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Saturday, January 15, 2022

अरण्य कांड की कथा सुन श्रोता हुए भावुक

चित्रकूट, सुखेन्द्र अग्रहरि। भगवान श्रीराम की तपोस्थली कामतानाथ पर्वत की तलहटी ग्राम पंचायत बिहारा के पेरातीर हनुमान मंदिर परिसर में श्रीराम कथा के आठवें दिन शनिवार को श्रीरामचरित मानस के अरण्य कांड और किष्किंधा कांड में वर्णित विविध प्रसंगों की कथा सुनाई गई। सीता हरण की कथा सुन श्रद्धालु भावुक हो गए। सुग्रीव की मैत्री, सीता की खोज और सीता की खोज में हनुमान के लंका गमन की कथा भी हुई। भजन गंगा में श्रद्धालु गोते लगाते रहे।

कथा का रसपान कराते हुए आचार्य नवलेश दीक्षित ने कहा अरण्य कांड के प्रारंभ में भगवान शिव पार्वती को सावधान करते हैं कि अब राम की गूढ़ कथा सुनने जा रहा हूँ। सावधानी से नही सुना तो विमूढ़ व्यक्ति यह कथा सुनकर मोह में फंस जाता है। पूर्व में यही कथा सुनकर सती को मोह हो गया था। उन्होंने कहा कि एक दिन माता जानकी जी का पुष्पों से भगवान ने श्रृंगार किया। श्रृंगार युक्त मां फटिक शिला पर बैठ गईं। इंद्र का पुत्र जयंत भ्रमित हो प्रभु राम का परीक्षण करने कौवा बन मां सीता के पांव में चोंच मार दिया। मां ने सोचा पुत्र है। क्षमा कर दिया।

भागवतरत्न नवलेश दीक्षित।

उधर रुधिर की धारा बहने से रामजी जान गए। वह चटाई से दो कुशा निकाले, एक का तीर धनुष बनाया और संधान कर छोड़ दिया। जयंत भागा, इंद्र, ब्रह्मा समेत तीनों लोक में शरण नहीं मिली। नारद की सलाह पर प्रभु के चरणों में आया। बोला पहले प्रभाव और अब स्वभाव देखने आया हूं। प्रभु ने एक आंख फोड़ कर क्षमा कर दिया। कहा कि प्रभु अत्रि ऋषि के आश्रम पहुंचे। मां सती अनुसुईया ने सीता जी को उपदेश किया। वहां से सरभंग ऋषि आश्रम जाते समय एक राक्षस का वध किये। सुतीक्षण, फिर अगस्त्य ऋषि के आश्रम पहुंचे। अगस्त्य ने रघु के बाण को राम को सौंपा। पंचवटी में सूर्पणखा भगवान राम से विवाह का प्रस्ताव दिया। ठुकराने पर सूर्पणखा क्रुद्ध हुई। लक्ष्मण ने नाक कान काटकर भेज दिया। खर दूषण का वध हुआ। सूर्पणखा रावण के पास पहुंची। रावण सोचता है कि मनसा वाचा कर्मणा मैं तामसिक हूं, मैं भजन कर सकता हूं, लेकिन युद्ध कर सकता हूं। मेरी गति हो जायेगी। सोने के मारीच का प्रभु राम वध करते हैं। रावण सीता का हरण करता है। जटायु रक्षा को आगे आते हैं। इधर रघुनाथ जी कुटिया में मां सीता को न पाकर विलाप करने लगे। भगवान पशु पक्षियों से पूछते जटायु के पास पहुंचे और उनका उद्धार किया। भगवान राम की सुग्रीव से मैत्री होती है। बालि का वध होता है। वानरों संग सीता को ढ़ूंढ़ते राम समुद्र तट पर पहुंचते हैं। संपाति के बताने पर जामवंत की प्रेरणा से सीता की खोज को हनुमान लंका को प्रस्थान करते हैं। इस दौरान मुख्य यजमान उनकी धर्मपत्नी हीरामणि, कथा के आयोजक भोलेराम शुक्ला, श्याम लाल द्विवेदी, रमाकांत मिश्रा, उदयभान द्विवेदी, विकास शुक्ला आदि मौजूद रहे।


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