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Saturday, September 5, 2020

गुरु कौन?

(शिक्षक दिवस पर विशेष आलेख - कमलेश कमल)

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भारतीय-संस्कृति आरंभ से ही गुरुपूजक रही है। आज शिक्षक दिवस है,  गुरु-दिवस नहीं!

गुरु और शिक्षक में अंतर है। गुरु ज्ञान देता है, शिक्षक शिक्षण करता है। गुरु-शिष्य की एक परंपरा है, जिसमे गुरु के पीछे जुड़कर शून्य या नगण्य (अ) भी विशिष्ट हो जाता है - गुरु +अ =  गौरव । 

शिक्षक तो शिक्षा के निमित्त (अर्थ) आए हर शिक्षार्थी के लिए शिक्षण का कार्य करता है। 5 सितंबर राष्ट्र निर्माण में उन सभी शिक्षकों के महनीय योगदान को रेखांकित करने वाला दिन है।

गुरु से यह अपेक्षा रहती है वह शिक्षा ग्रहण करने आए शिक्षार्थी (छात्र) को शिष्य बना दे । छात्र होना तो एक अवस्था है। छात्र तो वह है जो गुरु के सान्निध्य में रहता है - छात्र का अर्थ ही है : वह जो गुरु पर छत्र (छाता) लगाकर उसके पीछे चलता है । गुरुकुल में गुरु के पीछे उनके छात्र छत्र उठा कर चलते थे । शिष्य होना एक गुण है जिसे शिष्यत्व कहते हैं । शिष्य का अर्थ है जो सीखने को राजी हुआ, जो झुकने को तैयार हो जिससे उसका जीवन उत्कर्ष की ओर जाए।

गुरु और शिष्य एक परंपरा बनाते हैं। उनमें सिर्फ शाब्दिक ज्ञान का ही आदान-प्रदान नहीं होता। गुरु तो शिष्य के संरक्षक के रूप में कार्य करता है। वह ज्ञान प्रदाता होता है, अपना ज्ञान शिष्य को देता है जो कालांतर में पुनः यही ज्ञान अपने शिष्यों को देता है। यही गुरु-शिष्य-परंपरा है या परम्पराप्राप्तमयोग है। 

शिक्षक और छात्र एक परंपरा नहीं बनाते ! शिक्षक तो अधिगम( learning) को सरल बनाता है, इसलिए इंग्लिश में उसे fecilitator of learning है ।विद्यालय जाकर विद्या की आकांक्षा रखने वाला विद्यार्थी (विद्या +अर्थी) छात्र भी हो जाता है,  जबकि बिना गहन विनम्रता के शिष्य नहीं होता, शिष्यत्व घटित ही नहीं हो सकता ।

यह सच है कि गुरु कोई व्यक्ति नहीं पद है। गुरु वह है जिसके पीछे अगर ‘अ’( शून्य, रिक्त, अभाव, नहीं,आदि) भी लग जाए तो गौरव हो जाता है।( गुरु+अ = गौरव)

लेकिन इसके लिए शून्यता के बोध से गुरु के पीछे चलना पड़ता है ,आगे नहीं ।
अगर गुरु के आगे लगने की कोशिश की तो अगुरु हो जाएगा, आकर्षण शून्य हो जाएगा, वजन नहीं रह जाएगा । 

तो, हिंदी भाषा यह भी सिखाती है कि हमें गुरु के पीछे चलना चाहिए। अगर एक और व्युत्पत्ति ‘ग्र’ ध्वनि से गुरु को देखें तो भी यही अर्थ आता है। ग्र ध्वनि से ही गुरु बनता है, ग्रह, ग्रहण बनता है । इन सबमें खींचने या आकृष्ट करने का भाव स्पष्ट है।  

तो, गुरु अपनी ओर खींचता भी है। हाँ, उसके गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में जाना तो शिष्य को ही पड़ेगा, तभी गुरु अपना काम करेंगे । लेकिन ऐसा भी सब नहीं कर सकते क्योंकि अज्ञानता का बोध होने के लिए ज्ञान की कुछ सीढ़ी चढ़ना जरूरी है। जो, इसको उपलब्ध नहीं होते, उन्हें गुरु की प्यास ही नहीं होती ।

वैसे, भारतीय संस्कृति में गुरु पूर्णिमा की महिमा ज्यादा है, लेकिन उसकी प्रवृत्ति भिन्न है। गुरु पूर्णिमा ज्यादा प्रतीकात्मक है। आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा मनाने के पीछे कारण यह है कि आषाढ़ पूर्णिमा के दिन अमूमन आकाश में घने बादल छाए रहते हैं । प्रतीकात्मक रूप से इन अंधियारे बादलों को शिष्य और पूर्णिमा के चाँद को गुरु माना गया है। अगर सिर्फ चाँद को देखना होता तो, शरद पूर्णिमा को चुना जाता लेकिन गुरु की महिमा तो शिष्यों के कल्याण से ही है।

आशा की जाती है कि जैसे चाँद के प्रकाश से अंधियारे बादलों में भी प्रकाश प्रकीर्तित, परावर्तित होता हैं, वैसे ही हमारे जीवन में भी गुरु की ज्ञान-रश्मियाँ फैले। यह अलग बात है कि इसी दिन वेद व्यास जी का भी जन्मदिन बताया जाता है। 

विश्व शिक्षक दिवस (जो कि 5 अक्टूबर को मनाया जाता है ) की तर्ज़ पर अपने यहाँ 5 सितंबर को राष्ट्रीय शिक्षक दिवस मनाया जाता है। डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन सच ही एक महान् शिक्षक थे, जिनके जन्म दिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। 

शिक्षक-दिवस पर सभी शिक्षकों, गुरुओं को नमन! श्री गुरुवे नमः!

आपका ही,
कमल

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