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Thursday, December 3, 2020

आजादी के बाद कई बार किसान आंदोलन हुए ? ..............

देवेश प्रताप सिंह राठौर 

(वरिष्ठ पत्रकार )

........ किसान आंदोलन नया नहीं है आजादी के बाद लगातार कई बार हुआ है,पर यह माना जाता है कि भारतीय समाज में समय-समय पर होने वाली उथल-पुथल में किसानों की कोई सार्थक भूमिका नहीं रही है, लेकिन ऐसा नहीं है क्योंकि भारत के स्वाधीनता आंदोलन में जिन लोगों ने शीर्ष स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, उनमें आदिवासियों, जनजातियों और किसानों का अहम योगदान रहा है। स्वतंत्रता से पहले किसानों ने अपनी मांगों के समर्थन में जो आंदोलन किए वे गांधीजी के प्रभाव के कारण हिंसा और बरबादी से भरे नहीं होते थे, लेकिन अब स्वतंत्रता के बाद जो किसानों के नाम पर आंदोलन या उनके आंदोलन हुए वे हिंसक और राजनीति से ज्यादा प्रेरित थे।देश में नील पैदा करने वाले किसानों का आंदोलन, पाबना विद्रोह, तेभागा आंदोलन, चम्पारण का सत्याग्रह और बारदोली में जो आंदोलन हुए थे, इन आंदोलनों का नेतृत्व महात्मा गांधी, वल्लभभाई पटेल जैसे नेताओं ने किया। आमतौर पर किसानों के आंदोलन या उनके विद्रोह की शुरुआत सन् 1859 से हुई थी, लेकिन चूंकि अंग्रेजों की नीतियों पर सबसे ज्यादा किसान प्रभावित हुए, इसलिए आजादी के पहले भी इन नीतियों ने किसान आंदोलनों की नींव डाली। सन् 1857 के असफल विद्रोह के बाद विरोध का मोर्चा किसानों ने ही संभाला, क्योंकि अंग्रेजों और देशी रियासतों के सबसे बड़े आंदोलन उनके शोषण से उपजे थे। वास्तव में जितने भी 'किसान आंदोलन' हुए, उनमें अधिकांश आंदोलन अंग्रेजों के खिलाफ थे। उस समय के समाचार पत्रों ने भी किसानों के शोषण, उनके साथ होने वाले सरकारी अधिकारियों की ज्यादतियों का सबसे बड़ा संघर्ष, पक्षपातपूर्ण व्यवहार और किसानों के संघर्ष को प्रमुखता से प्रकाशित किया। आंदोलनकारी किसान चाहे तेलंगाना के हों या नक्सलवाड़ी के हिंसक लड़ाके, सभी ने छापामार आंदोलन को आगे बढ़ाने में अहम योगदा‍न दिया। सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को अंग्रेजों ने देशी रियासतों की मदद से दबा तो दिया, लेकिन देश में कई स्‍थानों पर संग्राम की ज्वाला लोगों के दिलों में धधकती रही। इसी बीच अनेकों स्थानों पर एक के बाद एक कई किसान आंदोलन हुए। नील पैदा करने वाले किसानों का विद्रोह, पाबना विद्रोह, तेभागा आंदोलन, चम्पारण सत्याग्रह, बारदोली सत्याग्रह और मोपला विद्रोह प्रमुख किसान आंदोलन के रूप में जाने जाते हैं।सन् 1918 में खेड़ा सत्याग्रह गांधीजी द्वारा शुरू किया गया, वहीं बाद में 'मेड़ता बंधुओं' (कल्याणजी तथा कुंवरजी) ने भी सन् 1922 में बारदोली सत्याग्रह को प्रारंभ किया था। बाद में इस सत्याग्रह का नेतृत्व सरदार वल्लभभाई पटेल के हाथों में रहा। हालांकि किसानों का सबसे प्रभावी और व्यापक आंदोलन नील पैदा करने वाले किसानों का था।यह आंदोलन भारतीयों किसानों द्वारा ब्रिटिश नील उत्पादकों के खिलाफ बंगाल में सन् 1859-1860 में किया गया। अपनी आर्थिक मांगों के संदर्भ में किसानों द्वारा किया जाने वाला यह आंदोलन उस समय का एक विशाल आंदोलन था। अंग्रेज अधिकारी बंगाल तथा बिहार के जमींदारों से भूमि लेकर बिना पैसा दिए ही किसानों को नील की खेती में काम करने के लिए विवश करते थे तथा नील उत्पादक किसानों को एक मामूली-सी रकम अग्रिम देकर उनसे करारनामा लिखा लेते थे, जो बाजार भाव से बहुत कम दाम पर हुआ करता था। इस प्रथा को 'ददनी प्रथा' कहा जाता था।


