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Thursday, March 3, 2022

युद्ध से समस्या का हल नहीं..............

देवेश प्रताप सिंह राठौर

.............(एडिटर)....

युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं बात करते हैं लड़ाई या किसी युद्ध या देश हो या परिवार और समाज हो या घर की लड़ाई युद्ध अंत में प्रणाम यह निकलते हैं कि दोनों तरफ युद्ध में कितना नुकसान हुआ उसकी भरपाई नहीं की जा सकती सब बर्बाद कर देती है और बाद में एक ही विकल्प होता है समझौता और उस समय समझौता होता है जब बहुत कुछ उजड़ चुका होता है अगर यही सोच पहले बन जाए की युद्ध नहीं करना है ना किसी के बरगलाने में आए तो मुझे लगता है बड़े से बड़े युद्ध डाले जा सकते हैं। इस तरह की घटनाएं दुर्घटनाएं युद्ध को टाला जा सकते हैं।युद्ध किसी भी समस्या के समाधान नहीं होते हैं ! युद्ध में अपार जन-धन की हानि होने के बाद अन्त में आमने-सामने मेज पर बैठ कर ही उसका समाधान होता है  ये बातें यथार्थ और कटु सत्य हैं। तब भी युद्ध होते अभी हाल ही


में रूस ने यूक्रेन पर हमला किया है इस युद्ध में भी यूक्रेन और रूस दोनों ही तरफ के सैनिकों सहित आम लोग भी दर्दनाक तरीके से अपने अमूल्य जीवन खो रहे हैं ! यह बहुत ही दुःखद और गंभीर मानवीय चिंता की बात है। इस युद्ध के लिए दुनिया भर में तरह-तरह के तर्क कुतर्क अमेरिका सहित उसके नाटो सैन्य गठबंधन में शामिल देशों की  एक तानाशाह, युद्ध-पिपासु, खलनायक और मानवहंता की छवि गढ़ने के साथ लेखों की भरमार है ! लेकिन क्या इस दुनिया के निष्पक्ष और न्यायपरक लोगों और मीडिया संस्थानों की नजरों में भी यूक्रेन और रूस के युद्ध के लिए क्या रूस और उसके राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ही इकलौते जिम्मेदार हैं ? आइए एक न्यायोचित,निष्पक्ष समीक्षा करने की कोशिश करते हैं। 1991 से पूर्व यह दुनिया सोवियत संघ और संयुक्त राज्य अमेरिका नामक दो ताकतवर देशों के रूप में शक्ति के दो केन्द्रों में विभाजित थी, दोनों ही महाशक्तियाँ अपने-अपने वारसा और नाटो सैन्य गठबंधन के तहत अपनी शक्ति की जोर आजमाइश करती रहती थीं, लेकिन 26 दिसम्बर 1991 को सोवियत संघ नामक महाशक्ति का विघटन हो गया। सोवियत संघ में सम्मिलित सारे देश स्वतंत्र हो गए। सोवियत संघ निर्मित वारसा सैन्य संगठन भी विखर गया ! अब पूरी दुनिया अमेरिका रूपी महाशक्ति के रूप में एकध्रुवीय हो गई, क्योंकि सोवियत संघ के विघटन के बाद उसका सबसे बड़ा विखंडित भाग रूस भी अब आर्थिक और सैन्यतौर पर भी संयुक्त राज्य अमेरिका के सामने बिल्कुल कमतर, कमजोर और बौना हो गया ! इसलिए कम्युनिस्ट ब्लॉक के वारसा सैन्य संगठन के बिखरने के बाद अमेरिका नीत नाटो सैन्य संगठन का भी कोई खास प्रयोजन नहीं रह गया ,खाड़ी युद्ध जिसे प्रथम खाड़ी युद्ध के रूप में भी जाना जाता है,2 अगस्त 1990 - 28 फ़रवरी 1991संयुक्त राज्य के नेतृत्व में चौंतीस राष्ट्रों से संयुक्त राष्ट्र के अधिकृत गठबंधन बल ईराक के खिलाफ छेड़ा गया युद्ध था, इस युद्ध का उद्देश्य 2 अगस्त 1990 को हुए आक्रमण और अनुबंध के बाद इराकी बलों को कुवैत से बाहर निकालना था।इस युद्ध को इराकी नेता सद्दाम हुसैन के द्वारा सभी युद्धों की मां भी कहा गया है और इसे सैन्य अनुक्रिया द्वारा सामान्यतया डेजर्ट स्टॉर्म, या ईराक युद्ध के नाम से भी जाना जाता है।इराकी सैन्य बलों के द्वारा कुवैत का आक्रमण जो 2 अगस्त 1990 को शुरू हुआ, इसकी अंतर्राष्ट्रीय निंदा की गयी और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सदस्यों के द्वारा इराक के खिलाफ तत्काल आर्थिक प्रतिबन्ध लागू किया गया। अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज एच डब्ल्यू बुश ने सऊदी अरब के लिए अमेरिकी बलों को नियुक्त किया और अन्य देशों से उनके सैन्य बलों को इस स्थान पर भेजने का आग्रह किया। कई राष्ट्र खाड़ी युद्ध के गठबंधन में शामिल हो गए। गठबंधन में सैन्य बलों का बहुमत संयुक्त राज्य अमेरिका, सऊदी अरब, संयुक्त राष्ट्र और इजिप्ट से प्राप्त हुआ, ये इसी क्रम में अग्रणी योगदानकर्ता देश थे। लगभग 60 बिलियन लागत के 40 बिलियन का भुगतान सऊदी अरब के द्वारा किया गया।इराकी सैन्य दलों को कुवैत से निकालने का प्रारंभिक संघर्ष 17 जनवरी 1991 को एक हवाई बमबारी के साथ शुरू हुआ। इसके बाद 23 फ़रवरी को एक जमीनी आक्रमण किया गया। यह गठबंधन बलों के लिए एक निर्णायक जीत थी, जिसने कुवैत को मुक्त कर दिया और इराकी क्षेत्र में उन्नत कर दिया। गठबंधन ने अपने अडवांस को रोक लिया और जमीनी अभियान के शुरू होने के 100 घंटे बाद संघर्ष विराम (सीज़-फायर) की घोषणा की। हवाई और जमीनी युद्ध इराक, कुवैत और सऊदी अरब की सीमा के क्षेत्रों तक सीमित था। हालांकि, इराक ने सऊदी अरब में गठबंधन सैन्य लक्ष्य के खिलाफ मिसाइलें यह मजहबी कट्टरता और धर्मांधता ही है, जो जिहादी आतंकवाद को खाद-पानी दे रही है।

