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Thursday, February 18, 2021

व्यक्तित्व और अहंकार के बीच का अंतर .....................

देवेश प्रताप सिंह राठौर "देव" 

(वरिष्ठ पत्रकार)

.....सदाशिव ब्रह्मेंद्र स्वामी अपने गुरु के आश्रम में रहकर वेदांत का अध्ययन कर रहे थे। एक दिन गुरु-आश्रम में एक विद्वान पंडित पधारे। उनका किसी विषय पर सदाशिव स्वामी से विवाद हो गया। सदाशिव स्वामी ने अपने तर्कों से पंडितजी के तर्कों को तहस-नहस कर डाला। सदाशिव स्वामी की प्रकांड विद्वत्ता के सामने पंडितजी की एक न चली और आखिर में उन्हें सदाशिव स्वामी से क्षमा-याचना करना पड़ी।इस घटना ने सदाशिव स्वामी को पुलकित कर दिया। उन्होंने यह सोचकर गुरुजी को ये घटना सुनाई कि वे प्रसन्न् होकर उनकी पीठ थपथपाएंगे, लेकिन हुआ ठीक उल्टा। गुरु ने सदाशिव स्वामी को फटकार लगाते हुए कहा सदाशिव, श्रेष्ठ चिंतन की सार्थकता तभी है, जब उससे श्रेष्ठ चरित्र बने और श्रेष्ठ चरित्र तभी सार्थक है, जब वह श्रेष्ठ व्यवहार बनकर प्रकट हो। तुमने वेदांत का चिंतन तो किया, पर ज्ञाननिष्ठ साधक का चरित्र नहीं गढ़ सके और ना ही वैसा व्यवहार करने में समर्थ हो पाए। अस्तु तुम्हारे अब तक के अध्ययन-चिंतन को बस धिक्कार योग्य ही माना जा सकता है।"गुरु के वचनों को सुनकर सदाशिव स्वामी का अहं भाव चूर-चूर हो गया। उन्होंने विनम्र भाव से पूछा गुरुदेव, हम अपना व्यक्तित्व किस प्रकार


