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Tuesday, April 12, 2022

निर्मल मन से परमात्मा की प्राप्ति संभव : सनत

रामायण मेला महोत्सव के दूसरे दिन मानस मर्मज्ञों ने दिए व्याख्यान

चित्रकूट, सुखेन्द्र अग्रहरी । भगवान श्रीराम की तपोस्थली व संकल्प भूमि पर आयोजित 49वें राष्ट्रीय रामायण मेला महोत्सव में राम कथा के मर्मज्ञ विद्वान मानस किकंर सनत कुमार मिश्र ने कहा कि निर्मल मन जन सो मुहिं पावा, मोहिं कपट छल छिद्र न भावा। निर्मल मन के माध्यम से ही परमात्मा की प्राप्ति सम्भव है। भगवान श्रीराम पुष्प वाटिका में भाई लक्ष्मण से निर्मल मन की बात कही। मोहि अतिसै प्रतीत मन केरी, सपने सो परनारि न हेरी। जानकी जी को देखकर श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा कि भैया तुम भी इनका दर्शन करो। तात जनक तनया यह सोई धनुष जज्ञ जेहि कारण होई। भगवान श्रीराम ने कहा मैं स्वप्न में भी पर नारी पर दृष्टि पात नहीं करता, लेकिन विदेह नन्दनी जानकी को देखने के लिए मेरा मन लालायित हो रहा है। ऐसा कह कर श्रीराम ने लता ओट से दर्शन किया। एक सखी के माध्यम से विदेह नन्दनी जानकी जी ने प्रभु श्रीराम के अनन्त सौन्दर्य का दर्शन किया। जिन नैनो ने भगवान का दर्शन किया उनके पास वाणी नहीं है और जिस वाणी से भगवान के रूप सौन्दर्य का वर्णन किया उस वाणी में नेत्र नहीं है। गिरा अनयन नैयन बिनु बानी। भगवान श्रीराम ने जानकी जी के दर्शन के बाद गुरू विश्वामित्र से निर्मल मन से राम कहा सब कौशिक पाहीं। 

शुभारंभ करते कार्यकारी अध्यक्ष व पूर्व नपा अध्यक्ष।

इसी क्रम में ही रामायणी मानस किंकर ने एक आश्चर्य जनक प्रसंग को व्यक्त करते हुए बताया कि हनुमान जी की पूछ संहार कारणी शक्ति है। इसी के चलते हनुमान जी ने अधिकाशं राक्षसों का वध अपने पूछें के माध्यम से ही विभिन्न तरीके से किया। उन्होने प्रमाण देते हुए बताया कि हनुमान जी ने अपने पूछं के माध्यम से लंका को जलाया। कुछ निशाचर अमर थे। उनको हनुमान जी ने अपनी पूंछ में लपेट कर आकाश में उड़ गये। आकाश में उड़ते हुए इतने आगे निकल गये जहां से पृथ्वी का गुरूत्वाकर्षण समाप्त हो गया। वहीं उन्हे छोड़ दिया। जे रजनीचर बीर महान कराल विलोकत काल न खाये, ते रन रोर कपीश किशोर, बड़े बरजोर परे फग पाये, लूंम लपेटि आकाश निहार के हांकि हटि हनुमान चलाये। चले सूख गात परे भ्रमं बात, निशाचर न भूतल आये। उन्होने बताया कि आज समाज में चारों तरफ विघटन, विद्वैष और स्वार्थ की होड मची हुई है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति, समाज और राष्ट्र सभी को बचाने की महती आवश्यकता है। यह तभी संभव जब समाज में राम कथा के चरित्र और उसमें दी गई शिक्षाएं जीवन में चरितार्थ हों। इसके लिए संत समाज, साहित्यकार, समाजसेवी, शिक्षकों व अभिभावकों को मिलकर नवयुवक, बालक, बालिकाओं में संस्कार डालना होगा, क्योंकि मूल आधार संस्कृति और संस्कार है। जिससे समाज को सुधारा जा सकता है।

