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Tuesday, December 14, 2021

भारत का संविधान और राजनीति .....................

देवेश प्रताप सिंह राठौर

............ भारत की राजनीति और नेताओं का चरित्र और व्यवहार बहुत बदल चुका है, राजनीति में उन्हीं लोगों के काम होते हैं जो राजनीति में उनकी राजनीत में हमेशा भागीदारी रखते हैं। मैंने बहुत से नेताओं को देखा कुछ एक नेताओं के बारे में मैंने व्यक्तिगत तौर पर उनकी भाषा शैली को सुना और मैंने सोचा राजनीति में यह दोहरा चरित्र चोर को से कह रहे चोरी करो साहूकार से करें जागते रहो, यह मैंने देखा है एक घटना आपको याद दिलाता हूं मैं एक विधायक जी के घर पर बैठा हुआ था वह विधायक जी के पास उनके गांव से कुछ लोग आए और कहने लगे भैया हमें बहुत मारा है यह चोट वह चोट उन्होंने कोतवाली फोन किया विधायक जी ने और तुरंत उन्हें कोतवाली भेज दिया आधा घंटा नहीं पीता जिस से झगड़ा हुआ था दूसरी पार्टी भी आ गई उसने भी का भैया मुझे यह मारा वह हमारा मेरा सर फोड़ दिया फिर देखिए राजनीति का असली चेहरा उन विधायक महोदय ने कहा कोतवाली फोन किया कि दोनों को सालों को आठ 10 घंटे बैठा लो कायदे से वेत लगाओ  और रात में छोड़ देना यह होती है सच्ची राजनीतिकार , नेताजी को इस से मतलब नहीं किसकी गलती है किसकी नहीं किसकी गलती है किसकी नहीं इससे कोई मतलब नहीं यह देखकर मैं भी भौचक्का रह गया यह तो हमारे परिचित  हैं ,कहीं ऐसा नहीं  कि  सबके साथ  यही फॉर्मूला अपनाते होगे  मैंने अपने मित्र से कहा जो मेरे साथ गए थे मैंने  कहा राजनीति  बहुत गंदी है इससे बचकर रहने की जरूरत है जिसे हम अपना सगा समझें राजनीति में कोई किसी का सगा नहीं है। आज कुछ राजनीति के बारे में इतिहास के पन्नोंं मे पलट कर देखा तो कुछ आपके समक्ष लिखनेे का प्रयास कर रहाा हूं ।राजनीति में 'दल-बदल' काफी प्रचलित है। इसे आसान भाषा में आप कह सकते हैं कि सांसद या विधायक द्वारा एक दल (अपना दल) छोड़कर दूसरे दल में शामिल होना। जिस तरह से सासंद और विधायक अपने राजनीतिक और निजी लाभ के लिए दल बदलते रहते हैं, इसलिए राजनीति में इन्हें 'आया राम, गया राम' कहा जाता है। इस आलेख में हम दल-बदल की राजनीतिक घटनाओं और इससे जुडें कानूनों के बारे में जानेंगे।



1957 से 1967 तक की अवधि में रिसर्च के अनुसार 542 बार लोगों ( सांसद/विधायक) ने अपने दल बदले। 1967 में चौथे आम चुनाव के प्रथम वर्ष में भारत में 430 बार सासंद/विधायक ने दल बदलने का रिकॉर्ड कायम हुआ है। 1967 के बाद एक और रिकॉर्ड कायम हुआ, जिसमें दल बदलुओं के कारण 16 महीने के भीतर 16 राज्यों की सरकारें गिर गईं। इसी समय हरियाणा के विधायक गयालाल ने 15 दिन में ही तीन बार दल-बदल के हरियाणा की राजनीति में एक नया रिकॉर्ड बनाया था।जुलाई 1979 में जनता पार्टी में दल-बदल के कारण चौधरी चरणसिंह प्रधानमंत्री पर आसीन हो गए थे। इसकी वजह से चरणसिंह को भारत का पहला 'दल-बदलू प्रधानमंत्री' कहा जाता है। जनवरी 1980 के लोकसभा निर्वाचनों के बाद कर्नाटक की कांग्रेस(अर्स) और हरियाणा की जनता पार्टी की सरकार दल-बदल के कारण रातों-रात इंदिरा कांग्रेस की सरकार बन गई थी। हरियाणा के मुख्यमंत्री भजनलाल 47 विधायकों के साथ जनता पार्टी छोड़कर कांग्रेस (आई) में आ गए, जो एक मिसाल के साथ-साथ एक नया रिकॉर्ड कायम हुआ था।विश्व के अन्य देशों में भी दल-बदल की राजनीति देखने को मिलती है। ब्रिटेन, कनाडा, आस्ट्रेलिय जैसे लोकतांत्रिक देशों में दल-बदल की राजनीतिक घटनाएं लगातार होती रहती हैं। फरवरी 1846 में अनुदारवादी (ब्रिटेन) में फूट पड़ गई और इसके बाद 231 सदस्यों ने प्रधानमंत्री पील के विरोध में मतदान कर दिया था। उन पर दल से विद्रोह करने का आरोप लगाया गया था, हालांकि पील उदार दल की सहायता से अपने पद पर बने रहे। 1900 में विंस्टन चर्चिल अनुदारवादी दल के टिकीट पर संसद के सदस्य चुने गए थे, किंतु 1904 में अनुदार दल से अलग होकर उदारवादी दल में शामिल हो गए थे। दल-बदल के कारण ऑस्ट्रेलिया में 1916, 1929, 1931 और 1941 में संघीय सरकारों का पतन हो गया था। किसी विधायक का किसी दल विशेष के टिकट पर निर्वाचित होने के बाद अपने पद को और दल को छोड़ देना तथा किसी दूसरे राजनीतिक दल में शामिल होना।अपने दल को छोड़ने के बाद निर्दलीय बन जाना। आम चुनावों में निर्दलीय रूप से चुनाव लड़ना और निर्वाचित होने के बाद किसी दूसरे विशेष दल में शामिल हो जाना यह आज की राजनीति में आम बात है। राजनीत में पार्टियोंं को टिकट जो भी मिलता है जब बहुत सारा पैसाा उनके पार्टीी कोष में जमाााा करना पड़ता है।

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