हिन्दी दिवस : आडम्बर बनाम प्रासंगिकता - Amja Bharat

Amja Bharat

All Media and Journalist Association

Breaking

Post Top Ad

Responsive Ads Here

Wednesday, September 16, 2020

हिन्दी दिवस : आडम्बर बनाम प्रासंगिकता

(कमलेश कमल )

*********

14 सितंबर यानी हिन्दी दिवस। हिन्दी के लिए समर्पित एक 'विशेष' दिन। दूसरे शब्दों में कहें तो राजभाषा (या कथित, वांछित राष्ट्रभाषा) के लिए अपने कर्तव्यों की इतिश्री करने का आडम्बरी दिन। वर्ष के 364 दिन चाहे अंग्रेजी मिश्रित वर्णसंकर हिन्दी बोलिए, इस एक दिन हिन्दी प्रेम का सार्वजनिक प्रदर्शन कीजिए। अपने अंग्रेजी माध्यम में पढ़ रहे बच्चे को हिन्दी दिवस पर स्पीच (भाषण नहीं) और डिबेट (वाद-विवाद नहीं) तैयार करवाइए। अगर सरकारी कर्मचारी हैं, तो कार्यालय में हिन्दी के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए कोई-न-कोई आयोजन अवश्य कीजिए।

1 सिंतबर से हिन्दी पखवाड़ा की जो कागज़ी चर्चा थी, उसे आज मूर्त रूप देकर फ़ोटो खिंचवाइए। पूरा वातावरण ऐसा लगता है मानो या तो हिन्दी विलुप्त होने की कगार पर पहुँची कोई भाषा है जिसके संरक्षण के लिए एक सरकारी दिन बाँट दिया गया है, या फ़िर यह अपनी मातृभाषा नहीं, कोई विदेशी भाषा है जिसे सीखने-समझने की सरकारी आवश्यकता है। "अरे मिश्रा जी, नोटिंग शीट हिंदी में प्रिपेयर होगा भाई, हिंदी पखवाड़ा चल रहा है"- कुछ इस तरह के हिन्दीमय माहौल में हिन्दी पखवाड़ा हर वर्ष की भाँति एक और वर्ष मनाया चला जाता है। अनुपालना रिपोर्ट उच्च कार्यालय के अवलोकनार्थ अग्रेषित कर दी जाती है और पूरा कार्यालय उसी वर्णसंकर भाषा में गपशप करते समोसे-जलेबी के साथ हिन्दी की आत्मा का तर्पण करते अगले साल तक के लिए निश्चिंत हो जाता है।

शायद हिन्दी के सुप्रसिद्ध रचनाकार श्री शैलेश मटियानी ने हिन्दी दिवस की इस विद्रूप स्थिति को देखकर ही इसे शर्मनाक पाखंड करार दिया था। उन्होंने माकूल प्रश्न किया था- "हम हिन्दी दिवस क्यों मनाते हैं? राष्ट्रभाषा या राजभाषा दिवस क्यों नहीं मनाते??"

अब तक हम 67 हिन्दी दिवस मना चुके (14 सितंबर 1953 से) और वर्ष 2020 का हिन्दी दिवस 68वां है। हर कोई जानता है कि इन आयोजनों का हासिल कमोबेश सिफर ही रहा है। हिन्दी बढ़ी है और बढ़ रही है, लेकिन इन आयोजनों के कारण नहीं, लोकव्यवहार के कारण, बाज़ार और व्यापार के कारण बढ़ रही है। सरकार और सत्ता ने कोई इच्छाशक्ति नहीं दिखाई है, हालाँकि खानापूर्ति ख़ूब हुई है।

मातृभाषा के आधार पर हिन्दी दुनिया में आधिकारिक रूप से चौथे (अंग्रेजी, स्पेनिश और मंडारिन के बाद) लेकिन प्रयोक्ता (मैथिली, बोडो, संथाली आदि मातृभाषा के रूप में लिखाने वाले भी हिन्दी बोलते हैं) के आधार पर दूसरे स्थान पर है। स्वतंत्रता आन्दोलन के समय इसने राष्ट्रभाषा के दायित्वों को निर्वहन किया और 1918 के हिन्दी साहित्य सम्मेलन में महात्मा गांधी ने इसे जनभाषा कहते हुए राष्ट्रभाषा बनाने की बात की। स्वतंत्रता मिलते ही गांधी जी ने यह उद्घोष भी किया- "दुनिया से कह दो कि गांधी अंग्रेजी भूल गया है।" काका कलेलकर, मैथिलीशरण गुप्त, हजारी प्रसाद द्विवेदी आदि महापुरुषों के पुरुषार्थ से ऐसा लग रहा था कि हिन्दी ही भारत की राष्ट्रभाषा बनेगी, लेकिन हिन्दी सत्ताधारियों में इच्छशक्ति के अभाव से इस आधिकारिक विशेषण से वंचित रह गई।

