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Saturday, December 18, 2021

ईश्वर ही मेरा रक्षक है................

देवेश प्रताप सिंह राठौर 

(वरिष्ठ पत्रकार)

........................वर्तमान समय में नैतिक मूल्यों का पतन तेजी से हो रहा है। लोगों में ईश्वर के प्रति आस्था का अभाव बढ़ता जा रहा है। यही नहीं,मनुष्य-मनुष्य के बीच अविश्वास की खाई चौड़ी होती जा रही है। इस समस्या के कुछ महत्वपूर्ण कारण हैं। पहला कारण तो यही कि लोगों में चरित्रहीनता बढ़ी है। दूसरा नैतिकता घटी है। तीसरा कारण यह है कि लोगों का ईश्वर के प्रति विश्वास घटा है। संस्कारों के अभाव में नैतिकता का स्तर गिरना स्वाभाविक है। नीति से गिरा हुआ समाज कभी उन्नति नहीं कर सकता। आज के दिखावे के युग में आयोजन तो बहुत हो रहे हैं, किंतु उनके मानवीय सरोकार नहीं हैं। इसीलिए इन आयोजनों से कोई सामूहिक हित नहीं होता। अध्यात्म के बिना भौतिक उत्थान का कोई महत्व नहीं है। मन की पवित्रता के बिना तन की पवित्रता संभव नहीं है। हृदय के पवित्र भाव ही वाच् रूप में भक्ति, सरलता और आचरण के रूप में प्रकट होते हैं, किंतु इस आचरण के अभाव में सर्वत्र अराजकता दिखाई देती है। जीवन से सुख-शांति और सरलता मानो विदा हो चुकी है। ऐसे में परमात्मा का आधार


ही सुख व आनंद प्राप्ति का कारण है। इस संदर्भ में गुरुनानक की वाणी अत्यंत सार्थक है-'नानक दुखिया सब संसार, सुखी वही जो एक अधार।'परमात्मा की अनुभूति हमारे कल्याण का कारण है। इसलिए जीवन में ईश्वर के प्रति आस्था रखते हुए मानवीय नैतिक मूल्यों पर अमल करना चाहिए। अनेक ऐसे उदाहरण हैं जिनसे आस्था, नीति, चरित्र, भक्ति और अध्यात्म की महिमा प्रमाणित हो जाती है। पांडवों की जीत नीतिमार्ग की जीत है। तमाम संकटों के बावजूद वे विजयश्री प्राप्त करने में सफल रहे। शिवाजी और राणाप्रताप के चरित्र हमारी धरोहर हैं। वे न केवल वीरता के प्रतीक थे, बल्कि न्याय और नीति के अनुयायी थे। शत्रु तक उनके चरित्र और व्यवहार के कायल थे। ध्रुव और प्रच्चद ईश्वर भक्ति के उदाहरण हैं। आचार्य शंकर, रामानुज आदि अध्यात्म के प्रतीक हैं। ईश्वर के प्रति आस्था के बल पर ही उन्होंने मनुष्यमात्र की मुक्ति का मार्ग प्रशस्त किया।धर्म या अध्यात्म की साधना में, अक्सर जो सबसे पहला सवाल मन में उठता है, वो ये है कि क्या सच में इश्वर का अस्तित्व है?  कैसे मिलेगा इसका उत्तर? कैसे पैदा होगी उत्तर जानने की संभावना?अब अगर मैं किसी ऐसी चीज़ के बारे में बात करूँ जो आपके वर्तमान अनुभव में नहीं है, तो आप उसे नहीं समझ पाएंगे। मान लीजिए, आपने कभी सूर्य की रोशनी नहीं देखी और इसे देखने के लिए आपके पास आंखें भी नहीं है       ऐसे में अगर मैं इसके बारे में बात करूं, तो चाहे मैं इसकी व्याक्या कितने ही तरीके से कर डालूं, आप समझ नहीं पाएंगे कि सूर्य की रोशनी होती क्या है। इसलिए कोई भी ऐसी चीज़ जो आपके वर्तमान अनुभव में नहीं है, उसे नहीं समझा जा सकता। इसलिए इसके बाद जो एकमात्र संभावना रह जाती है, वह है कि आपको मुझ पर विश्वास करना होगा। मैं कह रहा हूँ, वही आपको मान लेना होगा। अब अगर आप मुझ पर विश्वास करते हैं, तो यह किसी भी तरह से आपको कहीं भी नहीं पहुंचाएगा। अगर आप मुझ पर विश्वास नहीं करते हैं, तब भी आप कहीं नहीं पहुँच पाएंगे। मै आपको एक कहानी सुनाता हूं।एक दिन, सुबह-सुबह, गौतम बुद्ध अपने शिष्यों की सभा में बैठे हुए थे। सूरज निकला नहीं था, अभी भी अँधेरा था। वहां एक आदमी आया। वह राम का बहुत बड़ा भक्त था। उसने अपना पूरा जीवन ''राम, राम, राम” कहने में ही बिताया था। इसके अलावा उसने अपने पूरे जीवन में और कुछ भी नहीं कहा था। यहां तक कि उसके कपड़ों पर भी हर जगह ''राम, राम” लिखा था। वह केवल मंदिरों में ही नहीं जाता था, बल्कि उसने कई मंदिर भी बनवाए थे। अब वह बूढ़ा हो रहा था और उसे एक छोटा सा संदेह हो गया। ''मैं जीवन भर 'राम, राम’ कहता रहा, लेकिन वे लोग जिन्होंने कभी ईश्वर में विश्वास नहीं किया, उनके लिए भी सूरज उगता है।एक भक्त (भगवान् का प्रिय ) ईश्वर से प्रेम रखता है | उस प्रेम से सम्बन्धित कोई शर्त नहीं होती है | उसके प्रेम में उत्कंठा होती है | पागल प्रेमी की भांति अपने प्रिय के प्रति लालसा रखने की तरह भक्त ईश्वर के प्रति लालसा रखता है | वह हर समय ईश्वर के प्रति सोंचता है और यह स्मरण जारी रहता है | ईश्वर के प्रति लालसा में कोई अंतराल नहीं होता है | सोने में जाग्रत अवस्था में, कार्य में, घर में, भोजन के दौरान, टहलने के दौरान, भक्त ईश्वर के प्रति सोंचता है | यह एक जूनून होता है और यह जूनून ईश्वर को भक्त से बांधे रखता है।

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