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Sunday, April 10, 2022

शरई मजबूरी के बिना रोजा छोड़ना गुनाह

जिंदगी गुजारने का बेहतरीन तरीका बताता है कुरआन

फतेहपुर, शमशाद खान । माह-ए-रमजान लोगों को नेकी की तरफ बुलाता है और कुरआन जिंदगी गुजारने का बेहतरीन तरीका बताता है। अल्लाह तआला ने कुरआन को रमजान माह में नाजिल कर यही पैगाम दिया है। कुरआन की बातों को जानकार उसे दूसरों तक पहुंचाना भी रोजे का मकसद है। पहले रमजान से शुरू होने वाली कुरआन की तिलावत और तरावीह की नमाज भी पूरे महीने पढ़नी चाहिए। रोजेदारों को कुरआन का एहतमाम भी ज्यादा से ज्यादा इस माह में करना चाहिए। साथ ही कुरआन को मायने के साथ पढ़ना चाहिए। ताकि अल्लाह तआला के एक-एक हुकुम पर अमल करना आसान हो सके। रमजान के रोजे के दौरान आंख, नाक, कान व जुबान का रोजा भी होना चाहिए और हर तरह से गुनाहों से बचना चाहिए। 




माह-ए-रमजान के मकसद पर रोजेदारों से बात की गई। जिस पर रोजेदारों ने अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएं दी। मोहल्ला ज्वालागंज स्थित मस्जिद के पेश इमाम ने कहा कि रोजा अल्लाह तआला को राजी करने के लिए रखा जाता है। भूखा-प्यासा भी उसी के लिए रहते हैं। उन्होने कहा कि यह माह रहमत, बरकत और मगफिरत का महीना है। उन्होने बताया कि पहला अशरा चल रहा है। दूसरे अशरे में अधिक से अधिक अपने माल की जकात गरीब व मोहताजों के बीच करें। जिससे माल पाक-साफ हो सके। हाफिज मो0 हशमत ने कहा कि रमजान में अल्लाह तआला मुसलमानों का दिल नेकियों की तरफ झुका देता है। इसलिए कुरआन को ध्यान से सुनना चाहिए और उसकी बातों पर अमल करना चाहिए। उन्होने कहा कि कुरआन के मुताबिक जिंदगी गुजारने पर कामयाबी मिलती है। उन्होने कहा कि रोजे का मकसद यह भी है कि अमीर, गरीब के बीच की खांई बराबर रहे और गरीबों की गरीबी का एहसास न हो। उन्होने कहा कि जकात, सदका व फितरा निकालने से बरकत होती है और गरीब भी खुशियों के साथ ईद मनाते हैं। मो0 लईक, मो0 शाहनवाज व मो0 सरवर ने कहा कि माहे रमजान इबादत का महीना है। हर बालिग आकिल के लिए रोजा फर्ज है। बिना किसी शरई मजबूरी के जो भी इन रोजों को छोडे़गा वह गुनाहगार है। उन्होने कहा कि बीमारों और मुसाफिरों को रोजे में छूट दी गई है हालांकि बीमारी दूर हो जाने व सफर से वापस लौटने के बाद छूटे हुए रोजे रखना जरूरी है। बेहतर है कि रमजान के फर्ज रोजो को छोड़ा न जाए रोजा सिर्फ भूखा रहने का नाम नहीं है। बुरे काम से परहेज जरूरी हैं इसलिए ज्यादा से ज्यादा समय इबादत में समय गुजारना मुनासिब होता हैं। रोजेदारों को रमजान के पूरे महीने गुनाहों से बचना चाहिए। अल्लाह तआला उन पर अपनी नजरे नाजिल करता हैं। रोजा रखने से एहसास होता है कि गरीबों की भूख प्यास क्या होती है। जकात करने के पीछे गरीबों की भलाई का सबक छिपा है।

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बरकतों का महीना है रमजान 

फतेहपुर। रमजान के महीने में रहमतों और बरकतों की बरसात होती है। एक नेकी के बदले 70 नेकियां मिलती हैं। रमजान में रोजा हर मुसलमान पर फर्ज है। बच्चा अगर 8 वर्ष का हो गया है तो उस पर भी रोजा रखना लाजमी है। रमजान के महीने में अल्लाह पाक ने नेकियों के लिए बंपर आफर दिया हुआ है कि एक नेकी के बदले 70 नेकियों का सवाब मिलता है। साल में रमजान महीने का हर मुसलमान भाई को इंतजार रहता है कि कब रमजान आए और हम इबादत करें। रमजान के महीने में तरावीह पढ़ी जाती है जो कि 20 रकात होती हैं और हर मुसलमान भाई को लाजिम है कि पूरी कुरआन सुने। लगभग हर मस्जिद में तरावीह होती है। किसी मस्जिद में चार दिन में कुरआन मुकम्मल किया जाता है तो किसी में पांच दिन किसी में सात दिन तो किसी में 10 दिन व किसी में 20 दिन में कुरआन मुकम्मल होता है। सभी मस्जिदों में पूरा महीना तरावीह का सिलसिला चलता रहता है। मुसलमान भाई सुबह लगभग तीन बजे सहरी कर रोजा की नीयत बांधते हैं। इसके बाद सूरज डूबने के बाद रोजा अफ्तार करते हैं। बहुत से मुसलमान अपने घरों में रोजा अफ्तार कराते हैं जबकि हिंदुओं में भी रोजा अफ्तार कराने का कार्यक्रम चलता रहता है। रोजा रखने का यह मतलब नहीं कि हमने रोजा रख लिया और दूसरे लोगों को गाली गलौज करते रहें। जबकि रोजा आंख, कान, मुंह, नाक और जुबान का भी होता है। जैसे आंखों से गलत न देखा जाए, कानों से गलत न सुना जाए और नाक से गंदी चीज व खुशबू वगैरह न सूंघे, जबकि जबान से गलत शब्द न बोले जाएं इसी को रोजा कहते हैं। रमजान के आलावा भी रोजे रखे जाते है। मगर रमजान जो रोजे रखे जाते है इन रोजों का महत्व ज्यादा है।


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