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Friday, November 20, 2020

कुछ भूली बिसरी यादें..........

देवेश प्रताप सिंह राठौर 

(वरिष्ठ पत्रकार)

........ जब हम सोचते हैं कि हम जब हमारा बचपन था मां बाप के साथ रहते थे पढ़ते थे खेलते थे और मेरे साथी बचपन में बने थे वह सब पल जब याद आते हैं तो जब देखता हूं आंखें खोल कर तब सारा सुन्य नजर आता है। क्यों शून्य नजर आता है बचपन से लेकर आज तक कितने साथी मिले और बिछड़े जिन्हें कभी सोचा नहीं था। वह लोग साथ छोड़ कर चले गए जीवन का सत्य है जो लोग भावनात्मक लगाव रखते हैं ,उन्हें कष्ट होता है बचपन से शिक्षा से लेकर और सर्विस या व्यवसाय या सामाजिक के लिए कोई कार्य करने पर बहुत से लोग मिलते हैं ।उनमें कुछ खास होते हैं वह सब परिस्थितियों के साथ बदलाव होता है। उस पल बहुत सभी की याद आती है और सोचने को मजबूर कर देती है वह हमारा बचपन जहां पर हम क्रिकेट खेलते थे जहां पर हम गुल्ली डंडा खेलते थे जहां पर हम पतंग उड़ाते थे जहां पर हम कबड्डी खेलते थे ।जहां पर हम वॉलीबॉल खेलते थे जहां पर हमारे नए नए साथी शिक्षण काल में बने और पिछड़े एक पल ऐसा था जब मैं ग्रेजुएशन में था उस डिग्री कॉलेज में कभी चुनाव नहीं होते थे। पर वहां पर विभाग जिस विषय से हैं शिक्षा ले रहे थे उस विभाग में विभागाध्यक्ष सारी कक्षाओं में उस सब्जेक्ट के जितने भी सेक्शन होते थे, उसमें मै महामंत्री चुना गया था कॉलेज का और मेरा मित्र राजेश यादव अध्यक्ष हुआ करते थे। सब याद है बहुत ही इमोशनल है आज जीवन के 50 वर्ष के ऊपर के पड़ाव में पहुंच कर बहुत कुछ खो चुका हूं, उस में सबसे कीमती चीज है अपने मां-बाप और बहुत से साथी गण बहुत से भूली बिसरी यादें आज मैं कभी किसी का बेटा था आज मैं किसी का बाप हूं बहुत सी स्थितियां बदली लोग बदले समय बदला और यादें पढ़ती गई है। लखनऊ में सहारा इंडिया परिवार में छोटे से पद पर कार्य करने वाला व्यक्ति देवेश प्रताप सिंह राठौर मेरा परम मित्र बड़ा भाईसे वड कर सहारा इंडियमे कार्य करता था जिसका नाम त्रिलोचन सिंह सोखी बात रति बने के अंदर उसका देहांत हो गया 15 मार्च 2018 को झांसी में बुंदेलखंड बॉडीबिल्डर की प्रतियोगिता में जज बन कर आया तब मैं त्रिलोचन सिंह सोखी को अपने साथ उन्हें झांसी में घुमाया और बड़ा अच्छा लगा त्रिलोचन सिंह सोखी ने मुझे हमेशा भाई जैसा प्यार किया मेरी तबीयत खराब हो गई थी मैंने सहारा इंडिया के डायरेक्टर को फोन किया मैंने कहा सर मेरी तबीयत बहुत खराब है मेरा शरीर सुन  हो गया है मैं लखनऊ के नहरिया पर हूं मैंने त्रिलोचन सिंह सोखी को फोन किया 10 मिनट में त्रिलोचन सिंह सोखी अवध हॉस्पिटल आ गए और हमारे डायरेक्टर साहब ने तुरंत दो-तीन लोगों को भेजा और मैं अवध हॉस्पिटल में दो-तीन घंटे तक मेरा इलाज चला और मैं त्रिलोचन सिंह सोखी के घर में रुका वह मुझे अपने साथ लेकर गया कहा तो उन्नाव नहीं जाओगे आराम करो चल के घर पर लखनऊ में मेरा एक बहुत अच्छा हमदर्द मेरा साथी मेरा भाई त्रिलोचन सिंह सुखी नहीं है मुझे बहुत कष्ट होता है क्योंकि वह बहुत ही स्वाभिमानी है बहुत ही भावनात्मक और मदद करने वाला व्यक्ति हमेशा रहा वह एक बहुत ही अच्छा व्यक्ति था साथ साथ उसका व्यवहार मैंने लखनऊ में सहारा इंडिया में नौकरी करने पर सोकी जी के साथ जहां-जहां गया वहां उनका सम्मान मैंने देखा कभी-कभी संस्था जहां पर हम कार्य करते हैं वह हमारे गुणों को नहीं पहचान पाती और जिस पद के हकदार हो पद नहीं मिल पाता क्योंकि स्वाभिमानी व्यक्ति चमचागिरी रहित व्यक्ति आगे नहीं बढ़ पाता है। ना ही कभी किसी पद या किसी बात की वह बात कह पाते हैं। मेरे 50 साल की उम्र में बहुत से स्कूल कॉलेज से लेकर नौकरी तक कितने लोग मिले कितने साथी मिले कितने अच्छे मिले धीरे-धीरे सब बिछड़ते गए जब यह एकांत भाव से सोचता हूं तो उनमें जो अच्छे लोग होते हैं उनकी याद आती है जो खराब लोग होते हैं उनकी याद आती है