संविधान सभा ने हिन्दी के लिए सोचा और भाग 17 के अनुच्छेद 343(1) में देवनागरी में लिखित हिन्दी को भारत की राजभाषा (official language) बनाया। एक बहुभाषा-भाषी राष्ट्र की व्यावहारिक समस्याओं को देखते हुए 343(2) के अन्तर्गत यह व्यवस्था हुई कि 15 वर्ष तक अर्थात् 1965 तक संघ के कामकाज के लिए पूर्व की भाँति अंग्रेजी का भी प्रयोग होता रहेगा। इसका उद्देश्य था कि इन 15 वर्षों में हिन्दी नहीं जानने वाले हिन्दी सीख जाएँगे। इतना ही नहीं, अनुच्छेद 344 के अन्तर्गत यह प्रावधान किया गया कि संविधान के लागू होने के 5 वर्ष और उसके बाद 10 वर्ष राष्ट्रपति एक आयोग बनाएँगे जो हिन्दी के उत्तरोत्तर प्रयोग के बारे में तथा अंग्रेजी के प्रयोग को रोकने के लिए सिफारिश करेगा। यह एक अच्छा प्रावधान था और इस आयोग की सिफारिशों पर विचार करने के लिए 344(4) के अन्तर्गत 30 संसद सदस्यों की 1 समिति भी गठित की गई। 

संविधान सभा की मंशा अच्छी थी, तभी उन्होंने हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए संघर्ष करने वाले जबलपुर के हिन्दी प्रेमी व्यौहार राजेन्द्र सिंह के 50 वें जन्मदिन पर (14 सितंबर 1949) हिन्दी को भारत की राजभाषा बनाने का निर्णय लिया। इसकी सूचना भी जबलपुर के सांसद सेठ गोविन्ददास द्वारा व्यौहार राजेन्द्र सिंह को जन्मदिन के तोहफ़े के रूप में दिया गया। ये वही महान् हिन्दीप्रेमी थे जिन्होंने अमेरिका के सर्वधर्म सम्मेलन में प्रतिभाग करते हुए हिन्दी में भाषण देकर ख़ूब ख्याति अर्जित की थी, हालाँकि वे अंग्रेजी सहित कई भाषाओं के विद्वान् थे।

आगे राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा की अनुशंसा पर 14 सितंबर,1953 को इसे हिन्दी दिवस के रूप में मनाया गया। इस प्रकार एक हिन्दी प्रेमी व्यौहार राजेन्द्र सिंह का जन्मदिन हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। 

संवैधानिक प्रावधानों से और हिन्दी दिवस के आयोजनों से हिन्दी का भला नहीं होना था, नहीं हुआ। हिन्दी का हित राजनीतिक इच्छा शक्ति की बली चढ़ गया। इसके लिए भी संविधान का ही सहारा लिया गया। दरअसल अनुच्छेद 343 (3) में यह उपबन्ध किया गया था कि 1965 के बाद भी संसद सरकारी कामकाज के लिए अंग्रेजी का प्रयोग ज़ारी रखने के लिए व्यवस्था कर सकती है। संविधान सभा ने इसे भविष्य की आवश्यकताओं के मद्देनजर एक उपाय की तरह रखा था, जिसे हिन्दी राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी ने हिन्दी को उसका हक़ नहीं देने का उपाय बना दिया। फ़िर क्या था, आगे 1967 में भाषा संशोधन विधेयक लाकर अंग्रेजी को अनिवार्य कर दिया गया और संविधान सभा द्वारा किए गए सभी उपबन्ध बस 343(3) की बली चढ़ गए।


सामान्यतः हर स्वतंत्र देश की एक राष्ट्रभाषा होती है, लेकिन भारत की कोई आधिकारिक राष्ट्रभाषा नहीं है। राजभाषा का पद भी इसे अंग्रेजी के साथ साझा करना पड़ रहा है। हर वर्ष के आयोजनों के क्रम में यह विचार खो जाता है कि हिन्दी दिवस हिन्दी की स्थिति है,  प्राप्य नहीं। राजभाषा से आगे बढ़कर राष्ट्रभाषा की आसंदी पर आसीन होकर ही हिन्दी वह पा सकेगी, जिसकी वह हक़दार है।

No comments:

Post a Comment

Post Bottom Ad

Pages