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Wednesday, April 13, 2022

साधना अभिशाप को वरदान और भावना पत्थर को बना देती है भगवान

धर्म के प्रचार को कलयुग में अवतरित चैतन्य महाप्रभु ने हरे कृष्ण महामंत्र का दिया संदेश

विश्व बंधुत्व की भावना से ओतप्रोत हैं ‘राम’

चित्रकूट, सुखेन्द्र अग्रहरि। राष्ट्रीय रामायण मेला के 49वें समारोह में अन्तर्राष्ट्रीय श्रीकृष्ण भावनाम्रत संघ थाईलैण्ड के शिवाराज साही ने भगवान श्रीकृष्ण और श्रीराम के बारे में बताया कि कलयुग में मानव के कल्याण के लिए शास्त्रों में वर्णित एक मात्र साधन है हरि नाम संर्कितन जो कलयुग का युग धर्म है। श्रीमद्भागवतम के अनुसार इस युग धर्म का प्रचार करने को स्वयं भगवान श्रीकृष्ण गौर वर्ण लेकर चैतन्य महाप्रभु के रूप में प्रकट होते है। आज से साढे़ पांच सौ वर्ष पहले इस भविष्यवाणी को सत्य करते हुए भगवान चेतन्य महाप्रभु का अवतार बंगाल के मायापुर में हुआ। उन्होने मानव को हरे कृष्ण महामंत्र का संदेश दिया। उसी गुरू शिष्य परंपरा में ब्रह्म मध्व गौडीय सम्प्रदाय के आचार्य अभयचरणारबिन्द स्वामी प्रभुपाद ने 50 वर्ष पूर्व पहले इस युग धर्म को पूरे विश्व में फैला दिया। उनके द्वारा संस्थापित इस्कोन संस्था के आज पूरे विश्व में हजार से भी ज्यादा केंद्र है। इसी क्रम में भगवान श्रीराम की तपोभूमि चित्रकूट धाम में अध्यात्मिक सलाहकार अनंतबलदेव अर्विन्द दास की अध्यक्षता में पिछले वर्ष खोला गया है। जिससे चित्रकूट में भगवान के हरिनाम संकिर्तन का प्रसार-प्रचार किया जा रहा है। अमृतरूपी हरि नामें में हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे का जाप निरंतर चल रहा है। 

मानस मनीषी रामभरोसे तिवारी ने एकादशी व्रत के महत्व का वर्णन करते हुए कहा कि एकादशी व्रत रहै हमेशा ताके तन नहीं रहै कलेशा। उन्होने बताया कि रामायण मेला का प्रमुख लक्ष्य मानव को चरित्रवान बनाना और भारतीय संस्कृति को बढावा देना है। चरित्र ही मानव को सबसे बडी उचाइयों पर ले जाने का साधन है। उन्होने साधना के बारे में बताया कि साधना अभिशाप को बरदान बना देती है। भावना पत्थर को भगवान बना देती है। जिसकी साधना भाव के अनुसार नहीं चल पाती वह साधक असफल रहता है। उन्होने सनातन धर्म के बारे में कहा कि यह धर्म सबसे प्राचीन है। यह महाशक्ति है। उन्होने बताया कि विश्व रूप रघुवंश मणि करूहुं वचन विश्वास विश्व के प्रत्येक मानव को दृढविश्वास के साथ संतों एंव मनुशियों की अनुभूतियों को सुनकर उनका प्रयोग जीवन में करना चाहिए। जेहि जाने जग जाए हेराई, जागे यथा सपन भ्रम जाई। श्री तिवारी ने बताया कि ईश्वर को पूर्णतः जान  लेने पर विश्वास द्वारा प्रकट करने के पश्चात संसारिक विकास काम क्रोध मग आदि दूर हो जाते है। सारा संसार सियाराम रूप में दिखाई पडने लगता है। सभी स्त्रियों को सीता रूप में और पुरूष राम रूप में नजर आता है। सभी को समानता के रूप से देखना जीवन में गुणों को व्यवहार रूप में उतारना मानवता है। 

मानस किंकर की उपाधि से सम्मानित रामप्रताप शुक्ल ने श्रीराम के चरित्र और रामकथा के बारे में कहा कि श्रीराम का सम्पूर्ण चरित्र भारतीय संस्कृति का अद्वितीय उदाहरण और राम काव्य भारतीय संस्कृति का अक्षय भंण्डार है जो भारत में ही नहीं विश्व में सस्कृति का झंडा लहराया है। उन्होने बताया कि विदेशों में सुमात्रा, बाली, सूरी राम, फिजी, गायना, मांरिशस, इंडोनेशिया आदि अनेक देशों में रामकथा के माध्यम से फलफूल कर दिन प्रतिदिन विकसित होती जा रहीं है। उन्होने बताया कि रामकथा ग्रामीण और कुलीन दोनें श्रृष्टियों को अपने में आत्मसात करती है। बताया कि अयोध्यापति राम ग्रामवासी और बनवासी राम भी है। यही कारण है कि रामकथा और उसके पात्रों में लोक चित्र और अभिजात चित्र का अलोकिक और अद्भुत चित्र भी जुड गया है। इसी के चलते भारत में रामकथा की लंबी श्रंखलां दिनों दिन बढती चली जा रही है। रामकथा के पात्रों के माध्यम से कलियुग में प्रमुख नैतिक धार्मिक सामाजिक एवं सस्कृतिक संमस्याओं एवं चुनौतियों को भी उदघाटित किया गया है। रामकथा एक शाश्वत मंदाकिनी है। राम विश्व बंधुत्व की भावना से ओत प्रोत है। इनके जीवन का उद्देश्य लोक सेवा है।  

