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Wednesday, March 9, 2022

पलायन एक मजबूरी .................

देवेश प्रताप सिंह राठौर......... 

किसी देश का युद्ध हो दंगा हो फसाद हो इन सब के बाद एक शब्द निकल कर आता है पलायन व्यक्ति पलायन कब करता है जब वह अपने को असुरक्षित समझता है और अपनी जान को बचाने के लिए अपना घर परिवार जमीन जगह सब छोड़ कर भाग जाता है,ऐसे स्थान पर जहां पर वह अपने को सुरक्षित महसूस कर सकें जो व्यक्ति सब छोड़कर भागता है कभी उसके दिल से पूछो उसके दिलो-दिमाग पर क्या गुजरती है ,इसका स्मरण करो उसके बाद राजनीति में बैठे लोग निर्दोष लोगों को मरवा देते हैं सिर्फ अहंकार और वर्चस्व की लड़ाई के कारण ऐसा वर्चस्व लड़ाई किस काम की जिसमें खून की नदियां बह इस पर समझौता मिलकर भाईचारा के साथ बैठकर कूटनीति तरीके से इसका निवारण करने की जरूरत होती है,यूक्रेन भारत के लोग मेडिकल की शिक्षा लेने जाते हैं भारत में मेडिकल की पढ़ाई इतनी महंगी और इतनी कठिन है कि गरीब का बच्चा अगर पढ़ने में बहुत अच्छा है फिर भी एमबीबीएस करने की सोच लाखों में एक आध की पूरी हो पाती है संभव नहीं है यहां के डॉक्टर बनने में एमबीबीएस बनने में करोड़ों का नारा व्यारा होता है ,जब वो एमबीबीएस डॉक्टर बनेगा जब वह कहीं सरकारी विभाग में डॉक्टर


बन जाता है वह सरकारी तंत्र के साथ अपना प्राइवेट भी  पैसा कमाने की सोच रखेगा करोड़ों रुपया खर्च करके एमबीबीएस एमडी वन कर एएया है और ऐसा आज हो रहा है भारत में मेडिकल की पढ़ाई बहुत ही महंगी है, यूक्रेन  रूस के आक्रमण से एक बार फिर भारत में चिकित्सा शिक्षा की अत्यधिक महंगी स्थिति की ओर ध्यान दिलाया है। चिकित्सा क्षेत्र में उपलब्ध वास्तविक सीटों और आवेदन करने वाले छात्रों की संख्या के बीच भारी अंतर को मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया द्वारा 2021 में जारी आंकड़ों से समझा जा सकता है। उसमें कहा गया है कि 2021 में उपलब्ध नब्बे हजार सीटों के लिए सोलह लाख अभ्यर्थियों ने आवेदन किया था।भारत में निजी संस्थानों की संख्या तेजी से बढ़ी है, जहां यूरोपीय समकक्षों की तुलना में चिकित्सा शिक्षा कई गुना महंगी है। यही मुख्य कारण है कि कई छात्र उन देशों में चले जाते हैं, जो उन्हें सस्ती दरों पर सुविधाएं प्रदान करते हैं। निजी और सार्वजनिक संस्थानों में कमियों को दूर करने की सख्त जरूरत है। चिकित्सा अध्ययन को निजी संस्थानों के चंगुल से मुक्त किया जाना चाहिए, जिनका एकमात्र उद्देश्य अपना खजाना भरना है। इसके लिए बुनियादी ढांचे में निवेश की आवश्यकता है, जो बेहद कम है। भारत में चिकित्सा शिक्षा को और अधिक सुलभ बनाया जाना चाहिए ताकि न केवल समाज का निचला तबका इसका लाभ उठा सके, बल्कि अर्थव्यवस्था में भी योगदान दे सके।  जहां खबरों और अन्य जानकारियों के लिए हम टीवी तथा अन्य दूरसंचार माध्यमों पर निर्भर होते जा रहे हैं, वहीं हाल के घटनाक्रम रूस-यूक्रेन युद्ध में समाचार पत्रों के महत्त्व का फिर से एहसास हो गया है। सभी न्यूज चैनल चौबीस घंटे केवल रूस-यूक्रेन से जुड़ी खबरें दिखा रहे हैं, वहीं अपने देश से संबंधित कोई भी खबर हमें नहीं मिल पा रही है। देश की आर्थिक स्थिति, व्यापार और वाणिज्य, खेल समाचार तो बहुत पीछे छूट गए हैं।राजनीतिक उठा-पटक के इस दौर में मिडिया की भागीदारी महत्त्वपूर्ण हो जाती है। यूक्रेन में फंसे भारतीय छात्रों के एक समूह ने साक्षात्कार में बताया कि भारतीय डिजिटल मीडिया द्वारा की जा रही रिपोर्टिंग काफी डराने वाली है। स्थिति जरूर खराब है, लेकिन जैसा बताया जा रहा है वैसा बिल्कुल नहीं हैं। भारत सरकार के आग्रह पर रूस तथा यूक्रेन के पड़ोसी देश भारतीय छात्रों की मदद कर रहे हैं, ताकि वे यूक्रेन से सुरक्षित बाहर निकल सकें। हमें यह समझना होगा कि कहीं यह स्थिति इतनी गंभीर न हो जाए कि युद्ध के भय से लाखों लोग बेघर, बेसहारा और असहाय हो जाएं। आवश्यकता है कि संपूर्ण देश का मीडिया अपनी जिम्मेदारी समझे और रूस-यूक्रेन की स्थिति पर बिना किसी सत्यापन के खबरें प्रकाशित न करें।एकवेश्या पर बनी फिल्म गंगूबाई के प्रचार पर करोड़ों खर्च होते है। लेकिन 5 लाख हिन्दुओ पर अत्याचार जो कश्मीर में हुए, अपने ही देश मे शरणार्थी बने, रेप हुए, कत्ल हुए। इस पर बनी फिल्म दा कश्मीर फिल्म फ़िल्म के प्रचार का कहीं जिक्र नहीं हो रहा। तो अब दायित्व बनता है हर हिन्दू का,  11 मार्च को रिलीज होनी है किसी ने इसको लोगों तक नहीं पहुंचाया ना मीडिया के माध्यम से ना किसी अन चैनल के माध्यम से क्यों अगर वही आतंकवादी पर होती है वही चीज मुगलों के संदर्भ में होती है अत्याचार ओ कि उनकी बहादुरी के किस्सों की तब्दील कर दी जाती है और उनका व्याख्यान किया जाता है परंतु जिस तरह से अत्याचार हिंदुओं पर हुए हैं उसका वर्णन बहुत कम किया जाता है। आप सभी देश के 100 करोड़ हिंदुओं को यह सोचना चाहिए और अपनी सोच बदल कर हमारे देश में हमारे ही हिंदुओं का पलायन हुआ है इस पर कभी गंभीरता से सोचे हो नहीं सिर्फ अपना उल्लू सीधा करना यह धारणा रही है राजनीति की और राजनीति में लिप्त हमारे बहुत सारी हिंदू  जातियों के लोग मिलकर जो हिंदुत्व बनता है वह भटकाव है ओर चले जाते हैं। इसे समझने की जरूरत है आने वाले समय में वह दर्द और पीड़ा सहनी पड़ेगी अगर इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो हिंदुत्व के अस्तित्व को बचाने के लिए बड़ी मेहनत करने की जरूरत पड़ सकती है।

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