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Wednesday, March 16, 2022

रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध का कारण क्या.................................................

देवेश प्रताप सिंह राठौर................   

वरिष्ठ पत्रकार................................ 

रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध का संकट अब तीसरे विश्व युद्ध  की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। रूस के खिलाफ अमेरिका समेत नाटो के सभी सदस्य देश पूरी ताकत के साथ खड़े हैं। वहीं, रूस का समर्थन करने वाले देशों की भी कोई कमी नहीं है। यूक्रेन के समर्थन में अमेरिका, ब्रिटेन, जापान समेत कई देशों ने तो कठोर प्रतिबंधों  की झड़ी लगा दी है। जर्मनी ने तो रूस की गैस पाइपलाइन नॉर्ड स्ट्रीम-2 पर ही रोक का ऐलान कर दिया है। इसके बावजूद पुतिन न तो झुकने को तैयार हैं और न ही अपने फैसले. से पीछे हटने को। इसके इतर रूस ने तो यूक्रेन के दो इलाकों को स्वतंत्र देश की मान्यता तक दे दी है। खुद व्लादिमीर पुतिन ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर यूक्रेन पर रूसी भाषी लोगों के नरसंहार करने का आरोप लगाया है। उन्होंने यह भी मांग की है कि यूक्रेन को खुद को सैन्यीकरण करने से


रोकना चाहिए। ऐसे में सवाल उठता है कि यूक्रेन की पूरी कहानी क्या है और व्लादिमीर पुतिन इस छोटे से देश को कुचलना क्यों चाहते हैं।रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन आधुनिक यूक्रेन को बोल्शेविक यानी एक कम्युनिस्ट आविष्कार मानते हैं। बोल्शेविक रूसी कम्यूनिस्ट पार्टी का मार्कसिस्ट ग्रुप है, जिसकी स्थापना व्लादिमीर लेनिन ने की थी। यूक्रेनी राज्य का विचार रूसियों के लिए एक कल्पना है, जो वास्तव में कोई देश है ही नहीं। ऐसे में यूक्रेन पर हमला करना किसी संप्रभु देश में सैन्य हस्तक्षेप करने जैसा कुछ नहीं है। सोमवार को अपने भाषण के दौरान भी पुतिन ने आधुनिक यूक्रेन कहने में काफी सावधानी बरती थी। ऐतिहासिक रूप से, आधुनिक यूक्रेन के कुछ हिस्से काफी समय तक शाही रूस के अधीन थे। वहीं, कुछ अन्य हिस्से लिथुआनिया के ग्रैंड डची के कब्जे में भी रहे। लिथुआनिया का ग्रैंड डची पोलैंड और ऑस्ट्रो-हंगेरियन साम्राज्य का हिस्सा था। 1600 के दशक के अंत में यूक्रेन और क्रीमिया के कई इलाके तुर्की के ओटोमन साम्राज्य के जागीरदार थे। लेकिन एक राजनीतिक इकाई के रूप में यूक्रेन का इतिहास वाइकिंग्स के साथ शुरू हुआ।