 इसी तरह का पहला विद्रोह (पाबना आंदोलन) जिले के किसानों से शुरू हुआ था। बंगाल के पाबना जिले के काश्तकारों को सन् 1859 में एक एक्ट द्वारा बेदखली एवं लगान में वृद्धि के विरुद्ध एक सीमा तक संरक्षण प्राप्त हुआ था, लेकिन इसके बावजूद जमींदारों ने उनसे सीमा से अधिक लगान वसूला एवं उनको उनकी जमीन के अधिकार से वंचित किया। जमींदारों की ज्यादती का मुकाबला करने के लिए सन् 1873 में पाबना के यूसुफ सराय के किसानों ने मिलकर एक 'कृषक संघ' का गठन किया। इस संगठन का मुख्य कार्य पैसे एकत्र करना एवं सभाएं आयोजित करना होता था, ताकि किसान आधिकाधिक रूप से अपने अधिकारों के लिए सजग हो सकें।डा. रामविलास शर्मा ने प्रेमचंद की रचनाधर्मिता के इस पक्ष को रेखांकित किया है, ‘‘हिंदी में किसानों की समस्याओं पर ज़्यादा उपन्यास लिखे ही नहीं गए, जो लिखे भी गये हैं, उनमें प्रेमचंद की सूझबूझ का अभाव है।’’[1] किसान-जीवन के साथ तालमेल बनाते हुए प्रेमचंद ने जो रचा वह हिंदी के लिए एकदम नया था, ‘‘उन्होंने उस धड़कन को सुना जो करोड़ों किसानों के दिल में हो रही थी। उन्होंने उस अछूते यथार्थ को अपना कथा-विषय बनाया, जिसे भरपूर निगाह देखने का हियाव ही बड़ों-बड़ों को न हुआ था।’’[2] किसान के जीवन को ‘भरपूर निगाह’ से देखने तथा लिखने के कारण ही, ‘‘ ‘प्रेमाश्रम’ किसान-जीवन का महाकाव्य है। उसमें उस जीवन का एक पहलू नहीं दिखाया गया, वह एक विशाल नदी की तरह है जिसमें मूल धारा के साथ आसपास के नालों का पानी, जड़ से उखड़े हुए पुराने खोखले पेड़ और खेतों का घासपात भी बहता हुआ दिखाई देता है।’’[3] प्रेमचंद के योगदान की घोषणा करती यह पंक्ति ध्यान देने योग्य है’’,‘प्रेमाश्रम’ और ‘कर्मभूमि’ के साथ ‘गोदान’ हिंदुस्तानी किसानों के जीवन की बृहतत्रयी समाप्त करता है।’’[4]प्रेमचंद के उपन्यासों और कहानियों के बारे में यह बात सर्वमान्य है कि उनमें सर्वाधिक प्रमुखता से किसान-जीवन को ही विषय बनाया गया है। हिंदी आलोचना में यह बात अच्छी तरह पहचानी गयी है कि प्रेमचंद ने किसानों के शोषण-उत्पीड़न को न केवल चित्रित किया है, बल्कि इनके विरोध की चेतना को भी पकड़ा है। किसानों के विद्रोही तेवर की चर्चा रामविलासजी ने अनेक बार की है। किसानों के शोषकों की पहचान सामंतों, पुरोहितों एवं महाजनों के रूप में की गयी है। प्रेमचंद किसान की समस्या के व्यवस्थागत कारणों की तलाश करते हैं। रामविलासजी बहुत बारीकी के साथ अर्थव्यवस्था, साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद, सामंतवाद-पुरोहितवाद आदि व्यवस्थागत पक्षों को ध्यान में रखकर प्रेमचंद के साहित्य को समझने-समझाने का प्रयास करते हैं।