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Tuesday, November 2, 2021

जैसा कर्म , देर सवेर बैसा फल अवश्य...........

देवेश प्रताप सिंह राठौर 

(वरिष्ठ पत्रकार)

....................कर्मो का फल हर किसी को भोगना ही पड़ता है!श्रीमद्भगवद्गीता कर्म को प्रधान मानती है, और यह सत्य है कि संसार मे कर्म ही सब कुछ है। कर्म मे ही आपका जीवन है। कर्म के कुछ सिद्धांत हैं जिनका पालन करने से आपके जीवन को दिशा मिलती है। हर सभ्यता और समाज मे समय के अनुसार कर्म के छोटे-बढ़े और अच्छे-बुरे की परिभाषा तय की जाती है। आपकी सोच आपके कर्म की पहली सीढ़ी होती है। संसार का हर मनुष्य सदा सर्वदा कर्म मे ही लीन होता है तथा तदनुसार उसे उसका फल भी मिलता रहता है।यह सर्व विदित है कि जो प्रकृति के नियमों का पालन करता है, वह परमात्मा के करीब माना जाता है। यदि परमात्मा भी मनुष्य के रूप में अवतरित होता है तो उसे भी उन सारे नियमों का पालन करना पड़ता है, जो सामान्य मनुष्यों के लिए हैं। कर्म को पूजा मानते हुए जब हम राग-द्वेष को मिटा देते हैं तब हमारा स्वभाव शुद्ध होता है। तब हमें पूरा विश्व एक परिवार दिखने लगता है। इस समय हमारा हर कर्म समाज के हित में ही होता है। श्रीमद्भगवद्गीता कहती है कि कर्म किए बगैर हम एक क्षण भी नहीं रह सकते। कर्म हमारे अधीन हैं, उसका फल नहीं। महापुरुष और ज्ञानी जन हमेशा से कहते रहे हैं कि अच्छे कर्मों को करने और बुरे कर्मों का परित्याग करने में ही हमारी भलाई है।किसी संत से एक व्यक्ति ने पूछा कि आपके जीवन में इतनी शांति, प्रसन्नता और उल्लास कैसे है? इस पर संत ने मुस्कराते हुए कहा था कि अपने कर्मों के प्रति यदि आप आज से ही सजग और सतर्क हो जाते हैं, तो यह सब आप भी पा सकते हैं। सारा खेल कर्मों का


