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Tuesday, February 15, 2022

क्या समस्याओं से छुटकारा ग्रामीण और शहरी क्षेत्र का काम होगा

देवेश प्रताप सिंह राठौर .(दीपू)

संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान में दुनिया की आधी आबादी शहरों में रह रही है। वर्ष 2050 तक भारत की आधी आबादी महानगरों व शहरों में निवास करने लगेगी। एक दूसरी संस्था ऑक्सफोर्ड इकॉनोमिक के अध्ययन के मुताबिक वर्ष 2019 से लेकर वर्ष 2035 के बीच सबसे तेज़ी से बढ़ने वाले सभी शीर्ष दस शहर भारत के ही होंगे। विश्व बैंक की वर्ष 2015 की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत का अर्थात अघोषित एवं अस्त-व्यस्त है। भारत का शहरी विस्तार देश की कुल आबादी का 55.3% है परंतु आधिकारिक जनगणना के आँकड़े इसका विस्तार केवल 31.2% ही बताते हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में 53 ऐसे शहर हैं जिनकी आबादी 10 लाख से अधिक है। इसके अलावा देश की राजधानी दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, बंगलूरू और हैदराबाद जैसे महानगर हैं जिनकी आबादी लगातार बढ़ रही है। लोग बेहतर भविष्य की तलाश में यहाँ पहुँचते और बसते रहते हैं।


   शहरीकरण से संबंधित समस्याओं में चाहे बंगलूरू की प्रदूषित झीलें हों या गुरुग्राम का ट्रैफिक जाम और मुंबई की बारिश हो या फिर दिल्ली का वायु प्रदूषण। शहरीकरण का नकारात्मक प्रभाव अलग-अलग तरीके से हर जगह देखने को मिल रहा है।इस आलेख में शहरीकरण के कारण, उससे संबंधित समस्याएँ तथा इन समस्याओं का समाधान तलाशने का प्रयास किया जाएगा।शहरी क्षेत्रों के भौतिक विस्तार मसलन क्षेत्रफल, जनसंख्या जैसे कारकों का विस्तार शहरीकरण कहलाता है। शहरीकरण भारत समेत पूरी दुनिया में होने वाला एक वैश्विक परिवर्तन है। संयुक्त राष्ट्र संघ के मुताबिक़ ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों का शहरों में जाकर रहना और वहाँ काम करना भी 'शहरीकरण' है।‘नवीन भारत (New India)’ पहल को आगे बढ़ाने की दिशा में शहरी बुनियादी ढाँचों में सुधार के लिये शहरीकरण के प्रति समग्र दृष्टिकोण अपनाने की प्रक्रिया अपनाई जा रही है।भारतीय समाज में किसी क्षेत्र को शहरी क्षेत्र माने जाने के लिये आवश्यक है कि किसी मानव बस्ती की आबादी में 5000 या इससे अधिक व्यक्ति निवास करते हों।इस मानव आबादी में कम से कम 75% लोग गैर-कृषि व्यवसाय में संलग्न हों।जनसंख्या घनत्व 400 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी. से कम नहीं होना चाहिये।इसके अतिरिक्त कुछ अन्य विशेषताएँ मसलन उद्योग, बड़ी आवासी बस्तियाँ, बिजली और सार्वजनिक परिवहन जैसी व्यवस्था हो तो इसे शहर की परिभाषा के अंतर्गत माना जाता है।आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2001 तक भारत की आबादी का 27.81% हिस्सा शहरों में रहता था। वर्ष 2011 तक यह 31.16% और वर्ष 2018 में यह आँकड़ा बढ़कर 33.6% हो गया।वर्ष 2001 की जनगणना में शहर-कस्बों की कुल संख्या 5161 थी, जो वर्ष 2011 में बढ़कर 7936 हो गई।भारत की शहरी आबादी का लगभग 17.4% झुग्गी-झोपड़ी में रहता हैसंयुक्त राष्ट्र की एक नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान में विश्व की आधी आबादी शहरों में रहने लगी है और वर्ष 2050 तक भारत की आधी आबादी महानगरों और शहरों में रहने लगेगीभारत में शहरीकरण तेज़ी से बढ़ रहा है और वैश्विक स्तर पर भी तब तक कुल आबादी का 70% हिस्सा शहरों में निवास करने लगेगशहरीकरण के बढ़ने का एक प्रमुख कारण बेरोज़गारी है। शहरों में आने वाले लोगों में अधिक संख्या नौकरी की तलाश करने वालों की है, न कि बेहतर नौकरी पाने वालों की तथा बाहर से आने वालों में बेरोज़गारी की दर अपेक्षाकृत कम है।   गाँव से शहरों की ओर पलायन का मुख्य कारण वेतन-दर तो है ही इसके अलावा दो अन्य प्रमुख कारण है- जोत की कम भूमि और परिवार का बड़ा आकार, शहरी प्रवासन के लिये जाति-प्रथा भी एक महत्त्वपूर्ण कारक है।शहरीकरण की सबसे बड़ी समस्या प्रदुषण है| शहर में प्रदूषित हवाओं से लोगों को सिलोकोसिस और फेफड़ों के कैंसर जैसी बीमारियों हो रही है| भारत में प्रदुषण का स्तर विश्व सेहत संगठन से समझा जा सकता है| वर्ष 2016 में इस रिपोर्ट ने विश्व के 15 सबसे अधिक प्रदूषित शहरों की लिस्ट पेश की थी जिसमें अकेले भारत के 14 शहरों के नाम शामिल थे| 2010 की रिपोर्ट के मुताबिक देहली संसार का सबसे प्रदूषित शहर था| और आज भी है 2011 की रिपोर्ट में भी दिल्ली प्रदूषित शहरों की सूची में शामिल थे| 2013, 2014 व 2015 में भी विश्व के 20 सबसे प्रदूषित शहरों में भारत के चार से सात शहर शामिल थे ।

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