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Thursday, September 10, 2020

‘रामायण मेला विकास यात्रा में बोस का योगदान सदैव स्मरणीय’

बैठक कर किया याद

चित्रकूट, सुखेन्द्र अग्रहरी । वयोवृद्ध ख्यातिलब्ध समाजवादी नेता जमुना प्रसाद बोस के निधन का समाचार जैसे ही मिला समूचे बांदा व चित्रकूट जनपद में शोक छा गया। राष्ट्रीय रामायण मेला के पदाधिकारी सहित सभी लोग स्तब्ध है। रामायण मेला परिवार के सभी सदस्य एवं शुभचिंतक, मेले के संरक्षक एवं मार्गदर्शक के आकस्मिक गोलोक सिधारने के समाचार से भारी सदमे में है। 

रामायण मेला के कार्यकारी अध्यक्ष राजेश करवरिया ने गुरुवार को अपरान्ह 11 बजे कार्यकारिणी सहित सम्मानित नागरिको, संभ्रांतो की बैठक आहूत की। बैठक में प्रमुख रूप से पूर्व सांसद भैरों प्रसाद मिश्र, ख्यातिलब्ध साहित्यकार एवं चिंतक डा चन्द्रिका प्रसाद दीक्षित, महामंत्री करुणाशंकर द्विवेदी, कोषाध्यक्ष शिवमंगल प्रसाद मिश्र, ख्यातिलब्ध समाजसेवी प्रद्युम्न कुमार दुबे उर्फ लालू, राजाबाबू पाण्डेय, मो यूसुफ, राजेन्द्र मोहन त्रिपाठी, मनोज मोहन गर्ग, कलीमुद्दीन बेग आदि कार्यकारिणी के सदस्यों सहित अनेक गणमान्य लोगों ने भागीदारी की। मेले के महामंत्री करुणाशंकर द्विवेदी ने स्व जमुना प्रसाद बोस के व्यक्तित्व, कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि रामायण मेला अपने सिद्धातों, उद्देश्यों व गुणवत्ता के चलते देश-विदेश में विशिष्ट पहचान बनाए है। मेले की


परिकल्पना को समाज के समक्ष लाने वालों में से बोस जी एक कर्मठ सहयोगी एवं सूत्रधार थे। उन्होंने कहा कि रामायण मेला आयोजन की घोषणा से लेकर योजना का प्रारूप तैयार करने के उद्देश्य से डा लोहिया ने देश के ख्यातिलब्ध महापुरुषों के साथ अनेक बार चित्रकूट में गोष्ठियां की थी। प्रत्येक बैठक में जमुना प्रसाद बोस की सहभागिता प्रमुख रही है। उन्होंने बताया कि पहली गोष्ठी 24 अक्टूबर 1960 को कलकत्ता वाले धर्मशाला चित्रकूट में हुई थी। जिसमें क्षेत्रीय प्रतिनिधि के रूप में जगदीश प्रसाद करवरिया, आचार्य बाबूलाल गर्ग ने भी भागीदारी की थी। दूसरी बैठक उक्त स्थल में ही 30 नवम्बर 1960 को हुई। जिसमें जमुना प्रसाद बोस ने भागीदारी की थी। बैठक में मेले की संपर्क समिति का गठन किया गया। जिसके एक सदस्य बोस जी भी बनाए गए थे। बताया गया कि संपर्क समिति से अपेक्षा की गई कि वह दिल्ली स्थित विदेशी राजदूतावासों, केन्द्रीय मंत्रियों से संपर्क कर रामायण मेला के लिए सहयोग प्राप्त करें। रामायण वृत्त देशों के सांस्कृतिक संगठनों से भी श्री बोस जी ने संपर्क कर उन्हें मेले में भागीदारी करने के लिए बुलाया। जिसे उन्होंने पूरी योग्यता और क्षमता से पूरा किया। 25-26 फरवरी 1961 को कानपुर की एक बैठक में आचार्य गर्ग एवं जगदीश प्रसाद करवरिया के साथ भी बोस जी ने भाग लिया। मेले की योजना को गतिमान करने में योगदान किया। रामायण मेला के विकास यात्रा में श्री बोस जी का योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा। देश के विभिन्न प्रांतों के मुख्यमंत्री, केन्द्रीय मंत्री, देशभर के रामकथा मर्मज्ञ, चिद्वानो, प्रख्यात कलाकारों, सांस्कृतिक दलों के समक्ष बोस जी ने क्रांतिकारी वक्तव्य दिया। तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई तथा कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रही हिन्दी कविता की मंदाकिनी सुश्री महादेवी वर्मा ने भी बोस जी की तारीफ की थी। मेले के महामंत्री करुणाशंकर ने बताया कि 90 वर्ष की उम्र पार करने के बावजूद बोस जी में उत्साह की कमी नहीं थी। प्रतिवर्ष संपन्न होने वाले रामायण मेले के आयोजन में समूचे दिनो तक बोस जी का आर्शीवाद सभी को देते थे। बोस जी जीवन पर्यन्त रामायण मेले के संरक्षक के रूप में महत्वपूर्ण योगदान देते रहे। 

रामायण मेले के अध्यक्ष राजेश करवरिया ने श्री बोस जी का स्मरण करते हुए बताया कि वे जहां रामायण मेला के शुभचिंतक एवं मार्गदर्शक थे, वहीं पारिवारिक सदस्य के रूप में हितचिंतक भी थे। रामायण मेले के तत्कालीन कार्यकारी अध्यक्ष एवं उसे संस्थागत स्वरूप देने में एक कर्मयोगी की भांति जीवन अर्पित करने वाले गोलोकवासी गोपालकृष्ण करवरिया ने भी श्री बोस जी के कार्यों से प्रभावित होकर उन्हें बुन्देलखण्ड का गांधी होने की उपाधि से सम्मानित किया था। उन्होंने बताया कि स्व बोस दो बार उप्र सरकार में कैबिनेट मंत्री रह चुके थे। उन्होंने राजनीति में अहम योगदान दिया। 


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