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Friday, February 19, 2021

प्रेम तप से प्रगट होंगी पयस्विनी-कात्यायिनी गिरि

चित्रकूट,सुखेन्द्र अग्रहरि। कथा के चौथे दिन श्रोताओं ने श्री राम जन्मोत्सव का आनंद लिया। करुणानिधान प्रभु श्री राम स्वयं आनंद स्वरुप हैं!भगवान् शंकर मानस में स्वयं कहते हैं।

हरि ब्यापक सर्बत्र समाना । प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना ।।

अग जगमय सब रहित बिरागी । प्रेम तें प्रभु प्रगटइ जिमि आगी ।।

श्रीराम कथा वाचक कात्यायिनी गिरि ने कहा कि हरि जो स्वयं आनंद स्वरुप हैं एकमात्र भक्तों के प्रेम के वशीभूत होकर प्रगट होते हैं। जिस प्रकार काष्ठ में सर्वत्र अग्नि का निवास होता है परन्तु जब तक उसे प्रगट करने के लिए घर्षण न किया जाये वह प्रगट नहीं होती। ठीक वैसे ही यह परमात्मा प्रेम की पुकार सुन प्रगट हो जाते हैं।


यही परमात्मा अग्नि रूप में प्रगट होते हैं 

यही सूर्य रूप में, यही जल रूप में प्रगट होते हैं।

भागीरथ हों, माता अनुसुइया या ऋषि गौतम सभी ने प्रेम तपस्या से सुरसरि को प्रगट किया है।

मातु पयस्विनी के लिए ब्रम्हा जी ने तप किया है।

हम प्रेम से यदि इस अनुष्ठान में संलग्न होंगे तो ही माता अपने आपको प्रगट करेंगी।

प्रेम तब उपजेगा जब पहचान होगी। जन जन तक यह बात पहुँचे। जब जानकारी होगी तब दर्शन की अभिलाषा जागेगी। दर्शन से प्रेम दृढ़ होगा और मन में माँ को जाग्रत रूप में देखने की प्यास जागेगी। इससे दृढ संकल्प का उदय होगा। यही प्रेम तपस्या है। इस दौरान कथा के व्यवस्थापक सत्यनारायण मौर्य, संतोष तिवारी, राम रूप पटेल, गंगा सागर महाराज सहित अन्य भक्तगण मौजूद थे।

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