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Saturday, October 3, 2020

सुख और दुःख चलाएं मान

देवेश प्रताप सिंह राठौर

(वरिष्ठ पत्रकार)

........................ आज हर व्यक्ति सुखी चाहत में दुःख क्या है वह समझ नहीं पाता इतना अधिक सुख में जीवन जीने के बाद जब अचानक दुःख आता है वह पीड़ा वह दर्द उस व्यक्ति से पूछो जिसने कभी दुख देखा ना हो और दुख का पहाड़ टूट पड़े यह बहुत ही कष्ट दाई समय होता है। किसी भी व्यक्ति को अपने बच्चों को इस माहौल में इस तरह तैयार करके शुरुआत करनी चाहिए कि कभी भविष्य में दुःख आए तो वह दुःख को सह सके ,जो पीड़ा दुःख ना देखने वाले व्यक्ति को अचानक दुःख प्राप्त हो वह क्षण मानसिक संतुलन खो बैठता है। आज दुनिया का हर इंसान सुख चाहता है। दुःख कोई नहीं चाहता। वह दुःख से डरता हैं इसलिए दुःख से छुटकारा पाने के लिए तरह-तरह के प्रयत्न करता है। मतलब दुःख को खत्म करने और सुख को सृजित करने के लिए हर इंसान अपनी क्षमता के मुताबिक हमेशा कुछ-न-कुछ करता है। सुख और दुःख धूप- छाया की तरह सदा इंसान के साथ रहते हैं। लंबी जिन्दगी में खट्ठे-मीठे पदार्थों के समान दोनों का स्वाद चखना होता है। सुख-दुःख के सह-अस्तित्व को आज तक कोई मिटा नहीं सका है। जीवन की प्रतिमा को सुन्दर और सुसज्जित बनाने में सुख और दुःख आभूषण के समान है। इस स्थिति में सुख से प्यार और दुःख से घृणा की मनोवृत्ति ही अनेक समस्याओं का कारण बनती है और इसी से जीवन उलझनभरा प्रतीत होता है। जरूरत है इनदोनों स्थितियों के बीच संतुलन स्थापित करने की, सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने की। रूस के महान साहित्यकार और क्रांतिकारी मैक्सिम गोर्की ने कहा है कि खुशी जब हाथ में होती है तो छोटी लगती है। उसे एक बार छोड़कर देखो और एक पल में पता लग जाएगा कि यह कितनी बड़ी और खास है। मैक्सिम गोर्की इंसानी नजरिया को स्पष्ट करते हुए आगे कहता है कि एक दुखी आदमी दूसरे दुखी आदमी की तलाश में रहता है। उसके बाद ही वह खुश होता है। यही संकीर्ण दृष्टिकोण इंसान को वास्तविक सुख तक नहीं पहुंचने देता। जबकि हमें अपने अनंत शक्तिमय और आनन्दमय स्वरूप को पहचानना चाहिए तथा आत्मविश्वास और उल्लास की ज्योति प्रज्ज्वलित करनी चाहिए। इसी से वास्तविक सुख का साक्षात्कार संभव है।


सुख उस मधुर, कर्ण प्रिय गति-सा है जिसका गुनगुनना सबको अच्छा लगता है। सुख एक ऐसा वरदान है जिसकी सभी कामना करते हैं। सभी सुख पाने को बड़े उत्सुक होते हैं प्रसन्न परन्तु यह किसी की भी पकड़ में नहीं आता है। सुख बयार का वह झोंका है जिसके गुजर जाने का आभास तक नहीं होता है। सुख में समय कब निकल गया इसका जहां आभास तक नहीं होता है, वहीं दुःख में समय रुका, ठहरा सा लगता है। सुख कर रंग-रूप व्यक्तिगत होता है और वह जहां भीमिलताहैआनन्दमय लगता है। सुख में थकान की अनुभूति संभव नहीं। सुख उस कोमल मुलायम रेशम के धागा की गांठ-सा होता है जिसको खोज पाना संभव नहीं। सुख के लिए सारा संसार भागता रहता है। सुख भ्रम है या मृगतृष्णा यह विवाद का विषय है। संसार में सुखी व्यक्ति जहां और सुखी होने को दौड़ता है वहीं जिसे सुख नहीं मिलता वह संपूर्ण जीवन सुख की प्रतीक्षा करता रहता है।सुख-दुःख जुड़वा भाई के समान है, जो सदैव एक-दूसरे के साथ ही रहते हैं। यदि आप एक की अंगुली थामते हैं तो दूसरा तुम्हारे हाथ की कुंडली अवश्य पकड़ लेता है। इस तरह सुख-दुःख एक साथ चलते रहते हैं, पर हम अपनी आंखों पर लगे पर्दे के कारण इस अंतर को, भेद को समझ नहीं पाते है, विशेष रूप से दुख को। मनुष्य दुख में इतना दुखी हो जाता है कि उसे सुख का आभास तक भी नहीं हो पाता है तथा वह सुख की तलाश करने लगता है।

