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Saturday, January 9, 2021

सामाजिक परिवर्तन.............

देवेश प्रताप सिंह राठौर 

(वरिष्ठ पत्रकार)

................. सामाजिक परिवर्तन वर्तमान समय में बहुत तेजी से हो रहा है,सामाजिक परिवर्तन की व्याख्या समाजशास्त्रियों ने कतिपय सिद्धांतों के संदर्भ में की है। महत्वपूर्ण बात यह है कि सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया को हम किस उपागम से देखते है। यह उपागम ही सामाजिक परिवर्तन का सिद्धांत है। उदाहरण के लिये इतिहासकार टोयनबी या समाशास्त्री सोरोकनी जब सामाजिक परिवर्तन की व्याख्या करते है तो उन्हें लगता है कि परिवर्तन तो एक चक्र की तरह है। ठीक ऐसे ही जैसे बाल्यावस्था आती है, युवावस्था आती है और अन्त में वृद्धावस्था के बाद शरीर समाप्त हो जाता है।

सामाजिक परिवर्तन को मार्क्सवादी इस संदर्श में नहीं देखते। वे मानते है कि परिवर्तन का बुनियादी आधार आर्थिक संगठन है। इस भांति देखें तो लगेगा कि सामाजिक परिवर्तन एक उपागम है जिसे विभिन्न सिद्धांतों में बांधा गया है। इस संबंध में दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि सामाजिक परिवर्तन के विश्लेषण के कई सिद्धांत है। इन सिद्धांतों में सभी सिद्धांत पूर्ण हो, ऐसा कुछ नहीं है। देखा जाये तो कोई भी सिद्धांत अपने आप में पूर्ण नहीं हैं प्रत्येक में कुछ न कुछ अभाव, कमजोरी है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए एंथोनी गिडेन्स तो कहते है कि सामाजिक परिवर्तन के जितने भी सिद्धांत है उन्हें दो वृहद श्रेणियों में रखा जा सकता है उद्विकासवाद से जुडे सिद्धांत ,ऐतिहासिक भौतिकवाद से जुडे सिद्धांत,उद्विकास से जुड़े हुए सिद्धांत वस्तुत: प्राणिशास्त्रीय परिवर्तन् को सामाजिक परिवर्तन से जोड़ने वाले है और ऐतिहासिक भौतिकवाद से जुड़े हुए सिद्धांत मौलिक रूप से वे है जिन्हें कार्ल माक्र्स ने रखा है। मार्क्स के बाद भी मार्क्सवादी सिद्धांतवेत्ताओं ने ऐतिहासिक भौतिकवाद को उसके विभन्न स्वरूपों में रखा है। यहां हम सामाजिक परिवर्तन के इन दो श्रेणियों में बंटे हुए सिद्वांतों का विश्लेषण देगें। उद्विकासीय सिद्धांतों की यह श्रेणी


बहुत व्यापक है। इसके जो के इस सम्प्रदाय में कई सिद्धान्तवेत्ता सम्मिलित है। इनमें मुख्य रूप से हरबर्ट स्पेन्सर, डार्विन, मेण्डल, हेनरीमेन आदि के नाम मुख्य रूप से उल्लेखनीय है। यद्यपि इन सिद्धांतों का केन्द्रीय बिन्दु समाज का उद्विकास है लेकिन व्यावहारिक रूप से ये सिद्धांत उन्नति के द्योतक है। वास्तविकता यह है कि 19वीं शताब्दी के उद्विकासवादियों ने अपने आपकों विकास के साथ जोड़ लिया। इनका कहना था कि समाज का उद्विकास उच्च नैतिक धरातल पर होता है।उद्विकासिवादी सिद्धांतों में सामाजिक डार्विनवादी 19वीं शताब्दी में एक महत्वपूर्ण सिद्वांत बन गया। यह सिद्धांत चाल्र्स डार्विन ने प्राणिशास्त्रीय उद्विकास से बहुत प्रभावित है। इसी कारण इसे डार्विन के नाम पर ही सामाजिक डार्विनवाद कहते है। इस सिद्धांत का तर्क था कि जिस प्रकार प्राणिशास्त्रीय सावयव अपने जीवित हरने के लिए बराबर जुझता रहता है, ठीक इसी भांति मानव समाज भी अपने अस्तित्व के लिये जूझते रहते है। पश्चिमी देशों में आज के समाजों ने इस संघर्ष में अपने आपकों विजयी पाया है इसलिये ये समाज आज भी शीर्ष स्तर पर है। कुछ लेखकों ने सामाजिक डार्विनवाद के विचारों को इस तथ्य के साथ जोड़ा है। कि गोरे लोगों का प्रभुत्व काले लोगों पर है। इस सिद्धांत में सब मिलकर यह स्थापित किया गया है कि यूरोप के लोगों की शक्ति बहुत विशाल थी और गरीब पुरूषों का इसमें कोई स्थान नहीं था। ई. 1920 के दशक तक आते-आते सम्पूर्ण यूरोप में सामाजिक डार्विनवाद का पतन हो गया। सामाजिक डार्विनवाद ही क्यों, सम्पूर्ण उद्विकासवाद का पतन यूरोप में हो गया।आज मानव इतना ज्यादा विकसित हो गया है परिवर्तन हो गया है कि आज  बहुत ही बदलाव की स्थिति में आज पहुंच चुका है।परिवर्तन होना अच्छी बात है लोग परिवर्तन में दिशा हीन होना यह स्थिति ठीक नहीं होती है।

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