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Wednesday, September 30, 2020

अन्याय किसी प्रकार का हो अंत पक्का है,..............

देवेश प्रताप सिंह राठौर 

(वरिष्ठ पत्रकार)


........ मैं आपको एक सच्ची घटना  बताना चाहता हूं। यह बात 2009 की है मैं उस समय में नौकरी नहीं कोई करता था पत्रकार के रूप में मेरी एक पहचान थी जनपद उन्नाव में। उत्तर प्रदेश लेवल के कांग्रेस पार्टी के नेता और हमारे निकट संबंधी  जनपद उन्नाव में ही रहते हैं एक बार कांग्रेस के जिला अध्यक्ष हुए आई सी आई सी आई सी के मेंबर रहे रेलवे बोर्ड के सदस्य रहे बहुत अच्छे-अच्छे पद उनके पास रहे उनके साथ में कानपुर एक लेदर फैक्ट्री में गया क्योंकि वह जो कांग्रेस के नेता मेरे जो निकट संबंधित है उनका एक पेपर चलता है। उस पेपर में विज्ञापन का कुछ पैसा लेना था उस फैक्ट्री से तो उनके साथ में और वह और उनके सहयोगी लोग दो गाड़ियों से गए हैं मैं नेताजी के बगल में बैठा हुआ था बातें हो रही थी उसी समय बातों बातों में उस फैक्ट्री का नाम नहीं लूंगा कानपुर के फूलबाग में फैक्ट्री का हेड ऑफिस आ गया। उस ऑफिस में जब हम लोग पहुंचे गेट पर अर्दली बैठा हुआ था। उन्होंने कहा जाओ बताओ उन्नाव से इस नाम के व्यक्ति आए हैं उसने बताया और तुरंत हम लोग अंदर चले गए उस अर्दली से


बेल बजाई तो और तुरंतआया और जा कर पानी लाया हम लोगों ने पिया उसके बाद उन्होंने नाश्ता पानी की है कराई नाश्ता लाते समय थोड़ा सा की हड़बड़ाहट में जब आदमी गरीब कमजोर होता है तो बड़े लोगों के मालिक के पास पहुंचता है तो कापता है,जो मालिक आए दिन जो गाली देता हो    इस कारण और भी डर बना रहता है। उस इंसान के वह व्यक्ति बहुत ही सहैमा हुआ था और उसकी एक प्लेट गिर गई उस फैक्ट्री लेदर के साथ ने इतनी तेज उसे डांटा और जो अपशब्द बोले मैं वह सब भूल नहीं सकता हूं। वह चला गया, दूसरा व्यक्ति आकर नाश्ता पानी लगाया हम लोग आधे घंटे बाद जब निकले बाहर स्टूल में बैठा रो रहा था मेरे से नहीं रहा गया उम्र करीब उसकी 55 या60  वर्ष की थी, नेता जी ने भी देखा और नेता जी मैं दोनों पुनः उस चेंबर में फैक्ट्री मालिक के पास गए और नेता जी ने कहा इस तरह ना किया करो थोड़ा सा संयम रखा करें  मैंने उस अर्दली चपरासी गेट कीपर से कहा भाई क्यों रोते हो उसने कहा भाई  साहब हर रोज होता है। इस उमर में कहां जाएं परिवार पालने के लिए गालियां शहर है ,क्या करें मजबूर हैं दो बेटियां हैं बेटे हैं जिम्मेदारी है रोजी की के कारण गालियां सुन रहे हैं।  नेताजी भी हमारे साथ थे हम भी थे तो नेता जी ने बड़ा अफसोस जताया और मैंने भी उसकी दशा को देखकर मन में पीड़ा हुई। जब यह हालात देखें जब मैंने और संस्थाओं पर नजर डाली तब मुझे लगा अन्याय हर जगह है अन्याय हर जगह है । मैंने उस गेटकीपर से कहा रो नहीं अन्याय का अंत होता है और वह आज फैक्ट्री 4 या5 फैक्ट्री उन्नाव में है 3 या4 कानपुर में है 2या3 आगरा में है उन्नाव की फैक्ट्रियां बंद हो गई है और बंद की कगार पर है यह होता है अन्याय के करने वाले व्यक्ति जब अपना पद विक्रमा के अनुसार न्याय नहीं करते हैं । छोटे छोटे कर्मचारियों को दूधकारते हैं,  तो उनकी जो पीड़ा निकलती है और ईश्वर या अल्लाह के पास सीधा सच्चा करती है और कंपनियों या संस्थाओं परिवार  की बर्बादी की उल्टी गिनती शुरू हो जाती है। क्योंकि काला कानून अंग्रेजों का नहीं चला था अगर कोई संस्थान काला कानून चलाती है लकीर के फकीर पर चलती है उसका अंत सुनिश्चित है फिर भी लोग नहीं सुधर रहे हैं आज बहुत सी दिक्कतें आ रही हैं देश में संस्थाओं में जिसका मुख्य कारण अहंकार शब्दों में विराम नहीं अन्याय की बात को माना जाना सच्चे ईमानदार सत्य के पथ पर चलने वाला व्यक्ति हमेशा परेशान रहा है और आज भी रहता है। लेकिन जिसके खून में ही सत्य लिखा है सही लिखा है वह अपना नेचर बदल नहीं सकता चाहे जो भी नुकसान हो जाए औसत ईमानदारी के पद पर अडिग रहेगा परेशानी चाहे जितनी है उसे चलेगा परंतु जो लोग बेईमान होते हैं चापलूस होते हैं सिर्फ अधिकारी के आगे पीछे चक्कर काटते हैं उनके वफादार का रूप धारण कर लेते हैं सबसे घातक यही लोग होते हैं यह समय जब खराब आता है तब पता चलता है सबसे पहले संस्था छोड़ने वाले वही होते हैं जिनको प्रबंध तंत्र सबसे ज्यादा तवज्जो देते थे और जो लोग सही थे अन्याय के कारण करे थे वह बाद में काम आते लेकिन तब तक बहुत कुछ खत्म हो चुका होता है।

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