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Tuesday, November 24, 2020

कश्मीर में कश्मीरी पंडितों की निर्मम हत्याओं पर गुपकार संघटन चुप रहा क्यों?.............

 देवेश प्रताप सिंह राठौर 

(वरिष्ठ पत्रकार)

...... वर्ष 1990 मजबूरियों और दर्द  उनके लोकल व अपने मुद्दों को देखना शुरू करें? 1990 को वो दिन माना जाता है जब कश्मीर के पंडितों को अपना घर छोड़ने का फरमान जारी हुआ था. कश्मीर को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच तो जंग 1947 से ही जारी है. पर कश्मीर में लोकल स्थिति इतनी खराब नहीं थी. तमाम कहानियां हैं कश्मीरी मुसलमानों और कश्मीरी पंडितों के प्यार की. पर 1980 के बाद माहौल बदलने लगा था. रूस अफगानिस्तान पर चढ़ाई कर चुका था. अमेरिका उसे वहां से निकालने की फिराक में था. लिहाजा अफगानिस्तान के लोगों को मुजाहिदीन बनाया जाने लगा. ये लोग बगैर जान की परवाह किये रूस के सैनिकों को मारना चाहते थे. इसमें सबसे पहले वो लोग शामिल हुए जो अफगानिस्तान की जनता के लिए पहले से ही समस्या थे. क्रूर, वहशी लोग. उठाईगीर और अपराधी. इन सबकी ट्रेनिंग पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर में होने लगी. तो आस-पास के लोगों से इनका कॉन्टैक्ट होना शुरू हुआ. इनसे जुड़े वो लोग जो पहले से ही कश्मीर के लिए समस्या बने हुए थे. क्रूर, वहशी लोग. उठाईगीर और अपराधी. इन सबको प्रेरणा मिली पाकिस्तान के शासक जनरल ज़िया से. इतने ऊंचे पद पर रहकर वो यही काम कर रहे थे. क्रूरता उनका शासन था. वहशीपना न्याय. धर्म के उठाईगीर थे. अपराध जनता से कर रहे थे.जब ऐसे लोगों पर पुलिस ने कार्रवाई की तो उसकी जद में बाकी मुसलमान भी आ गए. कई जगहों पर बेकसूर लोग भी फंस गये. अब धर्म के उठाईगीरों को मौका मिल गया. वो कहने लगे कि हम पहले से ही कहते न थे कि कश्मीरी काफिर हमारे दुश्मन हैं! इन्हें यहां रहने न दिया जाए. कश्मीर में पंडित कभी भी 5% से ज्यादा नहीं थे. हालांकि कई जगहों पर क्लेम किया जाता है कि ये यहां पर 15-20% तक हुआ करते थे. पर ये जरूर था कि पुलिस और प्रशासन में कश्मीरी पंडित ठीक-ठाक संख्या में थे. जज, डॉक्टर, प्रोफेसर, सिविल सर्वेंट ऐसे पद होते हैं जो आसानी से नजर में आ जाते हैं. तो धर्मांध लोगों को आसानी से टारगेट मिल गया. उठाईगीर, चोर और अपराधी पहले से इन लोगों से लगे-बुझे थे. अब तो वजह मिल गई थी. सबको रेडिकलाइज किया जाने जिस जगह में कश्मीरी पंडित सदियों से रह रहे थे, उनको घर छोड़ने के लिए कहा जाने लगा. पहले तो आस-पास के लोगों ने सपोर्ट किया कि नहीं, आपको कहीं नहीं जाना है. पर बाद में कुछ तो डर और कुछ अपनी यूनिटी की भावना से कहा जाने लगा कि बेहतर यही होगा कि आप लोग चले जाइए. क्योंकि बसों में ब्लास्ट होने लगे. यूं ही गोलियां चलने लगीं. ऐसा नहीं था कि सिर्फ पंडित ही मरते थे. मुसलमान भी मरते थे. पर धर्म की आग इतनी तेज थी कि उनके मरने की आवाज को आतंकवादियों ने दबा दिया. हर जगह यही धुन थी कि पंडितों को यहां से बाहर भेज


