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Sunday, November 1, 2020

राजनीति आज हिंसात्मक होती हुई........................

देवेश प्रताप सिंह राठौर 

(वरिष्ठ पत्रकार)

............ आज देश में जो राजनीति की स्थित है वह सही लोग आज राजनीति में आना नहीं चाहते क्योंकि राजनीति आज की तिथि में बहुत ही अपराधी युक्त हो गई है। हम बात करते हैं भारत देश में बहुत से अच्छे-अच्छे नेता है जो पूर्व में अच्छी राजनीति के रूप में प्रखर थे परंतु आज राजनीति में आप अपराधीकरण चरम पर है जैसे आप उत्तर प्रदेश में मुख्तार अंसारी का नाम ले लीजिए अतीक अहमद और अभी हाल ही में विकास दुबे अपराध इतिहास के बारे में आप लोगों ने जाना और उनका अंत किस तरह हुआ वह भी आपने देखा राजनीति की महत्वाकांक्षी के लिए राजनीति के आपसी रंजिश का केंद्र बहुत से लोग बने हैं जो एक दूसरे को मारने और मरने के लिए तैयार रहते हैं वैसे कोई एक घटना  है राजनीति में देखने को मिली है ।भारत में राजनीतिक हिंसा खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। हमारे देश में सांप्रदायिक दंगों से कहीं ज्यादा लोग सियासी संघर्ष में मारे जा रहे हैं। नैशनल क्राइम रेकॉर्ड्स


ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार वर्ष 2014 में राजनीतिक हिंसा में 2400 जानें गईं जबकि सांप्रदायिक दंगों में 2000 मौतें हुईं। हम भारतीय लोकतंत्र पर भले ही गर्व करते हों, लेकिन सच्चाई यह है कि हमारी व्यवस्था में कई बुनियादी समस्याएं जड़ जमाती जा रही हैं, जिनका समय रहते कोई समाधान ढूंढना जरूरी है।वे दिन गए, जब नेता अपने विरोधियों का भी सम्मान करते थे। उनकी बातों को धैर्यपूर्वक सुनते थे और उनसे सौहार्दपूर्ण संबंध रखते थे। आज राजनीति में असहिष्णुता बढ़ती जा रही है। कोई किसी को सुनने के लिए तैयार नहीं है। आक्रामकता इसका स्वभाव हो गई है। छोटी-छोटी बात पर राजनीतिक कार्यकर्ता उत्पात मचाने लगते हैं, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाते हैं। मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं।दरअसल पहले लोग देश सेवा के लिए अपने शानदार करियर छोड़कर राजनीति में आते थे, पर अब पॉलिटिक्स अपने आप में एक करियर है। यह एक लाभप्रद व्यवसाय के रूप में उभरी है। जन प्रतिनिधि बनते ही एक व्यक्ति की संपत्ति में असाधारण इजाफा होने लगता है। इस कारण राजनीति में आने और उसमें बने रहने के लिए एक गलाकाट प्रतियोगिता शुरू हो गई है। सत्ता पाने के लिए कोई व्यक्ति या उसके जरिए लाभान्वित होने वाला समूह किसी भी हद तक जा सकता है। वह अपने विरोधियों का मनोबल तोड़ने के लिए हिंसा तक का सहारा लेता है। हरेक पार्टी भले ही ऊपर से राजनीति के अपराधीकरण का विरोध करती हो, लेकिन प्राय: सभी दलों में बड़ी संख्या में आपराधिक प्रवृत्ति के लोग शामिल हैं। यही नहीं बड़े-बड़े लीडर भी समय-समय पर ऐसे बयान देते हैं जिससे समाज में जातीय या सांप्रदायिक गोलबंदी होती है और तनाव पैदा होता है।नेताओं में इतना आत्मविश्वास नहीं है कि वे समाज के व्यापक सवालों पर राजनीति करें। समाज को जोड़ने की सकारात्मक राजनीति अब हमारी व्यवस्था में एक दुर्लभ चीज हो गई है। विकास की बात करते हुए भी नेतागण जाति-धर्म का मोहरा चलते हैं। अब तो विधानसभाओं और संसद तक की कार्यवाही के दौरान हिंसा होने लगी है और इसमें पढ़े-लिखे सम्मानित नेता शामिल रहते हैं।सोचा जा सकता है कि उनके इस आचरण का साधारण कार्यकर्ताओं पर क्या असर पड़ता होगा। निर्वाचन आयोग जैसी संस्था ने इस दिशा में काफी काम किया है। उसके प्रयासों से चुनावी हिंसा पर रोक लगी, बूथ लूटने जैसी घटनाएं लगभग खत्म हो गई हैं। मगर चुनावों में धन का दुरुपयोग रोकने के उसके प्रयासों को राजनीतिक दलों ने ही पलीता लगा दिया है। यदि उसे राजनीतिक पार्टियों का सहयोग नहीं मिलेगा, तो वह अपनी ज़िम्मेदारी पूरी तरह से नहीं निभा पाएगा। हमारे राजनीतिक तंत्र में व्यापक सुधार की जरूरत है। इसके लिए पूरे समाज को आगे आना होगा। राजनीति में अच्छे व्यक्तियों का आना बहुत कम हो गया है अपराधीकरण ने पूर्व राष्ट्रीय राजनीति में अपना दबदबा बना रखा है।भारत की राजनीति में आज वृद्ध लोगों का ही बोलबाला है और चंद गिने-चुने युवा ही राजनीति में है। इसका एक कारण यह है कि भारत में राजनीति का माहौल दिन-ब-दिन बिगड़ रहा है और सच्चे राजनीतिक लोगों की जगह सत्तालोलुप और धन के लालची लोगो ने ले ली है।

