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Friday, October 2, 2020

अहिंसक आंदोलन के पुरोधा महात्मा गांधी -ईमानदारी की प्रति मूर्ति शास्त्री जी

हमीरपुर, महेश अवस्थी  । किशनू बाबू शिवहरे महाविद्यालय में विमर्श विविधा मे, जिनका देश ऋणी है ,के तहत अहिंसक संग्राम के विश्व सूरमा महात्मा गांधी और शास्त्री  की जयंती पर श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए कालेज के प्राचार्य डॉ भवानी दीन ने कहा कि गांधी जी सही मायने में अहिंसक संग्राम के ऐसे पहले विश्व पुरोधा थे, जिनका कोई सानी नहीं था ।  साथ ही शास्त्री जी कर्मठता के प्रतीक और जय जवान जय किसान के उद्गगाता रहे । गांधी को देश की अविरल सेवा के कारण तीन प्रमुख लोगों ने महात्मा कहकर संबोधित किया था । सबसे पहले 1915 में राजवैद्य जीवराम कालिदास ने महात्मा कहा, उसके बाद स्वामी श्रद्धानंद ने 1915 में गांधी जी को महात्मा कहकर पुकारा, तत्पश्चात 1919 रविंद्र नाथ टैगोर ने गांधी जी को महात्मा कह कर संबोधित किया । सुभाष चंद्र बोस ने 1944 में  रन्गून रेडियो के संबोधन में गांधी जी को राष्ट्रपिता कहा था । गांधी जी की संपूर्ण लड़ाई का आधार अहिसक


सिद्धांत थे । असहयोग,सविनय अवज्ञा आंदोलन और व्यक्तिगत सत्याग्रह आंदोलन गांधी के अहिंसक आंदोलन थे ।  गांधी जी ने लन्दन मे तीन वर्ष तक पढ़ाई की, उसके बाद1893से 1914 तक दक्षिण अफ्रीका में नागरिक अधिकारों की लड़ाई लड़ी,चम्पारण और खेड़ा से किसानों के हित को  लेकर संघर्ष किया, उसके बाद आजादी के पहले तक गांधी का देश को आजाद कराने में अहम योगदान था, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता । लालबहादुर ने बनारस के हरिश्चंद्र स्कूल से हाईस्कूल किया,1926 मे काशी विद्यापीठ से शास्त्री की उपाधि हासिल की,जो उपनाम के रूप उनके जीवन से  जुड़ गई । ये शास्त्री के नाम से प्रसिद्ध हो गए ।  यह प्रदेश के मंत्रिमंडल में प्रदेश के तथा देश के मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री रहे ,9 जून 1964 को प्रधानमंत्री बने, 18 माह प्रधानमंत्री रहे, कर्मठता, देश सेवा और सादगी इनके रोम रोम में बसी हुई थी, 11 जनवरी 1966 को ताशकंद में इनका निधन हो गया । डॉ श्याम नरायन, प्रदीप यादव , अखिलेश सोनी,आरती गुप्ता ,नेहा यादव प्रशांत सक्सैना, सुरेश सोनी गणेश शिवहरे, हिमांशु सिंह ,आनंद रामचन्द्र साहू, राकेश यादव, राजकुमार गुप्ता ने विचार रखे । संचालन डा रामपाल ने किया।


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