विद्वत गोष्ठी : महाकवि चन्द्रदास रचित चन्द्ररामायण का किया उल्लेख

चित्रकूट। राष्ट्रीय रामायण मेला के 49वें समारोह की विद्वत गोष्ठी में हिन्दी के ख्यातिलब्ध साहित्यकार चद्रिका प्रसाद दीक्षित ने बताया कि राम कथा का विस्तार समय-समय पर देश काल की परिस्थितियों के आधार पर महाकवियों ने अपने युगीन देशकाल को ध्यान में रखते हुए रामायण की रचना किया। गोस्वामी तुलसी दास ने हरि चरित हरिकथा अनंता कह कर यह संकेत किया कि हरि का चरित्र अंनत है और हरि की कथाएं भी अंनत रूपों में लोक में व्याप्त हो गई है। डा. ललित ने बताया कि एक ओर बाल्मीक रामायण से प्रभावित होकर दक्षिण भारत, लंका, इंडोनेशिया, मलेशिया, कर्नाटक, तमिलनाडु आदि में रामकथाएं लिखी गई है। दूसरी ओर गोस्वामी तुलसी दास की रामचरित मानस से प्रभावित होकर हिन्दी क्षेत्र में भी अनेक महाकाव्य लिखे गये। जिनमें चन्द्रदास महाकवि द्वारा चन्द्ररामायण भी लिखा गया। जिसमें 5328 छंद 7 काण्डों का विभाजन किया गया है। दोहा और चौपाई के स्थान पर 56 छंद कवित्त, छंद, छंद तोमर, छंद भुजंग प्रयाग आदि विविध छंदों का प्रयोग है। उन्होने बताया कि इसमें राम चरित मानस से मूल अंतर बंद रामायण में यह किया गया है। राम को 10 कला का अवतार कहा गया है। अवतार कला दस आप लियो अर्थात दस कलाओं वाले ने अवतार ले लिया। जिसमें दसम गुरू गोबिन्द सिहं का सकेंत किया गया। इसके रचनाकार कविचन्द स्वयं यु़द्ध के नायक है जो 18वीं शताब्दी के औरंगजेब कालीन योद्धा में प्रमुख भूमिका का निर्वाह करते है और गुरू गोबिन्द सिंह इस युद्ध में सहायक होते है। उल्लेखनीय है कि महाकवि चन्द पर्वतीय क्षेत्रों के बिलासपुर जिसे कैहलूर भी कहा जाता था वहीं के पहाडी राजा थे। उनके अधीन 52 पहाडी राज्य थे। महाकवि चन्द ने सबसे पहले औरगंजेब के द्वारा लगाये गये जजिया कर का विरोध किया और हिन्दु संस्कृति का बचाने के लिए धर्मयुद्धों में भाग लिया। रामबिनोद महाकाव्य तथा चंद रामायण की रचना की। डा. ललित ने बताया कि यही एक ऐसी रामायण है जिसमें स्वयं महाकवि चन्द, गुरू गोबिन्द, क्षत्रशाल और शिवाजी के बलिदानों को राम के रूपक और औरगंजेब को रावण के रूपक में लिखा गया है। जजिया कर लगाने वाले औरंगजेब को फटकारते हुए महाकवि चन्द ने लिखा है कि तुम जजिया को छोडकर, अपना जिया बचाओं और सिया का दान कर दो। अर्थात तुम अपने कट्टर सुन्नी पंथ को छोडकर उदारतावादी सिया मुस्लिमों की तरह व्यवहार करो और अपने प्रणों की रक्षा करो। 

पूर्व प्रवक्ता डा. सत्यदेव त्रिपाठी ने रामचरित मानस में गुरू के महत्व की चर्चा करते हुए बताया कि तुलसी दास जी ने सरल से सरल भाषा और पठन पाठन की श्रेणी में महानम ग्रंथों से रस लेकर भगवान राम को एक दुर्लभ आदर्श के रूप में प्रस्तुत ही नहीं किया, बल्कि प्रेरणा का श्रोत भी बताया है। रामचरित मानस के अध्ययन के पूर्व ही अपने सद्गुरू की बंदना अति आवश्यक बताया है। बंदऊ गुरू पद पदुम परागा, सुरिस सुवास सरस अनुरागा। बताया कि काम क्रोध, मदलोभ, अहंकार, निद्रा, मैथुन, आलस्य आदि का नाश होता है।

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