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Saturday, October 3, 2020

सौंदर्य, भावुकता, प्रबंध विधान और अलंकार विधान आदि साधनावास्था के निमित्त प्रबंध काव्यसृजन के आधार स्तम्भ हैं

मूर्धन्य आलोचक शुक्ल/ देवेश त्रिपाठी

(जन्मदिन पर विशेष) 

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के जन्मदिवस निकटस्थ 4 अक्टूबर को होने से  आज फिर उनकी चर्चा एवं अवदान हिन्दी जगत के स्वास्थ्य के लिये बहुत जरूरी है।वे हिन्दी आलोचना में गुरुत्व का केंद्र रहे हैं।वे प्रथम बार हिन्दी आलोचना में व्यवस्थित शोध आधारित वैज्ञानिक एवं तार्किक दृष्टिकोण से समीक्षा के सैद्धान्तिक और व्यावहारिक मानदंड विकसित करते हैं। वे अपनी सैद्धान्तिक समीक्षा के मानदण्ड मनोविकार विषयक निबंधों की विवेचना के पश्चात 'कविता क्या है' में निर्धारित करते हैं।मनोविकार ही 'रस निष्पत्ति'का आधार होता हैं।वे कहते हैं कि जिस प्रकार आत्मा की मुक्तवास्था ज्ञानदशा कहलाती है उसी प्रकार हृदय की मुक्तावस्था 'रसदशा' कहलाती है। हृदय की इसी मुक्ति की साधना के लिये मनुष्य की वाणी जो विधान करती आयी है उसे कविता कहते हैं।वे भाव का साधारणीकरण स्वीकारते हैं।जब कोई भाव सभी मनुष्यों में लोक सामान्य की भावभूमि पर सर्वसुलभ होने लगे तब वह  साधारणीकृत हो जाता है।काव्य में बिम्ब की चर्चा पर मत है कि कवि काम कल्पना में बिम्ब या मूर्त भावना उपस्थित करना है।बिम्ब जब होगा तब किसी विशेष का होगा न कि सामान्य या जाति का।वे बिम्ब को साधारण चित्रात्मक वर्णन के साथ साथ अप्रस्तुत विधान के रूप में भी  स्थापित करते हैं।काव्य में 'बिम्ब स्थापन' को प्रमुख तत्व मानते हुए बताते हैं कि 'बिम्ब ग्रहण' श्रोता अर्थात पाठक का होता है जब कि 'बिम्ब स्थापन' कवि स्वयं करता है।घटनाओं का परस्पर संश्लिष्ट विवरण का बिम्ब स्थापन और बिम्ब ग्रहण, कवि कर्म को उत्कृष्ट बनाते हैं।उनके यहाँ ध्वन्यात्मकता अर्थात नाद सौंदर्य कविता की आयु के लिये अपरिहार्य तत्व बताया गया है।               

    




   इन सैद्धान्तिक मानदंडों के आधार पर 'गोस्वामी तुलसीदास' में तुलसीदास की,'जायसी ग्रन्थावली की भूमिका' में जायसी की ,'भ्रमरगीत सार की भूमिका' में सूरदास की व्यापक समीक्षा करते हुए आधुनिक काल में प्रवृत्त होते हैं। भारतेन्दु हरिश्चंद, द्विवेदी युगीन इतिवृतात्माक्ता, स्वछ्न्दतवाद, छायावाद साथ साथ प्रेमचंद आदि की विशद समीक्षा करते हैं। उनकी व्यावहारिक समीक्षा का सबसे लोकप्रिय मानदंड "काव्य में लोकमंगल की स्थापना"है। भक्तिकालीन कविता और कवि दृष्टि की समीक्षा की केंन्द्रीय कसौटी है।   इस कसौटी पर वे कविकर्म को कसते हैं।वे स्पष्ट स्थापित करते हैं कि मनुष्यता के व्यापक दायित्व पर आधारित धर्म रक्षार्थ संघर्षशील सौंदर्य के उदघाटन के कारण 'लोकमंगल' और 'आनन्द की साधनावस्था' का विधान व्यापक महत्व का होता है।इसके अलोक में वे तुलसी को लोकधर्म और लोकमंगल  की स्थापना का उत्कृष्ट कवि मानते हैं और 'रामचरित मानस'को श्रेष्ठ महाकाव्य की मान्यता देते हैं । समन्वय, मर्यादा,शील, सौंदर्य, भावुकता, प्रबंध विधान और अलंकार विधान आदि साधनावास्था के निमित्त प्रबंध काव्यसृजन के आधार स्तम्भ हैं। इस दृष्टि से तुलसीदास श्रेष्ठ प्रबंधकार हैं।ध्यातव्य है कि 'भावुकता' उनके यहाँ विचार नहीं मानदंड बनकर आती है जो प्रबन्धकार कवि के लिये अति आवश्यक है।तुलसी के यहाँ राम वनवास एवं चित्रकूट प्रवास के समय सभा के मार्मिक प्रसंगों के उदघाटन में भावुकता का सबसे अधिक पता  चलता है।वहाँ शील,शक्ति और सौंदर्य का विराट रूप राम में दिखायी पड़ता है।वे सूर को 'आनन्द की सिद्धावस्था' का कवि मानते हैं।मनुष्यता के माधुर्य सौंदर्य को कविता में व्यक्त करके सूर की परम्परा के कवियों ने इह्लौक के आकर्षण के साथ उत्साहपूर्ण जीवन जीने की राह दिखायी।सूरदास अपने परिस्थिति की आलोचना के बजाय माधुर्य और वात्सल्य भाव में मग्न रहने वाले कवि थे,जब कि तुलसीदास लोक की गति के सूक्ष्म पर्यालोचक थे।वे तुलसी को सर्वश्रेष्ठ कवि तो सूर को उत्कृष्ट कवि मानते हुए कहते हैं "प्रसंगोदभावन करने वाली प्रतिभा जो सूर में थी वो तुलसी में नहीं दिखती।"सूर ने जिस क्षेत्र को चुना उस पर उनका अपरिमित अधिकार था।सूरसागर किसी पहले से चली आ रही परम्परा, चाहे वह मौखिक ही रही हो, का पूर्ण विकास मालूम पड़ता है।तुलसी दास्य भक्ति और सूर सखा भक्ति को आधार बनाते है।दास्य भक्ति में प्रबंध समुचित है तो सखा भक्ति में मुक्तक सबसे उपयुक्त प्रतीत होता है।सूरदस ने एक एक राग को लेकर पद लिखा है।समीक्षक रामस्वरूप चतुर्वेदी इसी की विशद व्याख्या करते हुये कहते हैं कि गीत-काव्य शैली में ब्रजभाषा के माधुर्य पद गायन की परम्परा के चलते ही विभिन्न शास्त्रीय संगीत घरानों का विकास ब्रजभाषा क्षेत्र में दिखायी पड़ता है।           

