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Sunday, February 13, 2022

जैसी संगत वैसा स्वरूप ...............................

देवेश प्रताप सिंह राठौर (दीपू)....... 

    मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह समाज में ही जन्मता और समाज में ही रहता, पनपता और अन्त तक उसी में रहता है। अपने परिवार, सम्बन्धियों और पास–पड़ोस वालों तथा अपने कार्यक्षेत्र में वह विभिन्न प्रकार के स्वभाव वाले व्यक्तियों के सम्पर्क में आता है। निरन्तर सम्पर्क के कारण एक–दूसरे का प्रभाव एक–दूसरे के विचारों और व्यवहार पर पड़ते रहना स्वाभाविक है। बुरे आदमियों के सम्पर्क में हम पर बुरे संस्कार पड़ते हैं और अच्छे आदमियों के सम्पर्क में आकर हममें गुणों का समावेश होता चला जाता है।सत्संगति का अर्थ है अच्छे आदमियों की संगति, गुणी जनों का साथ। अच्छे मनुष्य . का अर्थ है वे व्यक्ति जिनका आचरण अच्छा है, जो सदा श्रेष्ठ गुणों को धारण करते और अपने सम्पर्क में आने वाले व्यक्तियों के प्रति अच्छा बर्ताव करते हैं। जो सत्य का पालन करते हैं, परोपकारी हैं, अच्छे चरित्र ‘ के सारे गुण जिनमें विद्यमान हैं, जो निष्कपट एवं दयावान हैं, जिनका व्यवहार सदा सभी के साथ अच्छा रहता है–ऐसे अच्छे व्यक्तियों के साथ रहना, उनकी बातें सुनना, उनकी पुस्तकों को पढ़ना, ऐसे