क्योंकि व्यक्त का सिद्धांत स्वभाव कभी बदलता नहीं है और जन्म से ही उसका वह स्वरुप बनकर तैयार हो जाता है । मैं बहुत ही भावनात्मक व्यक्त हूं किसी का दर्द दुख से या गरीब कमजोर की रोने की पीड़ा से मेरा दिल बहुत ही रोने लगता है मैं विचलित हो जाता हूं।मेरा भी वही स्वभाव है स्वाभिमानी हो संस्था के प्रति वफादार हूं जहां भी रहो जहां पर हो उसके साथ गद्दारी नही करनी चाहिए ऐसे मेरे परिवार के लोगों ने मेरे मां-बाप ने मुझे संस्कार सिखाए हैं मैं जिस थाली में खाता हूं उसमें छेद कभी नहीं करता चाहे जितना बड़ा नुकसान क्यों ना हो जाए यह मेरा स्वभाव और सिद्धांत मेरे साथ मेरे पूरे परिवार का है।ऐसे लोग आज परेशान है और परेशान रहते हैं।और गद्दार चमचागिरी मौकापरस्त के लोग आज बहुत बड़े-बड़े पदों पर बैठे हैं और बहुत से लोग नौकरी छोड़ कर अतः पैसा कमा कर जय हिंद कर कर चले गए, अब वही बचे हैं जो स्वाभिमानी है संस्था के वफादार हैं।बहुत ही गंदी सोच के लोग आज भी है।वह जानते हैं इधर से हटे बाहर कोई उन्हें 5000 महीने में नौकरी नहीं मिल रही है जो इस हालातों में 50000 से ऊपर तक पा  रहे हैं। इस तरह के लोग कभी भी छोड़ नही सकते है।एक समय मेरी जब तबीयत खराब हुई है लखनऊ में जब मैं कार्य करता था जव में अवध हॉस्पिटल अकेले डायरेक्टर को बता कर भाग कर पहुंचा मैंने एक फोन श्री त्रिलोचन सिंह सोखी को किया तुरंत आकर मुझे भाई से अधिक प्यार दिया और मेरी जिस तरह से अस्पताल में तन मन धन से मेरे साथ त्रिलोचन सिंह सोखी जी के साथ एक डायरेक्टर महोदय के आदेश से कई स्टाफ जैसे राजीव खरे जी ने भेजें अवध हॉस्पिटल में जब मैं ठीक हो गया त्रिलोचन सिंह सोफी कि मुझे जब कुछ आराम महसूस हुआअपने घर ले गए रात भर में उनके घर पर रहा  सुबह में अपने वरिष्ठ अधिकारियों से पूछकर उन्नाव घर चला गया,और 30 जून 2018 को बीमारी से उसकी मृत्यु हो गई। उनके परिवार बच्चों के लिए एक बहुत बड़ी घटना  दुर्घटना बहुत बड़ा दुख रहा बहुत से लोग मोहल्ले में गली में कूचे में शहर में जो परिचित होते हैं जिससे हमारा हम जानते है पहचानते हैं जानते हैं होता है ऐसी बहुत सी घटनाएं देखने को मिलती है जो कि उस व्यक्ति के जीवन को झकझोर कर रख देती है। जिसे हम जानते हैं दुख महसूस करते हैं लेकिन इस दुनिया में मोहल्ले में शहर में एक से एक गंभीर स्थितियां परिस्थितियां बनती बिगड़ती है। जव उन्हें सोचते हैं तब महसूस करते हैं जिंदगी इसी का नाम है। हम सोचते हैं अतीत को उस अतीत के बारे में जब गंभीरता से जुड़ जाते हैं तो घबराहट महसूस होने लगती है कैसी विडंबना है बचपन से लेकर आज तक कितने लोग आए मित्र रहे इतने मिले कोई कहां कोई कहां कुछ पता नहीं है ।सिर्फ सोचना रह जाता है। कभी गंभीरता से सोचो और समझो किस तरह समाज परिवार हम सब एक दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं ,जबकि ऐसी सोच वाले खुद नीचे गिर जाते हैं क्योंकि उसके साथ ईश्वर नहीं होता है। आप सोचे समझे कल मैं किसी का बेटा था आज मैं किसी का बाप हूं आने वाले कल में मेरा बेटा बाप होगायह सिलसिला चलता रहता है इसी का नाम जीवन है। जीवन इसी तरह चलता रहता है।हमेशा से यह मानना रहा है कि दुनिया में ‌जितना बदलाव हमारी पीढ़ी ने देखा है वह ना तो हमसे पहले किसी पीढ़ी ने देखा है और ना ही हमारे बाद किसी पीढ़ी के देखने की संभावना लगती है।हम वो आखरी पीढ़ी हैं जिसने बैलगाड़ी से लेकर सुपर सोनिका जेट देखें हैं। बैरंग ख़त से लेकर लाइव चैटिंग तक देखा है और असंभव लगने वाली बहुत सी बातों को संभव होता देखा है। हम वो आखरी पीढ़ीहैंजिन्होंने कई-कई बार मिटटी के घरों में बैठ कर परियों और राजाओं की कहानियां सुनीं, जमीन पर बैठ कर खाना खाया है, प्लेट में चाय पी है।हम वो आखरी लोग हैं