           शुक्ल जी भ्रमरगीत प्रसंग में उद्धव- गोपी संवाद को केंद्र में रखकर शास्त्र पर लोक,ज्ञान पर भावुकता एवं सिद्धांत पर व्यवहार को वरीयता देते हैं।तुलसीदास के यहाँ जो स्थान भावुकता का है वही जायसी में प्रेम- पद्दति और घनीभूत वियोग का है।इसी कारण वे पद्मावत को उनका श्रेष्ठ प्रबंध काव्य मानते हैं।रतनसेन के  प्रेम और नागमती के विरह को सम्पूर्ण  हिन्दी साहित्य में दुर्लभ बताते हैं। इसी क्रम में जायसी और तुलसी की लोकभाषा अवधी का तुलनात्मक विवेचन करते हुए कहते हैं कि जायसी की भाषा बोलचाल के निकट स्वाभाविक मिठास वाली है जबकि तुलसी की अवधी भाषा में 'नाना पुराण निगम आगम' से युक्त संस्कृतनिष्ठ संस्कार प्रबल है।जायसी उनको इसलिए भी प्रिय हैं क्योंकि वे धर्म,सम्प्रदाय से ऊपर उठकर प्रेम को महत्व देते हैं।यहाँ उनकी धर्मनिरपेक्ष दृष्टि कितनी व्यापक है जबकि दूसरी परम्परा के आलोचकों द्वारा उनको सिरे से सम्प्रदायिक कहकर खारिज करने की दृष्टि कितनी एकांगी दिखती है।

आधुनिक युग की व्यवस्थित समीक्षा करते समय उन्हें पंत के'पल्लव'में छायावाद का उत्कृष्ट रूप दिखायी पड़ता है लाक्षणिकता(अप्रस्तुत विधान)और प्रकृति से सीधे प्रेम संबंध स्थापित करने के कारण पंत को छायावाद का प्रवर्तक एवं श्रेष्ठ कवि तथा परिपक्वता के कारण 'प्रसाद' को जेष्ठ कवि का दर्जा देते हैं।कामायनी में मधु,माधव,मादकता के अधिक प्रयोग के कारण प्रसाद को 'मधुमयी' प्रतिभा का धनी मानते हैं।उन्होने "मधुचर्या" नामक आलोचना बिम्ब उन्हीं के लिये गढ़ा था।द्विवेदीयुगीन इतिवृत्तात्मकता में प्रबंध विधान सरल था लेकिन छायारूप अप्रस्तुत में प्रबंध रचना एक विलक्षण कार्य है।'कामायनी' की सर्जना करके गीति काव्य शैली में प्रसाद ने इसे साकार किया।आरम्भिक छायावाद में गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर की परम्परा से आये 'ससीम से असीम की लालसा' में  उपजे रहस्यवादी प्रभाव को किंचित स्वीकार नहीं करते हैं।इसका प्रमुख कारण उनका यथार्थवादी होना है।   

                                                  उनकी प्रखर दृष्टि साहित्य के इतिहास लेखन में प्रकट होती है।साहित्य को 'जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब' कहकर इसे साहित्य के विकास क्रम में इतिहास लेखन का आधार बनाते हैं।इसका सर्वाधिक प्रभाव उनके वीरगाथा काल एवं भक्तिकाल के विकास सम्बन्धी मान्यताओं पर पड़ा।इस्लामी आक्रमण से उपजे तात्कालिक प्रभाव को निश्तेज हो चुके गर्व,गौरव और उत्साह को जगाने के लिए भक्ति आन्दोलन के उदय का आधार मानते हैं।शुक्लजी की ये स्थापना परवर्ती आलोचकों को अस्वीकार्य ही नहीं थी, बल्कि उससे घोर विरोध भी था।  हिन्दी साहित्य की जमीन पर वे ऐसे गुरुत्व का केंद्र हैं जहाँ एक बार नहीं बारंबार आलोचक उनके प्रभाव से आलोड़ित-विलोड़ित होते रहें हैं।वे ऐसे मील का पत्थर हैं जिससे टकराकर ही दूसरी, तीसरी और न जाने कितनी परम्पराओं के आलोचकों को साहित्य में टिकने का अवसर मिल सका।वे सौर मंडल के ऐसे सूर्य हैं जहाँ सभी परम्पराओं के ग्रह आलोचक अपने चारण उपग्रहों के साथ परिक्रमा करते रहे हैं और आज भी कर रहे हैं।हिन्दी आलोचना में शुक्ल जी ऐसे आलोचक हैं जिनकी उपस्थिति ही बाकी सबको शुक्लोत्तर करती चलती है।

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