर्फ आने जाने में ही चला जाता है उसके बाद सुनवाई होती है फिर निर्णय होता है तब तक उसका रिटायरमेंट करीब आ जाता है,और बहुत से लोग ऐसे हैं क्यों मुकदमे लड़ते हैं लड़ते रहते हैं और रिटायर भी खो जाते हैं परंतु सर्विस के केस चलते रहते हैं , और बहुत से लोगों की जीवन लीला भी समाप्त हो जाती है केस नहीं खत्म होता, मैंने देखा है केस लड़ने वाले व्यक्ति के व्यक्ति बर्बाद हो जाते हैं उसके बाद केश रूटीन में चलना शुरू होता है, जब व्यक्ति कार्यपालिका से न्यायपालिका में  जाता है और वह व्यक्ति  निरंतर कोर्ट में जाकर अपनी दरखास्त देता रहता है ,तब कहीं सुनवाई होती है क्योंकि कार्यपालिका जो है वह बहुत मजबूत पक्ष होता है, झूठ फरेब उनके पास समूह के रूप में मौजूद रहता है,लोग सिर्फ इसी की तनख्वाह पाते हैं, जो लीगल केस को ही हैंडल करते हैं, और उस व्यक्ति के पास क्या है परिवार को पालन पोषण करना नौकरी भी चली गई मुकदमा लड़ना वकील की फीस भी देना और धक्के खाना ठोकर खानातथा यह भी पता नहीं कि हम केस जीतेंगे कि नहीं फिर भी आंसू न्यायपालिका के भरोसे केस लड़ता है ईश्वर उस व्यक्ति का सबसे बड़ा जज होता है, और सत्य परेशान होता है पराजित नहीं यह सत्य है, इन सब का दोषी कौन है कार्यपालिका कार्यपालिका अगर नीचे से ही निर्णय की  व्यवस्था तय कर ले तो न्यायपालिका में कोई भी केस ना जाएं सारे ईमानदारी के साथ  कार्य जिला प्रशासन और कार्यपालिका मन में सोच ले मुझे लगता है बहुत से केस का निस्तारण हो सकता है ,समस्याओं का निस्तारण हो सकता है और जब आदमी को अपनी बात कहने पर दोनों पक्षों की बात सुनने पर जब हमें कार्यपालिका जिला प्रशासन न्याय दे दे तो मुझे लगता है कोई भी व्यक्ति न्यायपालिका की शरण में नहीं जाएगा।

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