है। हम कर्म अच्छा करते नहीं और फल बहुत अच्छा चाहते हैं। यह भला कैसे संभव होगा? गहना कर्मणो गतिः अर्थात कर्मों की गति बड़ी गहन होती है। अवश्यमेव भोताव्यम कृतं कर्म शुभाशुभमनाभुकतम क्षीयते कर्म कल्पकोटिस्चतैरपि।अपना किया हुआ जो भी कुछ शुभ अशुभ कर्म है, वेह अवश्य ही भोगना पड़ता है. बिना भोगे तो सैंकड़ो-करोड़ो कल्पों के गुजरने पर भी कर्म नहीं ताल सकता।"बाल्मीकि रामायण में वर्णित है कि एक बार भगवान श्री राम के दरबार में न्याय पाने के लिए एक कुत्ता पहुँच गया था। जब लक्ष्मण जी ने कुत्ते से पुछा कि क्या बात है तो कुत्ते ने कहा कि मुझे भगवान श्री राम से न्याय चाहिए। भगवान श्री राम उपस्थित हुए और कुत्ते से पुछा कि बताओ कैसे आना हुआ ?कुत्ते ने कहा कि प्रभु मैं खेत के मेड़ के बगल में लेटा था तभी एक ब्राह्मण जो कि उस रास्ते से जा रहे थे मुझ पर अनावश्यक डंडे से प्रहार कर के चोटिल किया है। मुझे न्याय चाहिए कि बिना किसी अपराध के भी ब्राह्मण ने मुझे क्यों पीटा ? इसलिए आप उस ब्राह्मण को दंड दीजिये। इस पर भगवान श्री राम ने उन ब्राह्मण को भी बुला लिया और सवाल किया कि आपने इस कुत्ते को किस कारण से पीटा है ?ब्राह्मण ने कहा कि प्रभु मैं स्नान करने के लिए नदी की तरफ जा रहा था तो सोचा की ये कुत्ता कहीं मेरे कपडे छू कर मुझे अपवित्र न कर दे। इसलिए इसे दूर भगाने के लिए मैंने एक डंडे का प्रहार किया। भगवान ने कुत्ते से पुछा कि तुम बताओ इनको क्या दंड दिया जाये ? तब कुत्ते ने कहा कि प्रभु मैं आपकी शरण में आया हूँ, न्याय तो आपको ही करना है। इस पर भगवान ने फिर से कहा कि नहीं तुम बताओ इन्हे क्या दंड दिया जाये और वही दंड इन पर लागू होगा।तब कुत्ते ने कहा की इन ब्राह्मण को कालिंजर के एक मठ में मठाधीश बना दिया जाये। ये सुन कर वहाँ राज दरबार में उपस्थित सभी लोग अवाक् रह गए क्योंकि कालिंजर का वो मठ असीम वैभव, ऐश्वर्य और अकूट धन से समृद्ध था। उसका मठाधीश बनना गर्व की बात होती थी। तब भगवान राम ने पुछा की तुम दंड दे रहे हो या मजाक कर रहे हो ?तब कुत्ते ने भगवान श्री राम से कहा कि नहीं प्रभु मै दंड दे रहा हूँ क्योंकि पिछले योनि में मैं वहाँ का मठाधीश ही था पर उस मठ में उपस्थित ऐश्वर्य, समृद्धि, अकूट धन ने मेरी बुद्धि भ्रष्ट कर दी, मुझे जो सत्य के प्रति कार्य करना था उसे न करके, मैं गलत कर्मो में लिप्त रहने लगा और उसे ही जीवन का असली आनंद समझ बैठा जिससे मेरे तप का तेज खत्म होने लगा और एक दिन मेरी मृत्यु भी हो गयी उसके बाद मुझे ये कुत्ते की योनि प्राप्त हुई है।मेरे कर्म इतने ख़राब हो गए थे की दुबारा मनुष्य जन्म भी नहीं मिला। इसलिए प्रभु मैं जानता हूँ कि ये ब्राह्मण भी कालिंजर के मठ के मठाधीश होते ही ऐश्वर्य, भोग में लग जायेंगे और इनका भी निश्चित रूप से तप का तेज खत्म हो जायेगा और ये भी मेरी तरह कुत्ता बन के द्वार-द्वार घूमेंगे भोजन के लिए। कुत्ते के रहस्य भरी बातों को सुन कर सभी लोग आश्चर्य से भर गए।कर्म सिद्धान्त का यह नियम है कि प्राणी जो भी कर्म करता है उसके फल को भोगने के लिए उसे दुबारा जन्म लेना पड़ता है, क्योंकि पूर्वकृत कर्म-फल पूर्व जन्म में पूरा नहीं हो पाता है अर्थात् कुछ कर्म इस प्रकार के होते हैं जिनका फल इस जन्म में (वर्तमान पर्याय) में मिल जाता है और कुछ कर्म इस प्रकार के होते हैं जिनका फल इस जन्म में नहीं मिलता है। इसलिए अगला जन्म (पुनर्जन्म) लेना पड़ता है। जिन कर्मों का फल वर्तमान जन्म में फलित नहीं होता है, उसको भोगने के लिए उचित समय पर वर्तमान शरीर का त्याग करके नवीन शरीर धारण करना पड़ता है।प्रकृति में कोई भी चीज़ अक्षम्य नहीं है. प्रकृति हमेशा अपना प्रभाव रखती है सामने दिखाती है, उसे कोई रोक नहीं सकता। उसे अगर कोई रोक सकता है तो आपका शुभ कर्म ही। आपके द्वारा किये गए दुष्कर्म को रोकने का माध्यम आपके द्वारा किये गए शुभ कर्म ही हैं और शुभ कर्म करने से ऐसे ही बड़े बड़े दुष्कर्म कट जाते हैं.”अतः स्पष्ट है कि आप अपने कर्मफल से नहीं बच सकते। आप जहाँ भी जाते हैं, जो कुछ भी करते हैं, आपके कर्म ही आपको शांतिपूर्वक देख रहे होते हैं। किसी भी दिन आपको आपके कर्म का फल पृथ्वी पर वहन करना ही होता है।

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