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Sunday, February 7, 2021

जब जब होय धर्म की हानि, बाढै असुर अधम अभिमानी......................................

देवेश प्रताप सिंह राठौर...................

(उत्तर प्रदेश महासचिव आल मीडिया  जर्नलिस्ट)

  जब होय धर्म की हािन बाढैम् असुर अधम अिभमानी, तब तब प्रभु धर विविध शरीरा हरहि कृपा िनिध सज्जन पीरा। अर्थात जब जब इस धरा धाम पर पाप अधिक बढ़ जाता है तब इस धराधाम में धर्म व राष्ट्र रक्षा के लिए परमात्मा को आना पड़ता है।राजा दशरथ के राज्य में जब अकाल पड़ा तब प्रभु को राजा दशरथ को दिए बचन के अनुरूप माता कौशल्या के गर्भ से प्रभु राम का जन्म हुआ।राजा दशरथ को चौथे पन में तीन रािनयों के चार पुत्र प्राप्त हुए। चौथेपन पुत्र की प्रािप्त पर अयोध्या में धूमधाम से भगवान का जन्मोत्सव मनाया जाने लगा और जितने भी राक्षस थे रावण रूपी उनका अंत करने के  लिए अन्याय का अंत करने के लिए मानव की रक्षा करने के लिए अधर्म का नाश करने के लिए प्रभु मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम को धरती पर जन्म लेना पड़ा, आज भी हर जगह त्राहि-त्राहि मची है एक दूसरे को लोग अपने स्वार्थ में किस हद तक गिर जाते हैं उसी स्थिति में देखने को मिलता है जब वह व्यक्ति सोचता है कि यह बलशाली है और  बहुत धन है बड़ी-बड़ी पहुंच है बड़े-बड़े पदों पर हैं उस स्थिति में उस व्यक्ति को सिर्फ एक ही नजर आता है वह नाम है प्रभु राम का भगवान का वही नैया पार करेंगे, अंदर महान का नाम आज उनकी मिसाल के तौर पर लिया जाता है सिकंदर को महान कहा जाता है पूरी दुनिया पर जीत कर भी जब गया था उस वक्त दोनों हाथ खाली थे। आज भी सिकंदर महान का उदाहरण दिया जाता है क्यों क्योंकि इंसान को समझ में आए की जमीन में रहकर चलो जिस तरह रावण का अंत करने के लिए प्रभु राम ने जन्म लिया था, उसी तरह अन्याय और अत्याचार और पाप का तुम्हारा सर्वनाश करने के लिए कहीं ना कहीं कोई ना कोई अवश्य प्रभु ने बनाया होगा इस बात को सोचकर हर व्यक्ति को मानवता रूपी रुख अपनाना चाहिए  सभी धान वाइस पसेरी तौलनाअच्छी बात नहीं है।प्रभु का अवतरण


जब-जब होई धरम कै हानि, बाढै असुर अधम अभिमानी- तब तब प्रभु धरि विविध शरीरा, हरहों कृपा  जब-जब होई धरम कै हानि, बाढै असुर अधम अभिमानी- तब तब प्रभु धरि विविध शरीरा, हरहों कृपा निधि सज्जन पीरा ' अर्थात पृथ्वी पर जब-जब धर्म की हानि होती है तब-तब रूप बदलकर प्रभु का अवतरण होता है। भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं कहा भी है कि जब जब धर्म की ग्लानि होती है वे स्वयं अवतरित होते हैं। जब दुर्जन अधर्म करते हैं तो धर्म की हानि होती है और जब अच्छाई बुराई का कार्य करने लगती है तो धर्म की ग्लानि होती है। धर्म की ग्लानि व हानि दोनों धर्म पर कुठाराघात करते हैं। प्रवचन की अगली कड़ी में डा. उमाशंकर त्रिपाठी ने निर्भरा शक्ति की व्याख्या करते हुए कहा कि सुंदरकांड में तुलसीदास जी भगवान श्रीराम से निर्भरा शक्ति मांगते हैं। जीव पर जब भगवान और भगवती दोनों की कृपा होती है तो उसे निर्भरा शक्ति प्राप्त हो जाती है। मां जानकी की कृपा से हनुमान जी को सेवा व समर्पण के कारण यह शक्ति प्राप्त हुई थी। मां सीता की लंका में खोज करने हनुमान जी दूत बनकर गए थे और पूत बनकर लौटे। रांची से आई साध्वी जयश्री रामायणी ने राम विवाह राम- सीता का विवाह चार प्रकार का हुआ। पुष्प वाटिका में गंधर्व, स्वयंवर में प्रण व स्वयंवर और राजा जनक के आंगन में उनका वैदिक रीति से विवाह हुआ। भरत के नाम की व्याख्या करते है कि भ का अर्थ भरण पोषण, र का अर्थ रक्षा व त का अर्थ तपस्या होता है। जीव के शरीर में इन तीनों की त्रिवेणी बह रही है।

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