राजनीति में देश प्रेम की भावना की जगह परिवारवाद, जातिवाद और संप्रदाय ने ले ली है। आए दिन जिस तरह से नेताओं के भ्रष्टाचार के किस्से बाहर आ रहे है देश के युवा वर्ग में राजनीति के प्रति उदासीनता बढ़ती जा रही है।अब भारत की राजनीति में सुभाषचन्द्र बोस, शहीद भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, लोकमान्य तिलक जैसे युवा नेता आज नहीं है। जो अपने होश और जोश से युवा वर्ग के मन में एक नई क्रांति का संचार कर सके। लेकिन अफसोस आजादी के बाद नसीब में है यह बूढ़े नेता जो खुद की हिफाजत ठीक से नहीं कर सकते तो युवा को क्या देशभक्ति या क्रांति की बातें सिखाएंगे,यही वजह है कि भारत के युवा अब इस देश को अपना न समझकर दूसरे देशो में अपना आशियाना खोज रहे हैं। वे यहां की राजनीतिक सत्ता और फैले हुए भ्रष्टाचार से दूर होना चाहते हैं। इसलिए वे कोई भी ठोस कदम उठाने से पहले कई-कई बार सोचते हैं। यहां तक कि भारत में वोट डालने वाले युवा को अपने चुने हुए उम्मीदवार पर तक भरोसा नहीं होता है।आजके युवाओं को सिर्फ और सिर्फ टारगेट ओरियेंटेड बना दिया गया है मतलब यह है कि आजकल के माता-पिता स्वंय नहीं चाहते कि उनका पुत्र या पुत्री अपने कार्यो के अलावा देश के सामाजिक कार्यो में भी अपना योगदान दें क्योंकि आजकल का माहौल ही कुछ इस तरह का हो गया है कि सब केवल अपना भविष्य बनाने में लगे हुए हैं।


यहां तक कि आजकल के युवाओं को उनके परिवार के प्रति जिम्मेदारी का एहसास तक नहीं होता इसलिए हमें इसके लिए कई ठोस कदम उठाने होंगे।आज भारत का हर नागरिक भली-भांति अपना अच्छा बुरा समझता है। युवाओं को संप्रदायवाद तथा राजनीति से परे अपनी सोच का दायरा बढ़ाना होगा। युवाओं को इस मामले में एकदम सोच समझकर आगे बढ़ना होगा। और ऐसी किसी भी भावना में न बहकर सोच समझकर निर्णय लेना होगा।भारत का युवा वर्ग वाकई में समझदार है जो सच में इस मामले में एक है और ज्यादातर युवावर्ग राष्ट्रधर्म को सर्वोपरि मान रहा है। यह वाकई में एक अच्छी और सकारात्मक बात है जो भारत जैसे देश के लिए बड़ी बात है।

और भी चीजें है जैसे बेरोजगारी, सरकारी नौकरियों में जगह पाने की लिए रिश्वत जैसी बातें भी कारण है युवा को देश से दूर करने के लिए। इसीलिए हमें समय-समय पर अपने युवाओं का मार्गदर्शन करना होगा। युवा इस देश की  नीव है इन्हें मजबूत करने की जरूरत है  सही मार्गदर्शन देने की जरूरत है।

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