बहुत दिन नहीं हुए, जब भारत की एक पहचान यह भी थी कि दुनिया में दूसरी सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाला देश होने के बावजूद यहां का एक भी मुस्लिम अलकायदा का सदस्य नहीं है, लेकिन स्थिति किस तरह बदल गई, इसका ताजा प्रमाण है राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी एनआइए की ओर से केरल और बंगाल में इस आतंकी संगठन के नौ सदस्यों की गिरफ्तारी। ऐसे तत्वों की गिरफ्तारी का यह पहला मामला नहीं। अलकायदा के साथ-साथ एक अन्य खूंखार आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट के आतंकी भी गिरफ्तार किए जा चुके हैं। कुछ समय पहले ही बेंगलुरु में इस्लामिक स्टेट के खुरासान गुट के लिए काम करने वाले एक डॉक्टर को गिरफ्तार किया गया था। एक तथ्य यह भी है कि भारत के विभिन्न् हिस्सों से अफगानिस्तान और सीरिया गए कई आतंकी मारे भी जा चुके हैं। इनमें से कई अच्छे-खासे पढ़े-लिखे और संपन्न् परिवारों के थे। गत दिवस केरल और बंगाल से गिरफ्तार आतंकी भी शिक्षित बताए जा रहे हैं। इसका मतलब तो यही है कि इस मिथ्या धारणा के लिए अब कोई स्थान नहीं रह गया है कि जहालत और गरीबी मुस्लिम युवाओं को आतंकवाद की ओर मोड़ रही है। वास्तव में यह मजहबी कट्टरता और धर्मांधता है, जो जिहादी आतंकवाद को खाद-पानी दे रही है। इसमें एक बड़ी भूमिका इंटरनेट और खासकर सोशल मीडिया निभा रहा है।इंटरनेट मीडिया पर ऐसे शब्दों का उच्चारण नहीं होना चाहिए जो संदेश गलत जनता तक पहुंचे इस पर लगाम लगाई जाने की जरूरत है।

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