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Tuesday, November 3, 2020

काजल से भी काला कलंक .........

देवेश प्रताप सिंह राठौर 

(वरिष्ठ पत्रकार)

............... यह भजन अनूप जलोटा ने गाया जो उम्र के जिस पड़ाव में (वृद्धावस्था) उन्होंने जो किया है स्वयं इस भजन में जो शब्दों का उच्चारण है आज की तिथि में अनूप जलोटा पर जो चरित्र रूपी हनन कलंक लगा है और उन्होंने यह गीत यह ग़ज़ल बहुत पहले गाई हैअनूप जलोटा के भजन रंग दे चुनरिया के अंतरों में कई गूढ़ बातों का जिक्र है। इनमें एक अंतरा है जल से पतला कौन है कौन भूमि से भारी। कौन अगन से तेज है कौन काजल से कारी। इसका उत्तर दिया है जल से पतला ज्ञान है, पाप भूमि से भारी, क्रोध अगन से तेज है, कलंक काजल से कारी। इस भजन में कलंक को काजल से भी काला बताया गया है। व्यावहारिक जीवन में भी बुजुर्ग, बड़े सब यही सलाह देते हैं कि अपने ऊपर कलंक मत लगने दो। कलंक लगने के बाद भी यदि कोई अपने जीवन को बदल भी दे तो भी


दुनिया उसे बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ती। मेरा मानना है जिंदगी में सब कुछ मिल जाता है लेकिन जिस व्यक्ति का चरित्र गिर गया धन दौलत चाहे जितना कमा लो लेकिन जहां चरित्र का हनन हुआ उसका समाज में जीवित तो रहता है लेकिन वह काजल से भी काला कलंक से गिरा हुआ व्यक्ति रहता है। ऐसा बुद्धिजीवियों का मानना है। बहुत सी मिसाले हैं लोग अपने को परिवार को अपने बच्चों अपनी उम्र को भूल कर किस हैवानियत रूपी कार्य करते हैं जिससे पूरा समाज घर परिवार कलंकित हो जाता है। कलम को चीज है जो जीवन में लग जाए वह कभी हटती नहीं है वो ठप्पा हमेशा बना रहता है।

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