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Thursday, October 22, 2020

विजयादशमी 25 अक्टूबर एवं विजय मुर्हूत

आश्विन शुक्ल दशमी को विजयादशमी या दशहरें के रूप में पर्व मनाया जाता है। श्री राम का लंका विजय तथा मां दुर्गा का महिषासुर मर्दिनी अवतार दशमी को हुआ था, इसलिए इसे विजयादशमी भी कहा जाता है।यह त्यौहार बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। इस दिन स्वयं सिद्ध अबूझ मुर्हूत होता है कोई भी नया काम प्रारम्रभ करना शुभ होता है। इस दिन रावण मेघनाद व कुंभकर्ण के पुतले जलाने की परम्परा है। इस दिन संध्या के समय के पुतलों का दहन किया जाता है।  नीलकंठ पक्षी का दर्शन बहुत शुभ माना जाता है। ये क्षत्रियों का बहुत बड़ा पर्व है। इस दिन अस्त्र- शस्त्र पूजन का विधान है। मां दुर्गा  भगवान राम की पूजा , अपराजिता पूजन, विजय-प्रयाण , और शमी पूजन आदि कर्म इस पर्व पर किये जाते है। अपरान्ह बेला में ईशान दिशा में अपराजिता देवी के साथ


जया और विजयादेवी का पूजन किया जाता है। शमी वृक्ष के पूजन का भी विधान है। एक कथानुसार- महाभारत काल में अर्जुन ने अज्ञातवास के समय अपना धनुष एक शमी वृक्ष पर रखा था और वृहन्लता के वेश में राजा विराट के यहाँ नौकरी कर ली थी। और उसके उपरान्त अर्जुन ने शमी वृक्ष से अपने हथियार उठाकर शत्रुओं पर विजय प्राप्त की थी। भगवान रामचन्द्र जी द्वारा लंका पर चढ़ाई के समय शमी वृक्ष ने रामचन्द्रजी की विजय का उद्घोष किया था इसीलिए विजय काल मे शमी का पूजन किया जाता है। दशमी तिथि का मान 25 अक्टूबर को दिन  11ः14 से 26 अक्टूबर को दिन 11ः33 तक है और विजय मुहूर्त 25 अक्टूबर को दिन 01ः43 से 02ः28 तक है।  अपरान्ह मुर्हूत दिन में 12ः58 से 03ः13 तक अपराजिता देवी का पूजन, शमी वृक्ष पूजन और सीमा उल्लंघन कर्म करना शुभ होगा।

-ज्योतिषाचार्य-एस.एस.नागपाल, स्वास्तिक ज्योतिष केन्द्र, अलीगंज, लखनऊ

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