रामकथा पर व्याख्यान देते मानस मर्मज्ञ।

विद्वत गोष्ठी में विद्वानों ने राम की प्रभुता के बताए दृष्टांत

-कोरोना पर लिखी पुस्तक का हुआ लोकार्पण

चित्रकूट। साहित्य पद्मश्री की उपाधि से विभूषित डा. सरोज गुप्ता जयपुर ने राम प्रताप विषमता खोई के विषय पर अपने उद्गार प्रकट करते हुए कहा कि मानसकार ने रामराज्य वर्णन में यह भाव व्यक्त किए थे नेतार्थ है। राम की प्रभुता आज भी ऐसे अनेक दृष्टांत है जो राम के प्रताप से हृदय परिवर्तन कर अपनी मिसाल प्रकट कर रहे है। उन्होने राम और रामत्व को सत्य सनातन बताया, लेकिन राम का रामत्व जो कि आध्यात्म भाव है वह समरसता पाता है। यही रामप्रताप विषमता खोई मूल मंत्र है। उन्होने बताया कि वर्तमान समय रामत्व की जाग्रति में सभी का सहयोग जरूरी है। जिसके दिल में रामत्व बसा है भारत का रामराज्य सपना शीर्घ पूर्ण हो जाएगा। इसी क्रम में ही ग्वालियर से पधारे श्रीलाल पचौरी ने कैकेयी के चरित्र के बारे में बताया कि उनका चरित्र निदंनीय नहीं बल्कि प्रशंसनीय है। कैकेयी के क्रियाकलापें के चलते ही राम को मर्यादा पुरूषोत्तम राम कहा गया। वहीं मानस किंकर श्रीशुक्ल ने बताया कि हनुमान जी का चरित्र सारे रामभक्तों में सर्वोपरि है। प्राचार्य सुरेन्द्र सिहं ने कहा कि नैतिक मूल्यों के अभाव में कोई भी राष्ट्र प्रगति नहीं कर सकता है। आज पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव के कारण भारतीय मूल्यों पर संकट पैदा हो गया है। राम कथा के माध्यम से उन्हे बचाने का प्रयत्न किया जाना चाहिए। महोबा के संतोष पटेरिया ने बताया कि रामचरित मानस के पूर्व भी कई रामायणें की रचना की गई है किन्तु तुलसी की मानस का प्रभाव जनमानस में सबसे ज्यादा दिखाई पडता है। रामचरित मानस की प्रतियां सबसे ज्यादा पाई जाती है और पढी जाती है। आगरा की सरोज गुप्ता ने कोरोना के बारे में कहा कि इससे लडना भी एक धर्म है। मानव को बचाना बहुत बडे पुण्य के कार्य से कम नहीं है। उन्होने कोरोना पर लिखी गई पुस्तक का लोकार्पण रामायण मेले में उपस्थिति विद्वानों में डा. चन्द्रिका प्रसाद दीक्षित से कराया। 

जिम स्वतंत्र बिगरै नारी के स्थान पर जिम स्वतंत्र ह्नै विचरै नारी : डा. ललित

चित्रकूट। विद्वत गोष्ठी का संचालन करते हुए प्रसिद्ध साहित्यकार डा. चन्द्रिका प्रसाद ललित ने बताया कि उन्हे खोज में रामचरितमानस की सवंत् 1860 की एक ऐसी प्रति प्राप्त हूई है जो गीता प्रेस से छपी हूई प्रतियों से पुरानी है। उसमें नारी की स्वतंत्रता का समर्थन किया गया है। जिसमें जिम स्वतंत्र ह्नै बिगरै नारी के स्थान पर जिम स्वतंत्र ह्नै विचरहि नारी का पाठ मिल गया है। जिससे प्रमाणित होता है कि, गोस्वामी तुलसी दास नारी जाति को परतंत्रता से मुक्त दिलाकर उसे भी जीवन जीने का मौलिक अधिकार प्रदान करने के समर्थक दिखाई पडते है। इस प्रकार गोस्वामी तुलसी दास आज के समय और समाज के लिए भी बहुत प्रासंगिक है। 


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