गढ़ें?" तब गुरुदेव बोले - 'वत्स, व्यक्तित्व को गढ़ने के लिए पहले अपने विचारों में उसकी रूपरेखा स्पष्ट होना चाहिए। दूसरी अहम बात यह है कि उद्देश्य के अनुरूप चिंतन के अलावा कोई भी दूसरा विरोधी विचार या चिंतन मन में प्रवेश न करने पाए और तीसरा तथ्य यह है कि उद्देश्यपूर्ण विचार की प्रगाढ़ता निरंतर बनी रहे। मनन और निदिध्यासन निरंतर होता रहे। ऐसे प्रगाढ़ चिंतन से ही तदनुरूप चरित्र का निर्माण होता है। लेकिन ध्यान रहे कि चिंतन स्वयं के चरित्र को विनिर्मित करने के लिए होता है, न कि दूसरे के तर्क को पराजित करके स्वयं के अहं की तुष्टि के लिए। तर्क-कुतर्क करने वाले का चिंतन कभी भी तदनुरूप चरित्र का निर्माण नहीं कर पाता है। इसके विपरीत यदि तर्क-कुतर्क से बचा जाए तो सर्वथा एक नया चरित्र गढ़ा जाता है।"हम अपने जीवन में भी झुकना पसंद नहीं करते और अपने अहंकार के कारण तर्कों के माध्यम से दूसरों को पराजित करने में लगे रहते हैं। इस प्रक्रिया में हमारा समय ही नष्ट होता है, जबकि हासिल कुछ नहीं होता। बेहतर है ऐसी प्रवृत्ति से बचा जाए। जीवन में विनम्रता, शालीनता जैसे गुणों को अपनाएं पराधीन सपनेहु सुख नाही...पराधीन’ शब्द दो शब्दों के योग से बना है–’पर + अधीन’, अर्थात् दूसरे के नियन्त्रण या बन्धन में रहना। इसलिए जब कभी एक शक्तिशाली राष्ट्र किसी निर्बल देश को अपने अधिकार में कर लेता है तो अधिकार में आए देश को हम पराधीन देश कहते हैं। इसी प्रकार जब हमारे स्वतन्त्र चिन्तन और स्वतन्त्र व्यवसाय पर बन्धन लगा दिया जाता है तो हम पराधीनता की श्रेणी में आ जाते हैं। तात्पर्य यह है कि पराधीन व्यक्ति न तो अपने मन के अनुसार कुछ काम कर सकता है और न स्वतन्त्र रूप में कुछ सोच सकता है।पराधीनता भय की जननी है। पराधीन व्यक्ति के मन में सदैव भय व्याप्त रहता है, इस भय के कारण वह कुछ भी नहीं कर पाता है और न अपने देश अथवा समाज के हित की बात सोच पाता है।स्वाधीनता का तात्पर्य है–“जो अपने ही अधीन हो”; इसलिए स्वाधीनता का अर्थ हुआ स्वतन्त्रता। जो व्यक्ति किसी नियन्त्रण अथवा बन्धन के बिना अपनी इच्छा के अनुसार काम करने का अधिकार रखता है, उसे हम स्वतन्त्र या स्वाधीन कहते हैं, किन्तु इस स्वतन्त्रता या स्वाधीनता का यह अर्थ नहीं है कि हम समाज और देश द्वारा बनाए गए नियमों का भी उल्लंघन करें। प्रत्येक समाज के कुछ–न–कुछ नियम होते हैं और प्रत्येक व्यक्ति समाज के इन नियमों से बँधा होता है। समाज के नियम व्यक्ति ने स्वयं बनाए हैं।यदि कोई व्यक्ति समाज के नियमों का पालन नहीं करता है तो वह अराजकता को जन्म देता है। सड़क पर प्रत्येक व्यक्ति को चलने का अधिकार है, किन्तु सड़क पर चलने के कुछ पूर्वनिर्धारित नियम हैं। यदि कोई व्यक्ति इन नियमों का उल्लंघन करता है तो वह अपने प्राणों को तो संकट में डालता ही है, अन्य व्यक्तियों के लिए भी खतरा उत्पन्न कर देता है। इसलिए समाज के नियमों का पालन करना पराधीनता नहीं है।व्यक्ति के जीवन के लिए स्वाधीनता परम आवश्यक है। स्वतन्त्रता अथवा स्वाधीनता के अभाव में कोई भी व्यक्ति उन्नति नहीं कर सकता। जब व्यक्ति की उन्नति नहीं होगी तो देश की उन्नति भी सम्भव नहीं है। इसलिए देश की आजादी की लड़ाई में लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने कहा था कि “स्वतन्त्रता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और इसे मैं लेकर रहूँगा।दासता, चाहे मानसिक हो अथवा शारीरिक, एक अभिशाप है। पराधीन व्यक्ति का सुख समाप्त हो जाता है, उसकी शान्ति नष्ट हो जाती है और चिन्तन रुक जाता है। पराधीनता से राष्ट्र की संस्कृति नष्ट हो जाती है, धर्म मिट जाता है तथा नैतिक दृष्टि से देशवासियों का पतन होने लगता है।पराधीनता साक्षात् मृत्यु है। पराधीन व्यक्ति को कितनी ही भौतिक सुविधाएँ ” किन्न स्वतन्त्रता में कष्ट उठाते हुए भी जो आनन्द मिलता है, वह पराधीनता में कहाँ। वास्तव में पराधीनता ता, अवसाद, खीझ एवं निराशा को जन्म देती है। पराधीन व्यक्ति को स्वप्न में भी सुख नहीं मिलता। पराधीन व्यक्ति स्वयं से घृणा करने लगता है।वह अपने जीवन में जो भी कार्य करता है, उसे निराशा ही मिलती है। नवीन आविष्कार के मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं। परतन्त्र व्यक्ति स्वतन्त्र रूप से किसी भी कार्य को सम्पन्न नहीं कर सकता, वह पराश्रित हो जाता है। इस प्रकार पराधीनता व्यक्ति और समाज के लिए घातक विष के समान है।प्रत्येक व्यक्ति स्वतन्त्रता के वातावरण में साँस लेना चाहता है। पराधीनता प्रत्येक व्यक्ति के जीवन के लिए अभिशाप है। पराधीनता में मिलनेवाला सुख वास्तविक नहीं होता। वास्तव में वह सुख होता ही नहीं है, वह तो दुःखों का आरम्भ होता है। पराधीनता मानव–जीवन के लिए एक ऐसी जंजीर है, जिसमें बँधकर व्यक्ति मानसिक और शारीरिक दोनों रूपों में कार्य करने में असमर्थ हो जाता है।इसलिए गोस्वामी तुलसीदास की यह उक्ति ’पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं’ नितान्त सत्य है और मानव–जीवन की वास्तविकता को प्रकट करती है। स्वतन्त्रता हमारी अमूल्य निधि है और अपने प्राणों की आहुति देकर भी हमें अपनी स्वतन्त्रता को कायम रखना होगा।

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