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Sunday, January 24, 2021

तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा .........

देवेश प्रताप सिंह राठौर

 (वरिष्ठ पत्रकार)

.....सुभाष चंद्र की 125 वीं जयंती पराक्रम दिवस के रूप में इस वर्ष मनाया जा रहा है ,सुभाष चंद्र बोस भारत के सबसे मशहूर स्वतंत्रता सेनानियों में से एक थे। वह युवाओं का एक प्रभावशाली प्रभावशाली व्यक्ति थे और स्वतंत्रता के लिए भारत के संघर्ष के दौरान भारतीय राष्ट्रीय सेना आईएनए की स्थापना और अग्रणी द्वारा नेताजी नामक उपाधि अर्जित की थी। हालांकि प्रारंभ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ गठबंधन किया गया था, लेकिन विचारधारा में उनके अंतर के कारण उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया गया था। उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी में नाजी नेतृत्व और जापान में शाही सेनाओं से सहायता की मांग की, ताकि अंग्रेजों को भारत से उखाड़ फेंका जा सके। 1 9 45 के बाद उनके अचानक लापता होने के कारण, विभिन्न सिद्धांतों के सामने उनके अस्तित्व की संभावनाओं के बारे में पता चला।नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को कटक (उड़ीसा) में जन्कीनाथ बोस और प्रभाती देवी को हुआ था। सुभाष आठ भाई और छह बहनों के बीच नौवें बच्चे थे। उनके पिता, जानकीनाथ बोस


कटक में एक समृद्ध और सफल वकील थे और उन्हें "राय बहादुर" का खिताब मिला। बाद में वह बंगाल विधान परिषद के सदस्य बन गए,बर्लिन में अपने प्रवास के दौरान, वह मिले और एमिली शेंकेल के साथ प्यार में गिर गए, जो ऑस्ट्रियाई मूल का था। बोस और एमिली ने 1 9 42 में एक गुप्त हिंदू समारोह में विवाह किया था और एमिली ने 1942 में बेटी अनीता को जन्म दिया था। अपनी बेटी के जन्म के कुछ समय बाद, बोस ने 1943 में जर्मनी वापस भारत लौट जाने के लिए छोड़ा दिया,.. आज हमें सुभाष चंद्र बोस की जयंती पर अपने वीर शहीद पर हमें बहुत ही गर्व है साथ-साथ एक विडंबना भी है आजादी के बाद हमारे सुभाष चंद्र बोस को किसी दल ने वह सम्मान नहीं दिया जिस सम्मान के वह हकदार थे, भारत रत्न देश का सर्वोच्च सम्मान नहीं प्राप्त हुआ लेकिन हमारे ह्रदय में सुभाष चंद्र बोस भारत के रत्न से भी अनमोल रत्न है। हम उन्हें भूल नहीं सकते आज हमें एक बात पर कष्ट होता है जिसने आजादी पर मर मिटने के लिए अग्रणी भूमिका निभाई और सुभाष चंद्र बोस राजनीति के शिकार आज होते चले आ रहे हैं, जो हमारे देश के बाप और चाचा हैं यह अंग्रेजों के चापलूस और अंग्रेजों की चापलूसी करते करते एक बाप बन गया एक चाचा बन गया हमें एक व्यक्ति पर और गर्व है जिसका नाम है सरदार वल्लभभाई पटेल अगर लहो पुरुष ना होते तो देश की स्थिति बाप  चाचा ने इतनी खराब कर दी होती कि आज भारत देश के कई टुकड़े हुए और हो जाते ऐसी बहुत बड़ी लिस्ट है ,ची हमारे वीर शहीदों को आजादी के बाद सम्मान नहीं मिला उनमें से बहुत से नाम आते हैं जिसमें एक नाम है सुभाष चंद्र बोस भगत सिंह ,राजगुरु, सुखदेव, चंद्रशेखर आजाद बड़ी लंबी लिस्ट है लेकिन क्या इन्होंने देश की आजादी के लिए प्राण दिए इनकी जयंती पता भी नहीं चलती है, और हो जाती है और वाप चाचा इस देश के पालनहार के रूप में देखे जाते हैं जबकि देश की जनता 130 करोड़ आबादी जानती है सुभाष चंद्र बोस वह चेहरा है जो पिता चाचा के बहुत आगे हैं लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल ना हुए होते तो आज देश बहुत ही दुर्गत हो गई होती है ।अगर आजादी के बाद 10 वर्ष तक सुभाष चंद्र बोस जीवित रहते 10 वर्ष तक सरदार लोहपुरुष बल्लभ भाई पटेल जीवित होते तो भारत की दिशा और दशा मैं और परिवर्तन होता लेकिन ऐसा नहीं हो सका जो लोग जीवित बचे वह अंग्रेजों के चापलूस कहीं ना कहीं थोड़े थे ,यह देश की शत प्रतिशत जनता जानती है उन्होंने भगत सिंह, राजगुरु सुखदेव को बचा सकते थे लेकिन उन्होंने ,बचाने का प्रयास नहीं किया मर्सी रिट दायर करते एक अंग्रेजी हुकूमत ने यह कहा कि भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव को फांसी लगाने की जल्दी जितनी महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू को है उतनी अंग्रेजों हुकूमत को नहीं है, मर्सी रिट अगर दायर की होती महात्मा गांधी द्वारा जवाहरलाल नेहरू द्वारा तो बच सकते थे  सरद लहो पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल ने बात रखी भी यह किया जाए लेकिन उस पर कोई विचार नहीं किया गया यह देश के गद्दार बहुत से लोग हैं लेकिन आज हमें दुर्भाग्य है इस देश का ऐसे लोग देश में उन्होंने भी किया है इसको नकारा नहीं जा सकता है। परंतु यह झुट काराटकारा जाा सकत प्हह जा सकता है, परंतु जिन्होंने देश के लिए किया है उनको रे रहस्यमई  मौतों को पता लगाना सरकार का काम था देश का काम था परंतु आजादी के बाद किसी ने इस पर काम नहीं किया वर्तमान सरकार मोदी जी ने इस पर जो लोग देश को आजाद करने में शहीद हुए हैं, उनकी जयंती अब थोड़ा बहुत मनाई जा रही है, लेकिन जयंती कब हो जाती थी पता ही नहीं चलता था किसकी जयंती है सिर्फ बाप हो चाचा की जयंती पता चलती थी।

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