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Tuesday, October 27, 2020

भारत में आजादी अहिंसा से नहीं मिली .............................

देवेश प्रताप सिंह राठौर 

(वरिष्ठ पत्रकार)

........हम आजादी की बात करते हैं तो उन वीर शहीदों के नाम हमारे सामने स्पष्ट दिखाई देते हैं ।जिन्होंने आजादी में बहुत ही महत्वपूर्ण अपना योगदान दिया है जिसमें सर्वप्रथम नाम आता है सुभाष चंद्र बोस दूसरा नाम आता है चंद्र शेखर आजाद  भगत सिंह ,राजगुरु, सुखदेव और सैकड़ों जो देश भक्ति के लोग थे जिनके नाम बहुत सारे हैं उन्होंने अपनी लहू से इस देश को सीचकर  हमें जो आजादी प्राप्त कराई है यह आजादी महात्मा गांधी जवाहरलाल नेहरू ने अहिंसा से इस देश को आजादी नहीं मिली है। सिर्फ अहिंसा से यह लोग अपने को सुरक्षित रखने का कार्य किया है।आज वह इस व दुनिया में आजादी के बाद जीवित बचे अगर जो जीवित बच सकते थे उनको महात्मा गांधी ने जवाहरलाल नेहरू ने पहल नहीं की जब भगत सिंह सुखदेव राजगुरु को फांसी की सजा हुई उस समय अगर महात्मा गांधी जवाहरलाल नेहरू प्रयास करते तो भगत सिंह राजगुरु सुखदेव को फांसी नहीं लगती उन्होंने इसलिए नहीं बताया कि आजादी के बाद इन लोगों की मान्यता कम हो जाती है और भारत के सच्चे सपूत जो शहीद हुए


इन्हीं लोगों को देश अपने लाडले प्यारे को आंखों में छुपा कर रखती उन्होंने भगत सिंह सुखदेव राजगुरु को बचाने का प्रयास नहीं किया।हिंसा और आहिंसा दोनों का इस्तेमाल कर हमें यह आजादी प्राप्त की है । लेकिन इस देश में सबूतों को उन लोगों की जयंती पर कोई भी इतना जागरूक और देश में धूमधाम से नहीं मनाया  नहीं जाता है ।  चाचा नेहरू, से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को दोअक्टूबर को उनकी जयंती पर हमारे देश के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का जन्म जन्मदिन मनाया जाता है की जयंती मनाई जाती है यह जयंती महात्मा गांधी के लिए 2 अक्टूबर निर्धारित है। साथ में लाल बहादुर शास्त्री को उनका नाम भी ले लिया जाता है ।उनके दिल में जरा सी भी अगर पहल करते जो हमारे शहीद सपूत सुभाष चंद्र शेखर आजाद भगत सिंह राजगुरु सुखदेव इनको भी सम्मान देश की राजनीति नहीं होती और पूरा देश आज जो हमारे वीर शहीद आजादी के पहले फांसी दी गई, लेकिन हमें यह आजादी एक कठिन राह से गुजरकर और बहुत-सी कुर्बानियाँ देकर हासिल हुई है। इस आजादी की कीमत हमने शहीदों के खून और देशवासियों के बलिदान से चुकाई है। यदि गुजरे इतिहास के पन्‍नों को खँगालें तो उन बलिदानों पर से परदा उठता है और उन दिनों की स्‍मृतियाँ ताजा हो उठती हैं।अँग्रेजों से पहले भारत पर मुगलों का शासन था और उन्होंने अपने राजनीतिक और आर्थिक लाभ के लिए हमारी धरती का उपयोग किया। सन् 1600 में जब अँग्रेजों ने व्यापार के उद्देश्य से भारत में प्रवेश किया था तो मुगल सम्राट को इसका अंदेशा भी नहीं था कि ये अँग्रेज व्यापार के बहाने उन्हें उनके राज्य से बेदखल कर देंगे। व्यापार की आड़ में देश पर अपना अधिकार जमाने की रणनीति धीरे-धीरे कारगर हुई।जब चालाक मुगल शासक अँग्रेजों की कुटिल रणनीति को नहीं समझ पाए तो भला भोले-भाले लोग उस खतरे को कैसे भाँप पाते कि यह व्यापार उनका सर्वस्व लूटने के लिए किया जा रहा है। अत्याचार और लूट-खसोट का यह सिलसिला दो सदियों तक चला और अंतत: एक लंबी लड़ाई के बाद हमें ब्रिटिश हुकूमत से मुक्ति मिली और भारत आजाद हो गया।

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