प्रेमचंद के किसानों की पहचान मार्क्सवादी शब्दावली में बताई गई है कि वे सीमांत किसान हैं। ऐसा किसान जिसके पास कम ज़मीन है। वह परिवार की मदद से खेती करता है। पाँच बीघे के आसपास की खेती का वह मालिक भी होता है और श्रम करने वाला किसान भी। उसकी हैसियत इतनी नहीं होती कि अपनी खेती के लिए मजदूर रख सके। जीवन की कठिन परिस्थितियों में प्रायः उसे कर्ज़ लेना पड़ता है। गाँव की महाजनी पद्धति से उसे कर्ज़ मिलता है, जिसके सूद की दर जानलेवा होती है। ‘सवा सेर गेहूँ’ में प्रेमचंद ने कर्ज़ की इस पद्धति के भयानक रूप को कहानी में ढाला है।प्रेमचंद का यही किसान भारत को कृषि प्रधान देश बनाता है। आज़ादी के पहले भारत की अर्थव्यवस्था, समाजव्यवस्था और धर्मव्यवस्था को बनाने में गाँवों की भूमिका आज की अपेक्षा ज़्यादा बड़ी थी। इन गाँवों में रहनेवाली शत प्रतिशत आबादी कृषि-व्यवस्था पर आश्रित थी। गाँव की इस आबादी के बारे में ये नहीं कहा जा सकता कि ये सभी किसान थे। प्रेमचंद के सभी ग्रामीण पात्र किसान नहीं हैं। यद्यपि सभी ग्रामीण आश्रित थे कृषि-व्यवस्था पर ही, पर सबको किसान नहीं कहा जा सकता। ग्रामीण आबादी की पहचान वर्गों में बाँटकर की जा सकती है। ऐसा एक वर्गीकरण आचार्य रामचंद्र शुक्ल के द्वारा किया हुआ भी मिलता है। कृषि और व्यापार से जुड़े वर्गों के अंतर पर विचार करते हुए वे लिखते हैं, ‘‘भूमि ही यहाँ सरकारी आय का प्रधान उद्गम बना दी गई है। व्यापार श्रेणियों को यह सुभीता विदेशी व्यापार को फलता-फूलता रखने के लिए दिया गया था, जिससे उनकी दशा उन्नत होती आयी और भूमि से संबंध रखने वाले सब वर्गों की- क्या जमींदार, क्या किसान, क्या मजदूर- गिरती गयी। किसान दलालों के कारण मजबूत  हो पाया है। सत्ता पक्ष के कार्यों को विपक्ष विरोोध करता है , जब विपक्षी सत्ता में आ जाता है वहींीं सत्तापक्ष जव विपक्ष में  पहुंच आती है तो किसानों का या अन्य नीति ने इसका विरोध करना  मकसद रहता है। अन्य दाताओं को समझना चाहिए और सरकार की बात को मानना चाहिए क्योंकि नरेंद्र मोदी जी की जो कार्यशैली है स्पष्ट दिखाई देता है कि भारत मजबूत होगा, जब भारत मजबूत होगा अन्नदाता मजबूत होगा अन्नदाता मजबूत होगा इसलिए अन्नदाता का सरकार का दोनों को आज समन्वय बनाकर कार्य करने की जरूरत है क्योंकि आजकल कोरोना संक्रमित काल चल रहा है इसलिए इस समय भीड़ इकट्ठा करना देशहित में कहीं से न्याय उचित नहीं है। जो किसान के रूप में दिल्ली में धरना प्रदर्शन कर रहे हैं। दिल्ली में किसान आंदोलन किसान के रूप में व्यापारियों का यह सब धरना प्रदर्शन चल रहा है जिसमें विपक्ष का भी हाथ है। साइन बाग मैं 370 आर्टिकल 35 ए के बाद अब इन लोगों को किसान के रूप में एक मुद्दा फिर मिल गया है। जिसे राजनीति तौर पर बनाना चाहते हैं विपक्ष की पार्टियां लेकिन इस समय पर धीरे-धीरे सब लोग हो जाएंगे क्यों किसान के रूप में व्यापारियों का यह धरना प्रदर्शन है।

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