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Saturday, September 12, 2020

घमंड एक दीमक है

देवेश प्रताप सिंह राठौर 

(वरिष्ठ पत्रकार)


........अहंकार अथवा घमंड को हम कोई अन्य नाम देना चाहे तो इसे बीमारी अथवा दीमक की उपमा दे सकते हैं. जिस तरह बीमारी के रोगाणु दिनोंदिन शरीर को क्षीण कर एक दिन समाप्त कर देते हैं. अहंकार भी उसी अनुरूप व्यक्ति को ऐसे नशे में मदहोश कर देता है वह व्यक्ति को न केवल सच्चाई से परे एक कल्पना लोक में ले जाता हैं बल्कि जीवन के लिए असमायोजन करने वाली विकट स्थितियों को भी जन्म दे देता हैं.जीवन में दुःख का पर्याय अहंकार ही हैं. व्यक्ति अपने अहम भाव के कारण सभी से स्वयं को श्रेष्ठ तथा हर क्षेत्र में ज्ञान, शक्ति से सम्पन्न मानने लगता हैं. वह इस नशे में इस हद तक डूबा रहता है कि दूसरों के ज्ञान, अनुभव, सलाह का उपयोग करने की कभी जरूरत ही नहीं समझता हैं. संसार में अनगिनत जीव है उनमें से सबसे कमजोर जीव में भी एक जबर्दस्त खूबी होती है वो है अनुकरण. जिसके सहारे वह अपनी क्षमता में वृद्धि करता जाता हैं. मगर अहंकारी इंसान कभी किसी के अनुकरण को स्वीकार नहीं करता हैं.जहाँ अहंकार का वास होता है वहां नम्रता, बुद्धि, विवेक, चातुर्य कोई गुण विद्यमान नहीं होगा. घमंड जिस इंसान पर हावी होता है वह सबसे पहला काम भी यही करता है कि अन्य गुणों का


प्रवेश न हो. व्यर्थ के अहं भाव के कारण उसकी नजर में हमेशा सब लोग नीचे एवं निम्न स्तर के होते हैं. वह सदैव दूसरों की राह में बाधाएं उत्पन्न कर प्रसन्नता पाता है तथा औरों को गिराकर अपनी राहे बनाता हैं.जैसे जैसे अहंकारी व्यक्ति का ओहदा बढ़ता जाता है उसी अनुरूप उसका दम्भ भी वृद्धि करने लगता हैं. सत्ता, धन आदि के नशे में इस कद्र मशगूल रहता है कि वह कभी कल्पना नहीं कर पाता है कि एक दिन उसका भी पतन होगा, जीवन में कठिनाईयाँ आएगी तथा उस समय उसके साथ खड़े होने वाला कोइ नहीं होगा. एक अभागे इंसान स्वरूप उन्हें एकांकी रहकर कष्टों के बीच जीवन यापन करते हुए अन्तः पतन को प्राप्त होना होगा. कितना भी अच्छे व्यक्तित्व वाला इंसान हो यदि वह अहंकारी है तो उसके समस्त गुण उस तरह धुंधले हो जाते है जिस तरह धधकते अंगारों पर जमी राख की परत अग्नि को धुंधला कर जाती हैं.हंकार युक्त इंसान को मानव जाति का सबसे तुच्छ प्राणी माना जाता हैं. वह अपने अहम भाव को बनाए रखने के लिए किसी पाप को करने से भी नहीं हिचकता हैं. व्यक्ति में स्व प्रशंसा से अह भाव का जन्म होता हैं तथा स्वयं को सबसे सर्वोच्च मान लेने की स्थिति में यह अपने उत्कृष्ट रूप में दीखता हैं. दूसरों के अधिकारों की परवाह न करते हुए अतिक्रमण करना समेत कई तरह के मानसिक विकार भी अहंकार के कारण ही पनपते हैं.दम्भ मृगतृष्णा की भांति है जिससे न उसकी प्यास शांत होती है न औरों की. अपनी तमाम कमजोरियों और दरकिनार कर हर क्षेत्र में स्वयं को पूर्ण मानने की भूल एक अहंकारी की प्रथम विशेषता कही जाती हैं. वह अपने बारें में कई गलत धारणाएं भी पाले रहता है जैसे वह बुद्धिमान है तथा औरों की कमियों व दोषों को ही हमेशा देखता रहता हैं. परनिंदा में उसे आनन्द की प्राप्ति होती हैं. यदि आपका कोई दोस्त अहंकारी है तो विश्वास कीजिए एक दिन आपकों उसकी तरफ से घृणा, द्वेष, क्रोध, प्रतिशोध इनमें से कोई एक तोफहा अवश्य मिलेगा. क्योंकि संकीर्ण स्वयं स्वयंभू मस्तिष्क केवल इसी तरह के विचारों को जन्म देता हैं.क्षमा, दया, करुणा, प्रेम, धैर्य, नम्रता, सादगी ये कुछ ऐसे गुण है जो प्रत्येक मानव में आंशिक रूप से हो यह अपेक्षा की जाती हैं मगर जहाँ अहंकार का घर होता है वहां इन समस्त मानवीय मूल्यों के लिए कोई जगह नहीं बसती हैं. वह व्यक्ति इन अमोघ रुपी औषधि से जीवन भर अपरिचित ही रहता हैं. जिसके कारण उसके अहं का स्वरूप दिन ब दिन उसे जकड़ता चला जाता हैं.यदि एक विवेकशील व्यक्ति चाहे तो अपने अहंकार को मिटा सकता है उस पर नियंत्रण पा सकता हैं. इससे पूर्व उन्हें यह स्वीकार करना होगा कि वह दम्भ में रहता हैं. जब तक गलती स्वीकार नहीं की जाएं उसमें सुधार की गुंजाइश न के बराबर होती हैं. अतः खुले ह्रदय से अपने अहं भाव को स्वीकार करिये तथा भविष्य में उसके दोहरान से बचने का प्रयास करे तो निश्चय ही हम अहंकार रुपी रावण से बच सकते हैं. हमारे हिन्दू धर्म ग्रंथों में कहा गया है क्षमा परमो धर्मः, अतः हमें उस इंसान से क्षमा मांग लेनी चाहिए जिसकों हमारे अहं भाव के कारण पीड़ा पहुंची हो.विनम्रता व्यक्तित्व का गहना होती हैं. इसकी शुरुआत अहंकार के अंत से ही होती हैं. जीवन में शान्ति और आनन्द के अनुभव तभी पाए जा सकते है जब हम विनम्र हो, हमें विनम्रता के आभूषण का वरण कर अपनी आंतरिक असीम शक्ति को जागृत करना होगा यदि हम ऐसा कर पाते है तो निश्चय ही समस्त तरह के मानसिक मनोविकारों से भी स्वयं को बचा सकते है तथा अपने खुशहाल जीवन की नीव रख सकते हैं।

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