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Sunday, January 9, 2022

...सब सिक्खन को हुक्म है गुरू मान्यो ग्रंथ

सिखों के दसवें गुरू गुरू गोविंद सिंह के 356 वे प्रकाश पर्व पर धर्म की नसीहत

डीएम ने गुरुद्वारे में शबद कीर्तन कार्यक्रम में शामिल होकर छका लंगर

 फतेहपुर, शमशाद खान । सिख धर्म के दसवे गुरू गुरु गोविन्द सिंह का रविवार प्रकाश पर्व मनाया गया। गुरुद्वारा में सबद व कीर्तन कार्यक्रम के बाद लंगर का आयोजन किया गया।

रेल बाजार के गुरुद्वारा में प्रकाश पर्व पर रोशनी डालते हुए ज्ञानी जी ने बताया कि गुरु गोबिंद सिंह सिखों के दसवें गुरु हैं। इनका जन्म पौष सुदी सातवीं सन् 1666 को पटना में माता गुजरी तथा पिता गुरु तेगबहादुर के घर हुआ। उस समय गुरु तेगबहादुर बंगाल में थे। उन्हीं के वचन पर गुरुजी का नाम गोविंद राय रखा गया। 1670 में उनका परिवार फिर पंजाब आ गया। मार्च 1672 में उनका परिवार हिमालय के शिवालिक पहाड़ियों में स्थित चक्क नानकी नामक स्थान पर आ गया। चक्क नानकी ही आनन्दपुर साहिब है। यहीं पर इनकी शिक्षा आरम्भ हुई। उन्होंने फारसी, संस्कृत की शिक्षा ली और एक योद्धा बनने के लिए सैन्य कौशल सीखा। गोविन्द राय नित्य प्रति आनदपुर साहब में आध्यात्मिक आनन्द बाँटते, मानव मात्र में नैतिकता, निडरता तथा आध्यात्मिक जागृति का संदेश देते थे। आनंदपुर वस्तुतः आनंदधाम ही था। यहाँ पर सभी लोग वर्ण, रंग, जाति, सम्प्रदाय के भेदभाव के बिना समता,

शबद कीर्तन में भाग लेतीं महिलाएं।

समानता एवं समरसता का अलौकिक ज्ञान प्राप्त करते थे। गुरु गोविन्द सिंह, शान्ति, क्षमा, सहनशीलता की मूर्ति थे। कश्मीरी पण्डितों का जबरन धर्म परिवर्तन करके मुसलमान बनाये जाने के विरुद्ध फरियाद लेकर गुरु तेग बहादुर के दरबार में आये और कहा कि हमारे सामने ये शर्त रखी गयी है कि है कोई ऐसा महापुरुष, जो इस्लाम स्वीकार नहीं कर अपना बलिदान दे सके तो आप सब का भी धर्म परिवर्तन नहीं किया जाएगा। उस समय गुरु गोबिन्द सिंह नौ साल के थे। उन्होंने पिता गुरु तेग बहादुर से कहा कि आपसे बड़ा महापुरुष और कौन हो सकता है! कश्मीरी पण्डितों की फरियाद सुन उन्हें जबरन धर्म परिवर्तन से बचाने के लिए स्वयं इस्लाम न स्वीकारने के कारण 11 नवम्बर 1675 को औरंगज़ेब ने दिल्ली के चांदनी चौक में सार्वजनिक रूप से उनके पिता गुरु तेग बहादुर का सिर कटवा दिया। इसके पश्चात वैशाखी के दिन 29 मार्च 1676 को गोविन्द सिंह सिखों के दसवें गुरु घोषित हुए। 10 वें गुरु बनने के बाद भी उनकी शिक्षा जारी रही। शिक्षा के अन्तर्गत उन्होनें लिखना-पढ़ना, घुड़सवारी तथा सैन्य कौशल सीखे 1684 में उन्होने चण्डी दी वार की रचना की। 1685 तक वह यमुना नदी के किनारे पाओंटा साहिब नामक स्थान पर रहे। सिखों के 10वें गुरु, गुरु गोविंद सिंह का जन्म पटना साहिब में हुआ था, जहां उनकी याद में एक खूबसूरत गुरुद्वारा भी निर्मित किया गया है। गुरु गोविंद सिंह ने सन् 1699 में खालसा पंथ की स्थापना की थी। उन्होंने ही गुरुग्रंथ साहिब को सिखों का गुरु घोषित किया। गुरु गोविंद सिंह के सच्चाई के रास्ते पर चलकर जीवन जीने के लिए दिए गए उपदेश आज भी प्रासंगिक है। इसके साथ ही आप धर्म, संस्कृति और देश की आन-बान और शान के लिए पूरा परिवार कुर्बान करके नांदेड में अबचल नगर (श्री हुजूर साहिब) में गुरुग्रंथ साहिब को गुरु का दर्जा देते हुए और इसका श्रेय भी प्रभु को देते हुए कहते हैं- आज्ञा भई अकाल की तभी चलाइयो पंथ, सब सिक्खन को हुक्म है गुरू मान्यो ग्रंथ। गुरु गोबिंद सिंह जी ने 42 वर्ष तक जुल्म के खिलाफ डटकर मुकाबला करते हुए सन् 1708 को नांदेड में ही सचखंड गमन कर दिया। प्रकाश पर्व के मौके पर गुरुद्वारे में शबद व कीर्तन के साथ लंगर का आयोजन किया गया। लंगर की पंगत में डीएम अपूर्वा दुबे भी शामिल हुई। कार्यक्रम में गुरुद्वारा सिंह सभा के प्रधान पपिन्दर सिंह, लाभ सिंह, जतिंदर पाल सिंह, नरिंदर सिंह रिक्की, सरनपल सिंह, सतपाल सिंह, गोविंद सिंह, वरिंदर सिंह, कुलजीत सिंह, संत सिंह, गुरमीत सिंह, रिंकू, सोनी, हरविंदर कौर, मंजीत कौर, हरजीत कौर, जसवीर कौर, गुरप्रीत कौर, हरमीत कौर, प्रभजीत कौर, ज्योति मालिक, गुरशरण कौर, ईशर कौर, रीता, इंदरजीत कौर, जसप्रीत कौर, तरनजीत कौर, नीना, खुशी, वीर सिंह भी मौजूद रहे।


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