यूक्रेन और रूस एक मध्ययुगीन वाइकिंग फेडरेशन कीवन रस से जुड़े हुए हैं। इस फेडरेशन ने रूस के नोवगोरोड से कीव तक शासन किया था। इनके शासन वाले क्षेत्र में रूस, बेलारूस और यूक्रेन का हिस्सा शामिल है। कीवन रस का अर्थ है रूस की भूमि। रूस शब्द की उत्पत्ति भी कीनव रस के रूस से हुई है। 9वीं शताब्दी में नॉर्समेन एथनिक ग्रुप के लोग पूर्वी तटीय स्वीडन में रोस्लागेन से नोवगोरोड पहुंचे। उन्होंने नोवगोरोड में रुरिकिड राजवंश की स्थापना की। इस राजवंश ने 16वीं शताब्दी में रूस के पहले जार इवान द टेरिबल से पहले 700 साल तक शासन किया। 1237-1242 के बीच मंगोल आक्रमण ने कीवन रस को काफी नुकसान पहुंचाया। मंगोलो ने इन लोगों के काफी बड़े इलाके पर कब्जा भी कर लिया था।1648 ईसवी  में पोलिश-लिथुआनियाई राष्ट्रमंडल के खिलाफ एकोसैक विद्रोह ने कोसैक हेटमैनेट की स्थापना की थी। इसके बाद इस क्षेत्र पर कब्जे के लिए पोलैंड, क्रीमिया, रूस, ओटोमन साम्राज्य के बीच 30 साल तक खूनी युद्ध हुआ। बार-बार युद्ध के कारण पीटर द ग्रेट को अहसास हुआ कि उन्हें इस इलाके में शांति स्थापित करने के लिए कोसैक हेटमैनेट को कुचलना होगा। पीटर द ग्रेट के इस सपने को कैथरीन द ग्रेट ने 1764 में अंजाम तक पहुंचाया। उन्होंने यूक्रेन पर कब्जा कर उसे रूसी साम्राज्य के अधीन कर दिया। जिसके बाद रूसी साम्राज्य ने 1783 में रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्रीमिया क्षेत्र पर कब्जा कर लिया।यूक्रेन रूस और पश्चिमी देशों के बीच बफर जोन का काम करता है। इसके बावजूद यूक्रेन ने 1990 के समझौते को तोड़कर नाटो का सदस्य बनने का फैसला किया। यूक्रेन को लगता है कि वह यूरोपीय संघ और नाटो का हिस्सा बनकर अपने देश की अर्थव्यवस्था को सुधार सकता है। वहीं, रूस को डर है कि अगर यूक्रेन नाटो का सदस्य बन गया तो दुश्मन देशों की पहुंच उसकी सीमा तक हो जाएगी। दूसरी दलील यह है कि पूर्वी यूक्रेन कोयले और लोहे से समृद्ध इलाका है। यहां की भूमि भी काफी उपजाऊ है। पुतिन की नजर पूर्वी यूक्रेन के खदानों पर भी है।1991 में केजीबी छोड़ने के बाद उन्होंने रूस की राजनीति में कदम रखा। वे पहली बार 1996 में राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन के प्रशासन में बतौर डिप्टी चीफ ऑफ स्टाफ शामिल हुए थे। इसके एक साल बाद उन्हें रूसी खुफिया एजेंसी केजीबी का अध्यक्ष बना दिया गया। 1999 की शुरुआत में येल्तसिन ने पार्टी के भीतर और बाहर भारी विरोध के बावजूद उन्हें रूस के प्रधानमंत्री के रूप में नियुक्त किया। उनके कद का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि येल्तसिन के अप्रत्याशित रूप से इस्तीफा दे देने के कारण 31 दिसम्बर 1999 को पुतिन को रूस का कार्यवाहक राष्ट्रपति नामित कर दिया गया था। इसके बाद पुतिन ने राजनीति के क्षेत्र में कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने साल 2000 और 2004 में रूस के राष्ट्रपति पद का चुनाव जीतकर अपने सभी विरोधियों को पस्त कर दिया था।उस समय के रूसी संविधान के अनुसार कोई भी राजनेता लगातार तीन बार रूस का राष्ट्रपति नहीं बन सकता था। यही कारण था कि 2008 में पुतिन ने अपने खास दिमित्री मेदवेदेव को रूस का राष्ट्रपति बनवाया और खुद प्रधानमंत्री के पद पर आसीन हुए। सितंबर 2011 में पुतिन के कहने पर रूस के संविधान में संशोधन किया गया, जिसके कारण रूस के राष्ट्रपति का कार्यकाल चार साल से बढ़ाकर छह साल कर दिया गया। मार्च 2012 में व्लादिमीर दोबारा चुनाव जीतकर रूस के राष्ट्रपति पद पर फिर आसीन हुए। 