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Monday, November 30, 2020

गुरूनानक देव जी का मनाया 551 वां प्रकाशोत्सव

फतेहपुर, शमशाद खान । ‘‘एक नूर ते सब जग उपजया’’ प्रत्येक वर्ष की भांति इस वर्ष भी सिक्ख धर्म के अनुयायियों ने गुरूनानक देव जी की 551 वीं जयंती बड़े ही धूमधाम एवं हर्षोल्लास के साथ मनायी। गुरूद्वारे में जहां सुबह से ही गुरूवाणी, शबद, कीर्तन का दौर शुरू हो गया। वहीं दोपहर को लंगर का आयोजन किया गया। जिसमें सभी समुदाय के लोगो ने एक संगत-पंगत होकर प्रसाद ग्रहण किया। 

ज्ञानी गुरूवचन सिंह ने अपने सम्बोधन में कहा कि गुरूनानक देव अपने पूरे जीवन में समाज में प्रेम-भावना बढ़ाने का काम किया। इनका जन्म कार्तिक पूर्णिमा के दिन 15 अप्रैल सन् 1469 को राए भोए के तलवंडी गांव पाकिस्तान में हुआ। जिसे आज कल ननकावा साहिब के नाम से भी जाना जाता है। इनका प्रकाश माता तृप्ता जी के पावन उदर से हुआ। इनके पिता मेहता कल्याण दास जी खत्री नगर के हाकिम के पास पटवारी (मुंशी) का काम करते थे। बचपन से ही गुरूनानक देव जी के चेहरे पर अद्भुत तेज दिखाई देता था। प्रखर बुद्धिवाले नानकदेव सिख धर्म के संस्थापक थे। धर्म और अध्यात्म में उनकी गहरी रूचि थी। संसार में अज्ञानता के अंधेरे को दूर करने के लिए लगातार 24 वर्ष सत्य का प्रचार किया और नारा लगाया ‘‘अव्वल अलह दूर उपाएया, कुदरत के सभ बंदे, एक नूर


भण्डारे में प्रसाद ग्रहण करतीं सिक्ख समुदाय की महिलाएं।

ते सभ जग उपजिया कोण भले को मन्द्रे’’। बताया कि गुरू जी ने चारो दिशाओं में अपने उपदेशों के द्वारा सत्य का प्रचार किया। उन्होने एक ही ईश्वर की संतान होने के नाते हमने ऊॅच-नीच का भाव नही होना चाहिए। उन्होने सामाजिक सद्भाव की मिसाल कायम की। ऊंच-नीच का भेदभाव मिटाने के लिए लंगर की परम्परा चलाई जो गुरूद्वारे में आज भी कायम है। उन्होने बताया कि देश-विदेश की यात्रा करने के पश्चात् गुरू जी अपने अंतिम समय में अपने परिवार के साथ करतारपुर में बस गये थे। ईश्वर एक है, सदैव एक ही ईश्वर की उपासना करो वह सभी जगह मौजूद है आदि शिक्षाओं के साथ गुरू जी 22 सितम्बर 1539 ई0 को करतारपुर में ज्योति-ज्योत समा गये। गुरूनानक देव जी की जयंती के अवसर पर गुरूद्वारे में लंगर का आयोजन किया गया। जिसमें सभी समुदाय के लोगो ने एक संगत-पंगत में प्रसाद ग्रहण किया। 


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