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Thursday, April 21, 2022

धर्म कोई हो आस्था का सम्मान होना चाहिए........................

देवेश प्रताप सिंह राठौर 

 वरिष्ठ पत्रकार

           दिल्ली में केजरीवाल सरकार है जहांगीर पुरी में वहां के निवासी और दिल्ली के अन्य स्थान के निवासी कह रहे हैं हमें दिल्ली की सरकार केजरीवाल की नहीं चाहिए हमें उत्तर प्रदेश के योगी जी की सरकार चाहिए योगी जैसे नेतृत्व के लोगों की सरकार चाहिए वहां की जनता कह रही है, दिल्ली की जनता कह रही है हमें फ्री में नहीं चाहिए हम बिजली का बिल कमाकर अदा कर लेंगे हम एक पंखा चलाएंगे एक बल्ब जल आएंगे लेकिन हम पैसा जमा करेंगे बिजली के बिल का हमें फ्री का नहीं चाहिए ,आज हमें फ्री का देकर कल का भविष्य हमारे बच्चों का खराब कर रहे हैं हमें अपना परिवार अपना घर और समाज के लोगों को सुरक्षित रखने के लिए हमें आज योगी जी जैसी सरकार की जरूरत है, ऐसा दिल्ली के निवासी कहने लगे हैं वैसे एक बात सत्य है फ्री की आदत अच्छी नहीं होती है