जिन्होंने बचपन में मोहल्ले के मैदानों में अपने दोस्तों के साथ पम्परागत खेल, गिल्ली-डंडा, छुपा-छिपी, खो-खो, कबड्डी, कंचे जैसे खेल खेले हैं।

हम वो आखरी पीढ़ी के लोग_हैं 

जिन्होंने कम या बल्ब की पीली रोशनी में होम वर्क किया है और चादर के अंदर छिपा कर नावेल पढ़े हैं।  हम वही पीढ़ी के लोग हैं।जिन्होंने अपनों के लिए अपने जज़्बात, खतों में आदान प्रदान किये हैं और उन ख़तो के पहुंचने और जवाब के वापस आने में महीनों तक इंतजार किया है।हम वो आखरी पीढ़ी के लोग हैं

जिन्होंने कूलर, एसी या हीटर के बिना ही  बचपन गुज़ारा है। और बिजली के बिना भी गुज़ारा किया है।हम वो आखरी लोग हैंजो अक्सर अपने छोटे बालों में, सरसों का ज्यादा तेल लगा कर, स्कूल और शादियों में जाया करते थे।

हमवो आखरी पीढ़ी के लोग_हैं

जिन्होंने स्याही वाली दावात या पेन से कॉपी,  किताबें, कपडे और हाथ काले, नीले किये है। तख़्ती पर सेठे की क़लम से लिखा है और तख़्ती घोटी है।