प्रत्येक व्यक्ति के लिए सुख की परिभाषा अलग-अलग होती है यथा दरिद्र के लिए पैसा सुख है वहीं धनवान के लिए अधिकाधिक पैसा कमाना सुख है। मृत्यु शैय्या पर पड़ा व्यक्ति मृत्यु की कामना करके सुखानुभूति करता है और युवा अपने प्रेम की सफलता व स्वयं की गाड़ी, बंगला तथा भौतिक सुविधाओं के अम्बार को सुख मानता है। पर इन सबकी प्राप्ति उपरांत भी मानव मन से सुखी न होने पर भी सुखी वही होता है।

संसार में कतिपय ऐसे उदाहरण है जबकि सामान्य रूप से दुःखी दिखाई देने वाले मानसिक रूप से अत्यधिक सुखी होते हैं- यथा प्रेम दीवानी मीरा ने राजा द्वारा मारने के लिए भगवान का प्रसाद रूप भेजा विष का प्याला बड़ी प्रसन्नता से पीया और अमर हो गई। भगवान् राम के साथ वन में सीता दुःखों, अभावोपरान्त भी बड़ी सुखी थी। इसके विपरीत अन्यायी राजा कंस के पास भौतिक सुख-सुविधाओं का अम्बार होते भी कृष्ण से मृत्यु होने के कारण वह मन ही मन बड़ा ही दुःखी रहता था। वर्तमान गांधी जेल में भी जहां सुखी थे वहीं वे असत्य व हिंसा से दुःखी थे।

दुःखी मनुष्य कल्पना की हवा देकर छोटे दुःख को भी बहुत बड़ा रूप दे देता है। वह स्वयं को संसार का सर्वाधिक दुःखी और अभागा समझने लगता है। पर, यह उसका निरा भ्रम होता है। उससे भी अधिक दुःखी और समस्याग्रस्त लोगों से संसार भरा पड़ा है। जैन मुनि राकेश ने एक नई दृष्टि देते हुए लिख है कि सुखी और दुःखी दोनों के लिए अपनी दृष्टि को विशाल बनाना जरूरी है। इससे जहां सुख का अभिमान मिट जाता है, वहां दुःख का भार और तनाव भी खत्म हो जाता है। सुख और दुःख की कोई सीमा नहीं होती है। ऐसी स्थिति में अपने को घोर दुःखी और अभागा समझना अज्ञान का परिचायक है। जैसे रोगी मनुष्य रोग से भी अधिक उसकी कल्पना और चिंता के भार से रोगी होता है, उसी प्रकार दुःखी व्यक्ति उलझनों और समस्याओं की पुनः पुनः स्मृति से अधिक दुःखी होता है।

सबको अपनी थाली खाली प्रतीत होती है तथा दूसरों की थाली में अधिक चिकनाहट का अनुभव होता है। कुछ लोग अपने परिवार के वातावरण से व्यर्थ ही असंतुष्ट और दुःखी प्रतीत होते हैं, पर जब वे उनकी अंतरंग स्थिति से परिचित होते हैं तो स्वयं के अज्ञान पर हंसने लगते हैं।

मानव का परम लक्ष्य सुख प्राप्ति होने पर उसे दूसरों का सुख अच्छा नहीं लगता है और वह दूसरे के सुख को अपने से अधिक मान कर उससे ईष्र्या करता है। इसी कारण उसका सुख ओस कण-सा उड़ जाता है। परिणामतः मानव सुख की चाह में परोक्ष रूप से दुःख को आमंत्रित करता है। मिलान कुंदेरा ने सटीक कहा है कि उस जीवन का कोई मतलब नहीं जो जीवन कैसा हो इसकी रिहर्सल बन कर रह जाए।

सुखी कौन है? इसका संक्षिप्त उत्तर है- ‘संतोषी महा सुखी, जब आए संतोष धन सब धन धूरि समान।’ ये कहावतें सुख वास्तविकता के बहुत समीप है। पंतजलि में कहा भी है कि संतोष से सर्वोत्तम सुख प्राप्त होता है। फिर भी यह सत्यता भाषाओं के साथ बदलती है। सुख क्या है? इसके उत्तर के लिए हमें अपने मन को टटोलना होगा, उसको समझना होगा। सामान्य व्यक्ति सुख की इच्छा करता है और यह उसका अधिकार भी है। पर व्यावहारिक रूप से सुख के लिए किए गए प्रयासों की परिणति दुःख में ही होती है। गेटे का एक मार्मिक कथन है कि यदि बात तुम्हारे हृदय से उत्पन्न नहीं हुई है तो तुम दूसरों के हृदय को कदापि प्रसन्न नहीं कर सकते।

