शगुन सुमंगल रामायण में तुलसी ने बताए हैं शगुन - अशगुन - Amja Bharat

Amja Bharat

All Media and Journalist Association

Breaking

Tuesday, April 12, 2022

शगुन सुमंगल रामायण में तुलसी ने बताए हैं शगुन - अशगुन

चित्रकूट, सुखेन्द्र अग्रहरी । राष्ट्रीय रामायण मेले के 49वें समारोह के विद्वत गोष्ठी को संबोधित करते हुए हिंदी साहित्य के प्रख्यात साहित्यकार शोधकर्त्ता डा. चन्द्रिका प्रसाद दीक्षित ने बताया कि उन्हे खोज में ही गोस्वामी तुलसी दास की एक दुर्लभ शगुन सुमंगल रामायण प्राप्त हुई है। प्राचीन हस्त निर्मित कागज में है एवं काली स्याही से लिखी हुई है। इसमें सात सर्ग है। प्रत्येक सर्ग में सात पृष्ठ है और प्रत्येक पृष्ठ में सात दोहे है। प्रत्येक सर्ग में मात्र उन्चास दोहे है और सात सर्गों में परिमाण की दृष्टि से तीन सौ तेतालिस दोहे है। श्री दीक्षित ने बताया कि, गोस्वामी तुलसी दास ने शगुन सुमंगल के माध्यम से सम्पूर्ण रामकथा को दोहा शैली में जन-जन तक पहुचाने के लिए लिखा है। जिसमें रामकथा को शगुनों के आधार पर लिखा गया है। महाकवि तुलसी दास ने इस बात का भी उल्लेख किया है कि शगुन सुमंगल रामायण की रचना अपने मित्र गंगाराम ज्योंतिषी जो काशी के प्रसिद्ध थे उनके अनुरोध पर लिखा है। कवि के शब्दों में शगुन प्रथम उन्चास शुभ तुलसी अति अविराम, सब प्रसन्न सुर भूमि पर गुरू गुरू गंगा राम।

विद्वत गोष्ठी में मौजूद ख्यातिलब्ध मर्मज्ञ।

खोज कर्त्ता विद्वान डा. ललित ने बताया कि शगुन सुमंगल रामायण में कथा के माध्यम से शगुन और अशगुन दोनें का उल्लेख करके अपनी कथा को आगे बढाया है। गोस्वामी तुलसी दास के अनुसार हनुमान जी के चरित्र को सुनकर हर्षित होने वाले को पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है। राम काज लगि जनम जग सुनि हर्षे हनुमान, होए पुत्रफल शगुन सब, राम भगति वरदान। इसी प्रकार गोस्वामी तुलसी दास की मान्यता है कि सीता जी के चरणों का सुमिरन करने से सौभाग्यवति होने का और सौभाग्यवती स्त्रीयों को पुत्र के कल्याण का लाभ मिलता है। सिय पद सुमिर सुतीय हित शगुन सुमंगल जान, स्वामि सुहागिनि भाग बटु पुत्र काज कल्यान। इसी प्रकार लक्ष्मण जी के पदों का स्मरण करने से विजय विभूति और मंगल प्राप्त होने का संकेत किया गया है। लक्ष्मण पद पंकज सुमिर, शगुन सुमंगल पाये, जय विभूति मंगल कुशल अभिमत लाहु अक्षाय। उन्होने बताया कि शगुन सुमंगल रामायण में यह भी बताया गया है कि, तुलसी का कानन अथवा कमलों वन यह शगुन रूप में दिख जाए तो रामभक्ति का मनोरथ पूर्ण होता है। तुलसी कानन कमल वन सकल सुमंगल बास, राम भगत हित सगुन शुभ सुमिरहु तुलसी दास। खोजकर्त्ता डा. ललित ने बताया कि गोस्वामी तुलसी दास ने अपने समय के सभी काव्य शैलियों का उपयोग करके रामकथा को जनव्यापी बनाने का प्रयत्न किया है। इसी क्रम में ही रामायण मेला समिति के उपमंत्री एवं समाजिक समिति के चिंतक प्रद्युम्न कुमार द्वुबे उर्फ लालू ने विद्वत मंच को संबोधित करते हुए कहा कि भगवान राम का अवतरण सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन में एक नयी क्रांति का संचार करने वाला है। संतान हीन पिता दशरथ की चिंता और माँ कौशिल्या की पुत्र रूप में लीला दर्शन की भावना तथा गुरू विश्वामित्र की राक्षसों के विनाश के लिए किसी ऐसे राजकुमार की प्रतीक्षा जो आतंक और निशाचरी वृत्तियों से मनुष्य जाति को मुक्त करा सके। दशरथ नदंन होकर गुरू गृह जाकर, सम्पूर्ण शिक्षाओं को प्राप्त कर समाज के लिए उसका उपयोग कर सके, इसके लिए राम के अवतरण की परिकल्पना की गयी है और वह रामकथा के रूप में पूर्णतः को भी प्राप्त हूई। राम जिन्होने अहिल्या का उद्धार कर सबरी के जूठे बेर खाये, निषाद राज को मिलवाया और इसी प्रकार समाज के उपेक्षित वर्ग को लेकर न्याय और धर्म के पथ पर चलकर आतंक के पर्याय रावण के शासन से जनता को मुक्ति दिलाई और सीता को वापस लाकर नारी की गरिमा स्वाभिमान को सुरक्षित किया तथा शक्ति स्थापित किया। रामायण मेला के संकल्पक डॉ. लोहिया के राष्ट्रीय रामायण मेला का चित्रकूट का लक्ष्य भी समाज में समानता, भाईचारा, आर्थिक समानता एवं राष्ट्रीय एकता तथा हिन्दुस्तान को बढावा देना आदि उद्देश्य रहे है। जिनको लेकर 48 वर्षों तक यह मेला कार्यरत रहा और आज पूरे जोश के साथ विषम परिस्थितियों में भी 49वें रामायण मेला का आयोजन हो रहा है।


No comments:

Post a Comment

Post Bottom Ad

Pages