देना हैसरकार ने इस आग में एक बहुत बड़ा पलीता लगाया. 1986 में गुलाम मोहम्मद शाह ने अपने बहनोई फारुख अब्दुल्ला से सत्ता छीन ली और जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री बन गये. खुद को सही ठहराने के लिए उन्होंने एक खतरनाक निर्णय लिया. ऐलान हुआ कि जम्मू के न्यू सिविल सेक्रेटेरिएट एरिया में एक पुराने मंदिर को गिराकर भव्य शाह मस्जिद बनवाई जाएगी. तो लोगों ने प्रदर्शन किया. कि ये नहीं होगा. जवाब में कट्टरपंथियों ने नारा दे दिया कि इस्लाम खतरे में है. इसके बाद कश्मीरी पंडितों पर धावा बोल दिया गया. साउथ कश्मीर और सोपोर में सबसे ज्यादा हमले हुए. जोर इस बात पर रहता था कि प्रॉपर्टी लूट ली जाए. हत्यायें और रेप तो बाई-प्रोडक्ट के रूप में की जाती थीं. नतीजन 12 मार्च 1986 को राज्यपाल जगमोहन ने शाह की सरकार को दंगे न रोक पाने की नाकामी के चलते बर्खास्त कर दिया गया था। एक दिन, जब आपके अपने लोग आपको अपने घरों से भाग जाने को मजबूर करते हैं. सरकार आपका साथ नहीं देती. फिर आपके दर्द को भुला भी दिया जाता है. ये सब हमारे देश में ही हुआ है. हमारे भारत में कई जगहों पर अत्याचार हुए हैं लोगों पर. उन पर बात भी होती है. लेकिन कश्मीरी पंडितों पर हुए अत्याचार को सेक्युलर रहने और देश में समरसता लाने के नाम पर बहा दिया गया है. ये सच है कि माइनॉरिटीज़ के साथ बहुत बार, बहुत खराब व्यवहार हुआ है, पर ये भी सच है कि कश्मीरी पंडितों के साथ भी उतना ही खराब व्यवहार हुआ है. ऐसा लगता है कि हमारा सिस्टम खुद से ही डरता है. हमें यकीन है कि हम लोग अपने लोगों को बचा नहीं पाएंगे. इसलिए हम ये मानने से भी डरते हैं कि कश्मीरी पंडितों के साथ बुरा हुआ है. क्योंकि मन में डर होता है कि फिर बाकी जगहों पर लोग मुसलमानों को तंग करने लगेंगे. पर क्या ये तरीका सही है? क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम सबको न्याय दिला पाएं? न्याय के क्रम में ये कहां से आ जाएगा कि जो ‘बहुसंख्यक’ है वो पीड़ित नहीं हो सकता और ‘अल्पसंख्यक’ गलत नहीं हो सकता? फिर ऐसा तो नहीं है कि इन दोनों वर्गों के लोग आपस में एक-दूसरे से बहुत जुड़े हुए हैं. अगर ऐसा होता तो ये अपना दुख आपस में बांट ही लेते. बात ही खत्म हो जाती. क्या हम ऐसा नहीं कर सकते कि लोगों को बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक के चश्मे से देखना छोड़कर राष्ट्रीय नागरिक के रूप मेंं सोचें जिस तरह कश्मीरी पंडितों की हत्याा की गई हो काश्मीर  मैं जिस तरह कीीी गई गुपकार  संगठन को दिखाई नहींं दिया। आज धारा 370 आर्टिकल 35 ए  हटने पर गुपकार गैंग बना रखा है। शर्म करो फारूक अब्दुल्लाह महबूबा मुफ्ती और अलगाववादीी नेता इतने स्वार्थीथी हो गए कि चीन सेेेेेे भीख मांग रहे हैं कि हमारी सहायता करो चुल्लू भर पानीी में डूब कर मर जाओ शर्म करो इस देश ने तुम को क्या क्या दिया है तुम उसी देश के साथ गद्दारी कर रहेे हो। कश्मीर पंडित की क्योंकि जिस तरह हत्याएं की गई जम्मू कश्मीर में यह देश के लिए और इंसानियत के लिए एक बहुत बड़ा धब्बा है।आप धारा 370 आर्टिकल 35 ए हटा है ।अब कश्मीरी पंडितों को न्याय मिलना चाहिए और उनके घर वापस होने चाहिए और उन्हें पुनः जो मंदिर तोड़कर मस्जिदए बनाई गई है उनका निर्माण होना चाहिए

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