सुखी होने के लिए मन को समझाना होगा। सुख हमारे मन में है और उसे पाने के लिए हमें अपने मन के आस-पास की इच्छाओं के जाल को उखाड़ फेंकना होगा। इच्छाओं के जाल को उखाड़े बिना हम सुखी नहीं हो सकते हैं। संक्षेप में सुखी होने के लिए हमें अपनी इच्छाओं को नियंत्रित करना होगा। स्वामी रामदास ने सुख का मार्ग सुझाया है कि अन्य व्यक्ति को तुम कम-से-कम एक मुस्कान तो दे ही सकते हो- प्रेम और आनंद से भरी मुस्कान। यह उसके मन पर लदा चिंताओं का बोझ हटा देगी।

जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं में दृष्टिभेद से बहुत बड़ा अंतर हो जाता है। आधा-आधा पानी का गिलास, एक के लिये गिलास आधा खाली है। दूसरे के लिये आधा भरा है। दोनों का तात्पर्य एक था पर जिसका दृष्टिकोण नकारात्मक था, उसका ध्यान अभाव की ओर गया तथा जिसका चिंतन सकारात्मक था उसका भाव की ओर गया। हमें सुखी होने के लिए छोटी-छोटी खुशियों यथा फूलों को खिलते देखना, सूर्य के उगते और अस्त होती लालिमा को देखकर सुखी होना आदि सीखना होगा क्योंकि पर्वत की चोटी पर चढ़ने से पहले हमंे हमारे घर की सीढि़यों पर चढ़ने का अभ्यास करना चाहिए। स्वामी रामतीर्थ ने कहा था-‘धरती को हिलाने के लिए धरती से बाहर खडे़ होने की आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता है- आत्मा की शक्ति को जानने-जगाने की।’ यही शक्ति आत्मबल है जो लौकिक एवं अलौकिक सफलताओं का आधार है। बुद्ध, ईसा, सुकरात, महावीर, गांधी आदि महापुरुषों ने इसी आत्मबल से अध्यात्म और चिंतन की दिशाएं बदल दीं। वास्तव में आत्मबल ही हमारी समस्त शारीरिक और मानसिक शक्तियों का आधार है और इसी से सुख की उत्पत्ति होता है। एक कहावत कही गई है।... दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोए जो सुख में सुमिरन करे तो दुःख काहे को होय..... जब व्यक्ति सुख वैभव यश मैं अपने को भूल जाता है यह भूल जाता है कि मैं एक इंसान हूं मेरे शरीर में भी जो गरीब लोग हैं कमजोर लोग हैं जो उनके शरीर में जो अंग हैं वही अंग सुख वालों के पास भी हैं, और यह भी पक्का है जो इस पृथ्वी में जन्म लिया उसका मृत्यु होना पक्का जब सब कुछ सत्य है फिर हम असद के पीछे क्यों इतना भाग रहे हैं किसके लिए धन दौलत यश वैभव पाने के लिए हम दूसरों को दुख पहुंचा रहे हैं उसका अंत जानते हुए भी अपनी आदतों को अपने अहंकार को कम करना नहीं चाहते, महा ज्ञानी रावण काल को पाटी में बांधकर सोता था, अंत उसका भी हुआ, जब व्यक्ति का जन्म हुआ है और सत्य मृत्यु है तो मृत्यु से भय करने की जरूरत नहीं जो लोग मदद से वह करते हैं क्या उनकी मृत्यु नहीं होगी सब समय से होगा जो ईश्वर ने बना रखा है चाहे वह बनाकर चाय समस्याओं का सामना करके निडर होकर जिस तरह आपको जीने की राह पर चल रहे वह आपके ऊपर निर्भर है जब कोई व्यक्ति बीमार हो जाता है घर में कोई व्यक्ति किसी दिक्कत में आ जाता है वह व्यक्ति कोई भी हो इस माया लौकी जीवन को कोई भी मरना नहीं चाहता क्या किसी के ना मरने से घबराने से भागने से क्या मृत्यु रुक जाएगी मृत्यु अपने समय पर ही आएगी सुख-दुख की तरह इसका भी एक समय निर्धारित होता है जो ईश्वर को इस जीवन मृत्यु का लेखा-जोखा सब ईश्वर के पास है। जब मृत्यु अंतिम सत्य है तो हमें उस मृत्यु से डर कर भागने की जरूरत नहीं , जब तक इस दुनिया में आए हैं और जब तक इस दुनिया में रहना है अपने फर्ज अपने विचार अपने परिवार समाज लोगों का साथ चलकर ईमानदारी के साथ हमें ईश्वर से करते हुए कोई भी गलत काम नहीं करना है। वहुतलोग धन दौलत कमा लेते हैं। पर उस धन दौलत को उनके जाने के बाद उनकी नालायक संताने किस तरह उस धन का दुरुपयोग करती हैं जो एक-एक पैसाएक एक कौड़ी को संचय करके पूरा स्ट्रक्चर पूरी सामाजिक दृष्टिकोण से अपनी छवि को बनाए रहते हैं उनके संता ने उसको किस तरह बर्बाद करती है यह भी देखा है।

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