अधिक फ्री खाने से कहीं ना कहीं से निकलता है, जैसे दिल्ली में इस समय निकल रहा है धार्मिक उन्माद के नाम से पश्चिम बंगाल के तर्ज पर दिल्ली के बहुत से लाखों में बांग्लादेशी रह रहे हैं यह सब फ्री के चक्कर में बुला बुला कर इनको सरकारी पालती हैं बाद में यही देश के लिए घातक होते हैं, वही राजनीति चल रही है कोई मरे या जिए इससे किसी को लेना देना नहीं है हम कैसे सत्ता पर हमेशा बने रहो सत्ता पर काबिज होते रहें  लड़ाई है ,देश की चिंता करने वाले बहुत ही कम लोग आज बचे हैं इसे समझने की जरूरत है देश की जनता को राज्य की जनता को राजनीतिक दल सत्ता पाने के लिए बौखलाई हुई है इसके लिए वह फ्री देंगे अपने ईमान को बेच देंगे धर्म  को बेच देंगे देंगे, और आप देख भी रहे हैं लोग  बेचते आ रहे हैं,सब कुछ दाव पर लगा सकते हैं सत्ता पाने के लिए, ऐसे लोग आपने सुना होगा किसी को बिगाड़ना हो तो पहले अपनी तरफ से उसको नशा पानी कराओ जब आदत पड़ जाएगी तो खुद ही घर बेचेगा जमीन बेचेगा अपना भी पिएगा और हमको भी पिलाआएगा घर बच्चे परिवार बर्बाद होंगे वही हालत दिल्ली के सरकार कर रही है फ्री में खिलाकर आज आपको फ्री देगी कल आप ही से सूत समेत वापस लेगी वह कैसे लेगी वह आप दंगे और उन्माद के रूप में देख रहे हैं, आपको सुख चैन से रहने नहीं देंगे जो जीवन का एक बहुत बड़ा बड़ा अमूल्य  चीज होती है लोग कहते हैं हम आधी रोटी खा लेंगे लेकिन शांति और सुख चैन से हमें रहने की जगह होनी चाहिए, कलहा क्लेश ना हो , केंद्र सरकार और राज्य सरकार अच्छी सोच के कारण गरीब लोगों को खाने के लिए कार्ड के द्वारा फ्री राशन पानी दे रही है लेकिन इसमें भी लोग मक्कार हैं जो पैसे वाले हैं जो गला पानी खरीद सकते हैं जिनके पास 1020 लोगों को और खिला सकते हैं ऐसे लोग गरीबों का हक मार रहे हैं और फ्री में राशन पानी ले रहे हैं अपने जानवरों को दलिया बनवा कर खिलाते हैं सरकारें कोई भी हो कानून बनाती हैं जनता के हित के लिए लेकिन वहां के क्षेत्रीय अधिकारी जिला प्रशासन उसको सही लोगों तक सत्य प्रतिशत नहीं पहुंच पाता है जिसके कारण जो वास्तव में परेशान हैं उन तक सरकार की योजना का अंतिम रूप अंतिम पायदान तक पहुंचना संभव नहीं हो पाता है ,इस पर सरकार थोड़ा ध्यान दें और जांच कराएं उन सभी कार्ड धारकों का जो वास्तव में गरीबों का हक मार रहे हैं , की जो कार्ड गरीब के लिए हैं कमजोर के लिए हैं वह ऐसे लोग जो लोग सक्षम हैं वह गरीबों का हित और गरीबों का अधिकार क्यों छीन रहे हैं इस पर ध्यान देने की जरूरत हैमैंने कई बार अपने लेख में लिखा है धर्म कोई भी हो जात कोई भी हो खराब नहीं है इंसान इंसान इंसान एक है चाहे वह किसी धर्म का हो अगर भगवानों में भिन्नता होती तो मानव के अंगों में विभिन्नता होती खून किसी धर्म का भी हो और किसी धर्म में बीमारी में लग जाता है फिर यह व्यवस्था क्यों सब को एक साथ मिलकर रहना चाहिए इस देश के धरती पर रहते हुए देश के साथ समर्पित भाव से रहना चाहिए इस देश में रहो दूसरे देश के गुण गाओ यह दूर के ढोल सुहावने लगते हैं जब हकीकत सामने आती है तो पछताने के सिवा कुछ नहीं मिलता हैl कर से बच्चा जब नाराज हो कर भाग जाता है बाहर ठोकर खाकर महीने 2 महीने बाद जब वापस आता है उसका चेहरा उतरा हुआ होता है उस पर जिन लोगों पर भरोसा होता है वहां जा जाकर सभी तरफ से उसे निराशा प्राप्त होती है उसके बाद सोचता है कथनी और करनी और देखने में सुनने में बहुत बड़ा फर्क होता है इसलिए परिवार परिवार होता है जैसा भी हो अपना है इसलिए देश आपका है हमारा है सभी का है इसके साथ गद्दारी करोगे दूसरे लोग भी आपको सम्मान नहीं देंगे वक्त निकलने पर आपके साथ वह व्यवहार करेंगे जिसकी आप कल्पना नहीं कर सकते हैं l       देश के हर नागरिक को हर धर्म का सम्मान करना चाहिए परंतु कुछ तत्व ऐसे हैं जो धार्मिक उन्माद करने की चेष्टा करते आए हैं और करते रहते हैं,हम अक्सर देखते हैं धार्मिक उन्माद कहीं ना कहीं देश में किसी न किसी रूप में हम सभी को देखने को मिलता है , चिंताजनक विषय है यह नहीं होना चाहिए हर धर्म का सम्मान होना चाहिए परंतु यह सोच एकपक्षीय है धर्म का सम्मान देश के 100 करोड़ लोग करते हैं परंतु शेष बचे लोग 100 करोड़ के धर्म का सम्मान नहीं करते यह चिंता का विषय है जहांगीर पूरी में लेकिन पिछले कुछ समय से धर्म और आस्था से जुड़े कार्यक्रमों की प्रकृति में जिस तरह के बदलाव देखे जा रहे हैं, वे बेहद चिंताजनक और दुखद हैं। हालत यह है कि देश की राजधानी होने के बावजूद दिल्ली भी ऐसे विवादों और हिंसा से मुक्त नहीं रह पा रही है। इस साल रामनवमी के बाद हनुमान जयंती पर निकाली गई शोभायात्रा के दौरान जैसे दृश्य में देखने में आए और उसके बाद जिस तरह की हिंसक घटनाएं हुर्इं, उनसे जाहिर है कि सद्भाव के मौके अब अलग-अलग धार्मिक समूहों के बीच तनाव और टकराव तक में बदल रहे हैं। सवाल है कि दुनिया में किस धर्म के मूल्य इंसानियत के विरुद्ध प्रतिद्वंद्विता और हिंसा का पाठ पढ़ाते हैं?नतीजतन, जुलूस पर पथराव और फिर हिंसा की घटनाओं ने आस्था प्रदर्शन के एक मौके को दुखद स्वरूप दे दिया। सवाल है कि हनुमान जयंती पर निकाले गए जुलूस के आयोजकों को यह ध्यान रखने की जरूरत क्यों नहीं महसूस हुई कि अगर यात्रा में शामिल लोग हथियार प्रदर्शन या किसी स्तर पर कानून की कसौटियों का उल्लंघन कर रहे हैं और उससे उकसावे या उत्तेजना जैसी स्थिति बन रही है तो उसे संभाला जाए! फिर दूसरे पक्ष को अगर जुलूस की कोई गतिविधि आपत्तिजनक लगी, तो उस पर खुद कोई अराजक प्रतिक्रिया करने के बजाय उन्होंने पुलिस की मदद लेने की जरूरत क्यों नहीं समझी!इसके अलावा शोभायात्रा में शामिल लोगों की गतिविधियां आदि देखने के बावजूद पुलिस ने उचित कदम क्यों नहीं उठाए? अब पुलिस की ओर से कहा गया कि उस जुलूस के लिए कोई अनुमति नहीं ली गई थी। हैरानी की बात है कि किसी छोटी घटना पर भी तत्काल प्रतिक्रिया कर हालात संभालने की क्षमता रखने का दावा करने वाली पुलिस की इजाजत के बिना सरेआम ऐसी शोभायात्रा का आयोजन कैसे संभव हो गया? अगर ऐसा था तो पुलिस ने हिंसक माहौल पैदा होने के पहले उसे रोकने की कोशिश क्यों नहीं की? जब देश में सबसे सुरक्षित माने जाने वाले इलाके के रूप में राजधानी दिल्ली में अराजकता और हिंसा का माहौल बनाने में कुछ लोगों को कामयाबी मिल जाती है तो इसे कैसे देखा जाना चाहिए? यह ध्यान रखने की जरूरत है कि दिल्ली अभी दो साल पहले हुए दंगों का दर्द नहीं भूल सकी है। धार्मिक सद्भाव और सहिष्णुता इस देश की असली ताकत और पहचान रही है। इसे नुकसान पहुंचाने की हर कोशिश को नाकाम किया जाना चाहिए।

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