सच्चरित्र व्यक्तियों की जीवनी पढ़ना और उनकी अच्छाइयों की चर्चा करना सत्संगति के ही अन्तर्गत आते हैं।बुजुर्गों के आशीषों और शुभकामनाआ के साथ ही घर तरक्की करते हैं, लेकिन इनकी उपस्थिति का सबसे ज्यादा सकारात्मक प्रभाव छोटे बच्चों की परवरिश पर पड़ता है।जो बच्चे बुजुर्गों के साए में पले-बड़े होते हैं, उनके व्यवहार से इसका पता चल जाता है। बुजुर्ग, बच्चों को न केवल संस्कार व प्यार देते हैं बल्कि समय-समय पर बच्चों के डॉक्टर, शिक्षक, दोस्त भी बन जाते हैं। दादा-दादी, नाना-नानी की देखरेख में रहे लोग बड़े भाग्यशाली होते हैं। बड़ों का होना सुरक्षा, संस्कार, संवेदना, ज्ञान और अपनी पारिवारिक जड़ों से जोड़े रखने के लिए अति आवश्यक है।बच्चों का जिंदा इतिहास से परिचय करवाना, किस्से-कहानियों के द्वारा उन्हें संस्कृति-धर्म की जानकारी देना, लोरियों व गानों के माध्यम से, लोक संस्कृति से रूबरू करवाना बुजुर्गों द्वारा ही संभव है। उनका जीवन जीने की कला सिखाने का अलग ही तरीका होता है जो प्यार और दुलार से भरा होता है।अक्सर हम देखते हैं कि दादी-नानी बच्चों को प्यार से पारंपरिक खाने खिलाती हैं, कभी हाथ से चूरी कूटकर देना, उन्हें अपनी गोद में बिठाकर खाना खिला देना, प्यार से दूध पिला देना, बातों-बातों में उनकी जिद्द को तोड़कर काम करना इत्यादि। आज के युग में तो वैसे भी बुजुर्गों की कद्र नहीं हो रही, ऐसे में जरूरत है कि बुजुर्गों की परवरिश हो,बात पढ़ने में सामान्य लग सकती है लेकिन बहुत गहरी है। जो बच्चे बुजुर्गों के साथ रहते हैं उनके विचार दूसरे बच्चों की तुलना में बेहतर होते हैं। वे दूसरों की भावनाओं के प्रति संवेदनशील होते हैं और सबकी परवाह करते हैं। एकल परिवारों के बच्चों में केवल अपना और अपने परिवार का स्वार्थ देखने की आदत बनने के आसार अधिक होते हैं, वहीं बुजुर्गों के साथ रहने वाले बच्चे आसपास के लोगों, दोस्तों और समाज की भी फिक्र करते हैं।बात पढ़ने में सामान्य लग सकती है लेकिन बहुत गहरी है। जो बच्चे बुजुर्गों के साथ रहते हैं उनके विचार दूसरे बच्चों की तुलना में बेहतर होते हैं। वे दूसरों की भावनाओं के प्रति संवेदनशील होते हैं और सबकी परवाह करते हैं। एकल परिवारों के बच्चों में केवल अपना और अपने परिवार का स्वार्थ देखने की आदत बनने के आसार अधिक होते हैं, वहीं बुजुर्गों के साथ रहने वाले बच्चे आसपास के लोगों, दोस्तों और समाज की भी फिक्र करते हैं।संगत का असर सब कुछ बदल देता है। संगत अर्थात् दोस्ती, मित्रता, साथ|  संगत के कारण चाल-ढाल, पहरावा, खानपान, बात करने का तरीका, चरित्र, हर चीज़ में बदलाव आ जाता है। हमारी संगत व मित्रता का हमारे जीवन पर बहुत गहरा असर पड़ता है| क्यों ज़रूरी है नेक लोगों का संग करना? इसी बात को हम आज एक आर्टिकल के जरिए बताने जा रहे हैं।आपने यह कहावत तो सुनी होगी कि खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है। इस कहावत का अर्थ यह है कि संगत का असर हर किसी पर, कम या अधिक, होता ही है। इस कहावत से मिलती-जुलती राय वैज्ञानिकों की भी है जिनका यही कहना है कि बच्चों की आदतों पर उनके भाई-बहनों और मित्रों के व्यवहार और तौरतरीकों का बहुत ज्यादा असर होता है। बच्चे ज्यादातर बातें अपने भाई-बहनों व अपने माँ-बाप को देखकर ही सीखते हैं।जैसे एक ही स्वाति बूंद केले के गर्भ में पड़कर कपूर बन जाती है, सीप में पड़कर मोती बन जाती है और अगर सांप के मुंह में पड़ जाए तो विष बन जाती है। ठीक उसी तरह इंसान की संगत का उस पर अच्छा या बुरा प्रभाव ज़रूर पड़ता है|कहते हैं कि व्यक्ति योगियों के साथ योगी और भोगियों के साथ भोगी बन जाता है। व्यक्ति को जीवन के अंतिम क्षणों में गति भी उसकी संगति के अनुसार ही मिलती है। संगति का जीवन में बड़ा गहरा प्रभाव पड़ता है। नेक संगति से मनुष्य जहां महान बनता है, वहीं बुरी संगति उसका पतन भी करती है। छत्रपति शिवाजी बहादुर बने। ऐसा इसलिए, क्योंकि उनकी मां ने उन्हें वैसा वातावरण दिया।ऐसे ही कुछ दिन पहले मैं भारत की एक ऐसी संस्था, जिसको डेरा सच्चा सौदा के नाम से जाना जाता है, में गई और वहां मैंने देखा कि ऐसे संत हुए हैं जिनका संग करने से करोडों जिंदगियों में बदलाव आया। जहां लोग नशों में धुत्त रहते थे, वैश्य वृत्ति में फंसे हुए थे, चोरी ,ठग्गी, बेईमानी, मोह, लोभ, अंहकार, माया, रिश्वतखोरी आदि जैसी बुराइयों के नुमाइंदे थे, वहां मैंने देखा कि उन लोंगों ने उस सच्चे महापुरुष का संग करके सभी बुराइयों को अलविदा कहा और सच्चे संग के असर को एक नई मिसाल दी। उनका कहना है कि जहां दुनियावी नेक संग से हम दुनियावी ऊँचाइयों को छू सकते हैं, वहीं सत्संग से ना केवल हम दुनियावी, बल्कि रूहानियत ऊँचाइयों को भी छू सकते हैं और अपने अंदर के विकारों से भी निजाद पा सकते हैं| इसलिए आप जहां भी रहें, अपनी मित्रता व संगति का ध्यान रखें, सदा नेकी का संग करें और हो सके तो सर्वश्रेष्ठ सत्संग करें|।   आपने यह कहावत तो सुनी होगी कि खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है। इस कहावत का अर्थ यह है कि संगत का असर हर किसी पर कम या अधिक होता ही है। इस कहावत से मिलती-जुलती राय समाजविज्ञानियों और वैज्ञानिकों की भी है। वैज्ञानिकों का कहना है कि बच्चों की आदतों पर उनके भाई-बहनों और मित्रों के व्यवहार और तौरतरीकों का बहुत ज्यादा असर होता है। बच्चे ज्यादातर बातें अपने भाई-बहनों को देखकर ही सीखता हैं।

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