2018 में रूस में हुए राष्ट्रपति चुनाव में तो पुतिन को 75 फीसदी से ज्यादा मत मिले थे।अमेरिका समेत अधिकतर पश्चिमी देश रूस के खिलाफ दिखाई दे रहे हैं। ब्रिटेन ने तो रूस के पांच बैंकों और तीन बड़े बिजनेसमैन के खिलाफ प्रतिबंधों का ऐलान भी कर दिया है। जर्मनी ने भी नॉर्ड स्ट्रीम गैस पाइपलाइन प्रॉजेक्ट को रद्द करने के संकेत दिए हैं। अमेरिका भी रूस के खिलाफ कड़े प्रतिबंधों की तैयारी में जुटा हुआ है। उधर, यूरोपीय यूनियन ने भी रूस पर प्रतिबंधों को लेकर एक आपात बैठक बुलाई है। अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने पिछले हफ्ते कहा था कि ये मान्यता यूक्रेन की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को और कमजोर कर देगी, अंतरराष्ट्रीय कानून का घोर उल्लंघन होगाहम इतिहास से समझ सकते हैं कि मौजूदा तनाव तात्कालिक नहीं है बल्कि यह लंबे समय से चल रहा एक संकट है जो विकराल रूप धारण करने के लिए सही परिस्थितियों का इंतजार कर रहा था। वर्तमान में रूस की तरफ से स्थितियां पूरी तरह से तैयार हैं। रूस को लगता है कि उसके पास लड़ने के लिए, राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य जैसे आवश्यक संसाधन हैं, जिन्हें वह अस्तित्व को बनाए रखने की जरूरतों के रूप में देखता है। इसकी पुष्टि इस बात से होती है कि अमेरिका घरेलू राजनीतिक विभाजनों और अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों के चलते कमजोर है। इसमें चीन का लगातार मजबूत होना सबसे बड़ी चिंता है जिससे निपटने के लिए अमेरिका को इंडो-पैसिफिक में अपनी भू-राजनीतिक पहुंच को बढ़ाना होगा।बाद में ऑस्ट्रिया सोवियत संघ की आपत्तियों के बिना यूरोपीय संघ में शामिल हो गया। यह, वर्तमान संदर्भ में, यूक्रेन के लिए एक स्वीकार्य परिणाम होना चाहिए। जबकि यूरोप में मौजूदा संकट का समाधान कुछ दूर लगता है जिसकी कूटनीतिक पहल शुरू हो गई है। पहले दौर की वार्ता से यह संकेत नहीं मिलता है कि अमेरिका, नाटो और रूस के विचार करीब आए हैं। एक अनपेक्षित युद्ध छिड़ने का खतरा अभी भी बना हुआ है। यह महत्वपूर्ण है कि सार्वजनिक उद्घोषणाओं की आग के पीछे कुछ शांत और दृढ़ कूटनीतिक बातचीत हो रही है। सनद रहे कि इसका परिणाम यूरोप के एक नए सुरक्षा बंटवारे का गवाह बनेगा। सवाल यह है कि इसकी लाइन यूक्रेन से होकर गुजरेगी या नहीं?विशेषज्ञों का कहना है कि रूस पूर्वी यूरोप में अपने कदम वापस खींचता नहीं दिख रहा है और उसकी आक्रामकता बनी हुई है। रूस ने एक लाख सैनिकों को यूक्रेन की सीमा पर तैनात किया है। रूसी हमले के खतरे को देखते हुए अमेरिका के विदेश मंत्रालय ने अपने दूतावास में स्थित नागरिकों से कहा है कि वे यूक्रेन को छोड़कर चले जाएं। अमेरिका का एयरक्राफ्ट कैरियर यूएसएस हैरी एस ट्रूमैन अब नाटो के नियंत्रण में आ गया है। शीत युद्ध की समाप्ति के बाद ऐसा पहली बार हो रहा है जब अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर नाटो के नियंत्रण में आया है।पुतिन ने बेलारूस के राष्ट्रपति अलेक्सांद्र लुकाशेंको का राजधानी शहर मिन्स्क में विरोध प्रदर्शनों पर बड़े पैमाने पर क्रूर कार्रवाई करने का समर्थन किया है। कई मौके पर पुतिन ने देखा है कि कुछ प्रमुख पश्चिमी राजनीतिक नेताओं ने रूस के साथ गठबंधन किया है। ये गठबंधन पश्चिमी देशों को पुतिन के खिलाफ एकीकृत मोर्चा बनाने से रोक सकते हैं। उदाहरण के लिए, जर्मनी के पूर्व चांसलर गेरहार्ड श्रोएडर ने पद पर रहते हुए यूरोप और रूस के बीच रणनीतिक सहयोग की वकालत की। बाद में वह 2017 में रूसी तेल कंपनी रोसनेफ्ट के अध्यक्ष बन गए।