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Friday, December 18, 2020

मानस तन पाने को तरसते हैं देवता: नवलेश

श्रीकृष्ण-रुकमिणी विवाह की सुनाई कथा

चित्रकूट, सुखेन्द्र अग्रहरि। सदर ब्लाक क्षेत्र अंतर्गत ग्राम पंचायत बिहारा में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा व्यास आचार्य नवलेश दीक्षित ने श्रीकृष्ण रुक्मणी विवाह प्रसंग सुनाया। वेश धारण किए बाल कलाकारों पर भारी संख्या में आए श्रद्धालुओं ने पुष्पवर्षा कर स्वागत किया। विवाह के मंगल गीत गाए। कथा के मुख्य यजमान श्याम लाल मिश्रा ने दीप प्रज्जवलित किया।

भागवताचार्य नवलेश दीक्षित ने कहा कि रुक्मणी विदर्भ देश के राजा भीष्म की पुत्री और साक्षात लक्ष्मी जी का अवतार थी। रुक्मणी ने जब देवर्षि नारद के मुख से श्रीकृष्ण के रूप, सौंदर्य एवं गुणों की प्रशंसा सुनी तो उसने मन ही मन श्रीकृष्ण से विवाह करने का निश्चय किया। रुक्मणी का बड़ा भाई रुक्मी श्रीकृष्ण से शत्रुता रखता था और

कथावाचक आचार्य नवलेश दीक्षित।

अपनी बहन का विवाह चेदिनरेश राजा दमघोष के पुत्र शिशुपाल से कराना चाहता था। रुक्मणी को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने एक ब्राह्मण संदेशवाहक द्वारा श्रीकृष्ण के पास अपना परिणय संदेश भिजवाया। तब श्रीकृष्ण विदर्भ देश की नगरी कुंडीनपुर पहुंचे और वहां बारात लेकर आए शिशुपाल व उसके मित्र राजाओं शाल्व, जरासंध, दंतवक्त्र, विदु रथ और पौंडरक को युद्ध में परास्त करके रुक्मणी का उनकी इच्छा से हरण कर लाए। वे द्वारिकापुरी आ ही रहे थे कि उनका मार्ग रुक्मी ने रोक लिया और कृष्ण को युद्ध के लिए ललकारा। तब युद्ध में श्रीकृष्ण व बलराम ने रुक्मी को पराजित करके दंडित किया। तत्पश्चात श्रीकृष्ण ने द्वारिका में अपने संबंधियों के समक्ष रुक्मणी से विवाह किया।

कथावाचक आचार्य नवलेश दीक्षित ने कहा कि जब तक कर्मों की पूंजी है, इसका सुख भोग लो। बाद में यहीं आना पड़ेगा। यह मृत्युलोक श्रेष्ठ है। मानस तन देवों से भी श्रेष्ठ है। इस चोले को पाने के लिए देवता भी तरसते हैं। उन्होंने कहा कि धर्म जोड़ता है तोड़ना नहीं, इसी प्रकार हमारे गुरु महाराज ने समाज को जोड़ना सिखाया। सुदीक्षा ने कहा कि रावण चारों वेदों के ज्ञाता थे, लेकिन उसने कभी किसी की बात नहीं मानी। बात न मानने के कारण उसकी दुर्गति हुई। उन्होंने कहा कि सत्संग में मति, कीर्ति, भलाई और गति मिलती है। सत्संग को जो तन और मन लगाकर सुनते हैं, उनका पूरा जीवन बदल जाता है। सत्संग में आने से विचार, बुद्धि, कर्म और आचरण बदलता है। धीरे-धीरे सत्संग से पूरा जीवन बदल जाता है। इस अवसर पर रमाकांत मिश्रा, रामनरेश मिश्रा, अशोक मिश्रा, बंसी बिहारी चैबे, बांके बिहारी चैबे, रजनीश तिवारी, उदयभान द्विवेदी आदि श्रोतागण मौजूद रहे।


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