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Thursday, October 28, 2021

भारतीय संस्कृति विश्व की श्रेष्ठ संस्कृति वाल्मीकि रामायण के सूत्रों से समाजोत्थान करना है - डॉ बी के जैन

चित्रकूट, सुखेन्द्र अग्रहरी - महर्षि वाल्मीकि का स्मरण सौभाग्य का प्रतीक है। सदाचरण की शिक्षा देने के लिए श्रीराम का अवतरण हुआ। त्रेतायुग से आज तक उनके आदर्श आचरणीय है। वाल्मीकि और हनुमान दो वैज्ञानिक हैं, जिन्होंने राम के चरित को समझा और अपने ग्रन्थ तथा आचरण से समाज के सम्मुख प्रस्तुत किर दिया। इन आदर्शों को आगे ले जाने के लिये युवाओं को तत्पर होना होगा।

कालिदास संस्कृत अकादमी, उज्जैन द्वारा 27 एवं 28 अक्टूबर, 2021 तक श्रीराम संस्कृत महाविद्यालय, चित्रकूट के सहकार से आयोजित वाल्मीकि समारोह  पर मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए राजगुरु स्वामी बदरी प्रपन्नाचार्य, चित्रकूट ने ये उद्गार व्यक्त किये।अध्यक्षता करते हुए रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय, जबलपुर के कुलपति प्रो. कपिलदेव मिश्र ने कहा कि संस्कारों का पोषण ग्रन्थों के अनुशीलन से होता है। महर्षि वाल्मीकि विरचित रामायण आदर्श ग्रन्थ है जिसमें सामाजिक समरसता, पर्यावरण, संस्कृति मूल्य, विज्ञान, तकनीकि के सत्र निहित हैं। 


मुख्य अतिथि डॉ. वी.के.जैन निदेशक न्यासी, सद्गुरु सेवा संघ, चित्रकूट ने कहा कि भारतीय संस्कृति विश्व की श्रेष्ठ संस्कृति है। क्योंकि इसके मूल में श्रीराम, वाल्मीकि जैसे व्यक्तित्व हैं। त्याग, श्रद्धा, विश्वास जैसे सूत्र वाल्मीकि देते है। वाल्मीकि रामायण के सूत्रों से समाजोत्थान करना है। रूढ़िवाद और समाजविरोधी विषयों का निरसन करना है। वन्यसंस्कृति महान् है। इस वर्ष संगोष्ठी से बहुत से तथ्य उद्घाटित हो सकेंगे।

श्रीमती उषा जैन ने कहा कि यह राम और वाल्मीकि की भूमि है चित्रकूट। यहाँ सत्कर्मों के परिणाम से ही निवास मिलता है। वैदिक अध्ययन के लिये चित्रकूट में वेदविद्यालय की प्रतिष्ठा हमारा एक लक्ष्य है। अकादमी के प्रभारी निदेशक डॉ. सन्तोष पण्ड्या ने कहा कि वेदों से लेकर सभी परवर्ती ग्रन्थों में राम के आदर्शाें का ज्ञान हुआ है। वाल्मीकि आदिकवि हैं उनका काव्य आदिकाव्य है। संस्कृति विभाग सांस्कृतिक मूल्यों के संवर्धन को लक्ष्य कर विद्वानों के विचार के अवसर निर्मित करता है। कार्यक्रम में जनजातीय लोकनृत्यों की रंगारंग प्रस्तुति हुई

वाल्मीकि समारोह के अंतर्गत श्री कमलसिंह मरावी, डिण्डौरी के निर्देशन में सेला, कहरवा, ददरिया आदि जनजातीय नृत्यों की प्रस्तुति की। इस समूह नृत्य के 20 कलाकारों ने लोकजीवन का रसास्वादन कराया। आदिवासी अंचलों में तीज-त्यौहारों पर ये नृत्य किये जाते हैं।

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