रूस और यूक्रेन के बीच साल 2014 से ही तनाव देखा जा रहा है। इसी साल रूस ने आक्रमण कर यूक्रेन के क्रीमिया प्रायद्वीप पर कब्जा कर लिया था। उस समय रूसी सेना का मुकाबला करने के लिए यूक्रेनी सैनिक अपनी पूरी जी-जान से लड़े, लेकिन हार को वो टाल न सके। विशेषज्ञों के अनुसार, यूक्रेन की सेना का मनोबल ऊंचा है, लेकिन उसके पास हथियारों की कमी है। इसी हथियारों की कमी को पूरा करने के लिए नाटो देश दिल खोलकर यूक्रेन की मदद कर रहे हैं। हाल में ही अमेरिका ने अपने कई जंगी जहाज और हथियारों को यूक्रेन भेजा है। इन हथियारों में एंटी टैंक मिसाइल, एंटी एयरक्राफ्ट मिसाइल, आर्मर्ड व्हीकल, टैंक और तोप के गोले शामिल हैं। इतना ही नहीं, कई रिपोर्ट्स तो ऐसी भी है कि अमेरिकी सेना की एक टुकड़ी यूक्रेनी सेना और गोरिल्ला लड़ाकों को रूस के खिलाफ जंग के लिए ट्रेनिंग भी दे रही है।यूक्रेन परंपरागत तौर पर सोवियत संघ का हिस्सा है। आज से 30 साल पहले सोवियत संघ के विघटन के समय यह वर्तमान रूस से अलग हुआ था। यूक्रेन के हिस्से में सोवियत संघ के जमाने के कई महत्वपूर्ण स्थल, बंदरगाह और सैन्य निर्माण ईकाईयां आईं थीं। हालांकि, आजादी के बाद यूक्रेन परंपरागत तौर पर रूस का हमदम बना रहा। साल 2014 तक विक्टर यानुकोविच के राष्ट्रपति पद से अपदस्थ होने तक दोनों देशों के रिश्ते काफी मजबूत थे। लेकिन, उनके हटते ही यूक्रेन में रूस विरोधी सरकार आ गई। इस कारण यूक्रेन के रूसी भाषी क्षेत्रों में अस्थिरता पैदा होने लगी। सबसे अधिक प्रभावित क्रीमिया में बढ़ते यूक्रेन विरोधी विद्रोह का फायदा रूस को मिला। इसी को आधार बनाकर 2014 में रूस ने क्रीमिया पर हमला किया और कब्जा कर लिया। तब से दोनों देशों के बीच तनाव लगातार बना हुआ है। तब से लेकर अबतक क्रीमिया में रूस समर्थक विद्रोहियों और यूक्रेनी सेना के बीच जारी लड़ाई में 14 हजार से अधिक लोग मारे जा चुके हैं।रूस से जारी तनाव के बीच नाटो सदस्य देशों ने यूक्रेन को अत्याधुनिक हथियारों की सप्लाई शुरू कर दी है। यूक्रेन को हथियार भेजने में अमेरिका, ब्रिटेन, पोलैंड, तुर्की, लिथुआनिया, लातविया और एस्टोनिया समेत कई अन्य पश्चिमी देश शामिल हैं। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि पूर्वी यूरोप में जारी तनाव जल्द ही युद्ध को शुरू कर सकता है। उधर, रूस ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि उसकी सीमा के पास नाटो के हथियार अस्वीकार्य हैं। अगर यूक्रेन में इन हथियारों को तैनात किया जाता है और वह नाटो इस क्षेत्र में अपना विस्तार जारी रखता है तो इसके परिणामों के लिए रूस जिम्मेदार नहीं होगा।आज यूक्रेन और रूस के बीच जो युद्ध चल रहा है उसका मुख्य कारण नाटो देश हैं और नाटो ने यूक्रेन के राष्ट्रपति को माइंड वास कर दिया है उसे अच्छा बुरा समझ में नहीं आ रहा है निर्दोष जनता मर रही है सिर्फ यूक्रेन के राष्ट्रपति के जरा सी गलती का परिणाम आज हजारों की संख्या में मृत्यु हो चुकी होगी शहर के शहर बम तोपों से बर्बाद हो रहे हैं यूक्रेन बातचीत से मसले को हल नहीं करना चाहता ना ही इस तरह के कदम उठा रहा है ,क्योंकि दूर से बैठा अमेरिका तमाशा देख रहा है ,यूक्रेन बर्बादी का बहुत ही करीब पहुंच चुका है यूक्रेन के लिए रूस के साथ जंग मैं यूक्रेन को भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

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