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Wednesday, September 23, 2020

रोजगार परक है केचुआ उत्पादक प्रशिक्षण: कुलपति

कुलपति ने किया 30 दिवसीय केचुआ उत्पादक प्रशिक्षण का उद्घाटन 

बांदा, के एस दुबे । बुन्देलखण्ड परिक्षेत्र में आने वाले समय मे जैविक खेती का महत्व बढे़गा। यहां की परिस्थितियां एवं उपलब्ध संसाधन से जैविक खेती करना सुगम होगा। जैविक खेती में प्रमुख रूप से केचुआ खाद, कम्पोस्ट, गोबर की खाद, नीम उत्पाद, इत्यादि का उपयोग ज्यादा होता है। ऐसे मे यहां के युवा व कृृषक सीमित संसाधनों मे कम बजट मे केचुआ खाद उत्पादन कर के अच्छा मुनाफा कमा सकते है। वैज्ञानिक ढंग से केचुआ खाद व केचुआ उत्पादित करना समय की मांग है। जिसके लिये यह प्रशीक्षण बहुत लाभकारी होगा। 

केचुआ उत्पादक प्रशिक्षण का उद्घाटन करते कुलपति यूएस गौतम

यह बातें कृषि विश्वद्यिालय के कुलपति डा. यूएस गौतम ने कृषि प्रसार विभाग व एनआरएम विभाग द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित तथा मिशन एकीकृत औद्यानिक विकास योजना, सुपारी व मशाला विकास निदेशालय, कोचिकोड, केरल द्वारा वित्त पोषित तथा एग्रीकल्चर स्क्लि काउंसिल आफ इण्डिया द्वारा प्रमाणित 30 दिवसीय केचुआ उत्पादक प्रशिक्षण कार्यक्रम के उद्घाटन अवसर पर बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे। डा. गौतम ने प्रशीक्षण आयोजित करने के लिये एम.आई.डी.एच. परियोजना के प्रधान अन्वेंषण एवं कृषि प्रसार विभाग के विभागााध्यक्ष डा. भानु प्रकाश मिश्रा तथा पूरी टीम को बधाई दी। डा. गौतम ने अपने व्यक्तव्य मे कहा कि कृषि विश्वविद्यालय, बांदा के वैज्ञानिको द्वारा बुन्देलखण्ड मे जैविक कारीडोर कार्यक्रम की शुरूवात वर्ष 2019 से की है। जिसमे सभी कृषि विज्ञान केन्द्रो के माध्यम से जैविक खेती को बढावा देने हेतु तथा उसमे रोजगार सृजन हेतु विभिन्न कार्यक्रम आयेाजित किये जा रहे है। इस कार्यक्रम से एक तरफ जहां केचुआ उत्पादको मार्केट प्राप्त होगा वहीं
मौजूद लोग

दूसरी तरफ कृषक अपने जैविक उत्पाद का अच्छा मूल्य प्राप्त करेगा। कार्यक्रम मे परियोजना के प्रधान अन्वेंषण एवं कृषि प्रसार विभाग के विभागााध्यक्ष डा. भानु प्रकाश मिश्रा ने मिशन एकीक्रत औद्यानिक विकास योजना, सुपारी व मशाला विकास निदेशालय, कोचिकोड, केरल द्वारा चलाये जा रहे परियोजना एवं विभिन्न कार्यक्रमो के बारे मे विस्तार से बताया। डा. मिश्रा ने बताया कि इसके अन्तर्गत बुन्देखलण्ड मसाला वर्गीय फसलों जैसे धनिया, मिर्च, हल्दी, अदरक, मेथी, तथा सुगंधित व औषधीय फसलो ंमे तुलसी, लेमन ग्रास, सिट्रोनेला, फसल पर वैज्ञानिक जानकारी के साथ-साथ प्रशीक्षण, प्रदर्शन तथा विभिन्न प्रकाशन वितरित किये जा रहे है। प्रशिक्षण कार्यक्रम के मुख्य प्रशीक्षक तथा सहायक प्राध्यापक डा. अरबिन्द कुमार गुप्ता ने बताया कि कुल 25 प्रशीक्षणार्थी 30 दिनो मे प्रायोगिक एवं व्यवहारिक जानकारी प्राप्त करेगेें। प्रशीक्षणार्थियों को केचुआ खाद उत्पादन हेतु विभिन्न पहुलओ पर विस्तार से जानकारी दी जायेगी। डा. गुप्ता ने बताया कि प्रशीक्षणार्थियो को व्यवसायिक रूप से अपनाने के लिये उनके गांव पर विश्वविद्यालय की तरफ से एक इकाई की स्थापना भी की जायेगी। इस अवसर पर निदेशक बीज प्रक्षेत्र डा. मुकुल कुमार ने बताया कि कम लागत मे एवं कृषि अवषेशो मे केचुआ खाद बनाकर अतिरिक्त लाभ अर्जित किया जा सकता हैं। डा. मुकुल ने उपस्थित सभी का स्वागत किया। कार्यक्रम का संचालन कर रहे सहायक प्राध्यापक व परियोजना के सह प्रधान अन्वेंषण डा. बी.के. गुप्ता ने बताया कि इसके लिये बहुत छोटे से स्थान मे तथा कम लागत मे घर के किसी भी सदस्य द्वारा केचुआ खाद उत्पादन किया जा सकता है। मसालो की खेती से परम्परिक खेती हटकर अलग लाभ ले सकते है। कार्यक्रम मे प्रो. एस.वी. दिवेदी, डा. संजीव कुमार, डा. नरेन्द्र सिंह, डा. जगन्नाथ पाठक, डा. आर.के. सिंह, डा. देव कुमार, डा. चन्द्रकांत तिवारी, डा. दिनेश गुप्ता, डा. अमित मिश्रा, डा. धीरज मिश्रा व अन्य लोग उपस्थित रहे। 


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