हम वो आखरी लोग हैं

जिन्होंने टीचर्स से मार खाई है। और घर में शिकायत करने पर फिर मार खाई है।

हम वो आखरी लोगहैं

जो मोहल्ले के बुज़ुर्गों को दूर से देख कर, नुक्कड़ से भाग कर, घर आ जाया करते थे। और समाज के बड़े बूढों की इज़्ज़त डरने की हद तक करते थे।हम वो आखरी लोग हैं जिन्होंने अपने स्कूल के सफ़ेद केनवास शूज़ पर, खड़िया का पेस्ट लगा कर चमकाया हैं।...हम वो आखरी लोगहैं

जिन्होंने गोदरेज सोप की गोल डिबिया से साबुन लगाकर शेव बनाई है। जिन्होंने गुड़  की चाय पी है। काफी समय तक सुबह काला या लाल दंत मंजन या सफेद टूथ पाउडर इस्तेमाल किया है और कभी कभी तो नमक से या लकड़ी के कोयले से दांत साफ किए हैं। हमनिश्चितहीवोलोग_हैं

जिन्होंने चांदनी रातों में, रेडियो पर BBC की ख़बरें, विविध भारती, आल इंडिया रेडियो, बिनाका गीत माला और हवा महल जैसे  प्रोग्राम पूरी शिद्दत से सुने हैं।

हम वो आखरी लोग हैं

जब हम सब शाम होते ही छत पर पानी का छिड़काव किया करते थे। उसके बाद सफ़ेद चादरें बिछा कर सोते थे। एक स्टैंड वाला पंखा सब को हवा के लिए हुआ करता था। सुबह सूरज निकलने के बाद भी ढीठ बने सोते रहते थे। वो सब दौर बीत गया। चादरें अब नहीं बिछा करतीं। डब्बों जैसे कमरों में कूलर, एसी के सामने रात होती है, दिन गुज़रते हैं।

हमवोआखरीपीढ़ीकेलोगहैं

जिन्होने वो खूबसूरत रिश्ते और उनकी मिठास बांटने वाले लोग देखे हैं, जो लगातार कम होते चले गए। अब तो लोग जितना पढ़ लिख रहे हैं, उतना ही खुदगर्ज़ी, बेमुरव्वती, अनिश्चितता, अकेलेपन, व निराशा में खोते जा रहे हैं। और हमवोखुशनसीबलोगहैं, जिन्होंने रिश्तों की मिठास महसूस की है...

हमएकमात्रवहपीढी_है  जिसने अपने माँ-बाप की बात भी मानी और बच्चों की भी मान रहे है। बहुत से लोग जाति धर्म पर एक दूसरे को मारने मरने के लिए तैयार हो जाते हैं पर तूने यह नहीं मालूम समय स्थित को समझने का प्रयास नहीं करते हैं। आज यादों के बीच कुछ लिखने का मन अलग जीवन की असलियत को परखने समझने और जो लोग अन्याय करते हैं उनके लिए यह भूले यादों पर जब हो जाते हैं तब एहसास होता है। दुनिया है बहुत विचित्र है बहुत से कम लोग हैं जो इतनी गहराई तक सोचते हैं पढ़ना आज कमाना इंसान को यूज एंड थ्रो की तरह समझ कर आगे बढ़ता है। हम किसी को धोखा देकर कुछ क्षण के लिए तो अच्छा बन सकते हैं लेकिन जब वह समय सच्चाई के रूप में सामने आता है उस वक्त उस व्यक्ति के बारे में सोचो उस पर क्या एहसास करता होगा। बहुत से लोग तानाशाही के तौर पर एक दूसरे को नीचा दिखाने का कार्य करते हैं और धन दौलत के लिए मरने और मारने के लिए तैयार होते हैं उन्हें यह नहीं मालूम जीवन का असली सत्य क्या है मानव जीवन बहुत ही पुण्य कर्म के बाद प्राप्त होता है।


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