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Sunday, September 6, 2020

श्रद्धा पूर्वक श्राद्ध का महत्व समझे..........

देवेश प्रताप सिंह राठौर 

(वरिष्ठ पत्रकार)

............. श्राद्ध का महत्व बहुत बड़ा है अपने  पूर्वजों की आत्मा के लिए उनकी आत्मा को शांति मिले ,भावार्थ है प्रेत और पित्त्तर के निमित्त, उनकी आत्मा की तृप्ति के लिए श्रद्धापूर्वक जो अर्पित किया जाए वह श्राद्ध है।हिन्दू धर्म में माता-पिता की सेवा को सबसे बड़ी पूजा माना गया है। इसलिए हिंदू धर्म शास्त्रों में पितरों का उद्धार करने के लिए पुत्र की अनिवार्यता मानी गई हैं। जन्मदाता माता-पिता को मृत्यु-उपरांत लोग विस्मृत न कर दें, इसलिए उनका श्राद्ध करने का विशेष विधान बताया गया है। भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन कृष्णपक्ष अमावस्या तक के सोलह दिनों को पितृपक्ष कहते हैं जिसमे हम अपने पूर्वजों की सेवा करते हैं।आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक ब्रह्माण्ड की ऊर्जा तथा उस उर्जा के साथ पितृप्राण पृथ्वी पर व्याप्त रहता है। धार्मिक ग्रंथों में मृत्यु के बाद आत्मा की स्थिति का बड़ा सुन्दर और वैज्ञानिक विवेचन भी मिलता है। मृत्यु के बाद दशगात्र और षोडशी-सपिण्डन तक मृत व्यक्ति की प्रेत संज्ञा रहती है। पुराणों के अनुसार वह सूक्ष्म शरीर जो आत्मा भौतिक शरीर छोड़ने पर धारण करती है प्रेत होती है। प्रिय के अतिरेक की अवस्था "प्रेत" है क्यों की आत्मा जो सूक्ष्म शरीर धारण करती है तब भी उसके


अन्दर मोह, माया भूख और प्यास का अतिरेक होता है। सपिण्डन के बाद वह प्रेत, पित्तरों में सम्मिलित हो जाता है।पितृपक्ष भर में जो तर्पण किया जाता है उससे वह पितृप्राण स्वयं आप्यापित होता है। पुत्र या उसके नाम से उसका परिवार जो यव (जौ) तथा चावल का पिण्ड देता है, उसमें से अंश लेकर वह अम्भप्राण का ऋण चुका देता है। ठीक आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से वह चक्र उर्ध्वमुख होने लगता है। 15 दिन अपना-अपना भाग लेकर शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से पितर उसी ब्रह्मांडीय उर्जा के साथ वापस चले जाते हैं। इसलिए इसको पितृपक्ष कहते हैं और इसी पक्ष में श्राद्ध करने से पित्तरों को प्राप्त होता है।पुराणों में कई कथाएँ इस उपलक्ष्य को लेकर हैं जिसमें कर्ण के पुनर्जन्म की कथा काफी प्रचलित है। एवं हिन्दू धर्म में सर्वमान्य श्री रामचरित में भी श्री राम के द्वारा श्री दशरथ और जटायु को गोदावरी नदी पर जलांजलि देने का उल्लेख है एवं भरत जी के द्वारा दशरथ हेतु दशगात्र विधान का उल्लेख भरत कीन्हि दशगात्र विधाना तुलसी रामायण में हुआ है।भारतीय धर्मग्रंथों के अनुसार मनुष्य पर तीन प्रकार के ऋण प्रमुख माने गए हैं- पितृ ऋण, देव ऋण तथा ऋषि ऋण। इनमें पितृ ऋण सर्वोपरि है। पितृ ऋण में पिता के अतिरिक्त माता तथा वे सब बुजुर्ग भी सम्मिलित हैं, जिन्होंने हमें अपना जीवन धारण करने तथा उसका विकास करने में सहयोग दिया।पितृपक्ष में हिन्दू लोग मन कर्म एवं वाणी से संयम का जीवन जीते हैं; पितरों को स्मरण करके जल चढाते हैं; निर्धनों एवं ब्राह्मणों को दान देते हैं। पितृपक्ष में प्रत्येक परिवार में मृत माता-पिता का श्राद्ध किया जाता है, परंतु गया श्राद्ध का विशेष महत्व है। वैसे तो इसका भी शास्त्रीय समय निश्चित है, परंतु ‘गया सर्वकालेषु पिण्डं दधाद्विपक्षणं’ कहकर सदैव पिंडदान करने की अनुमति दे दी गई है।अर्थात् जो अपने पितरों को तिल-मिश्रित जल की तीन-तीन अंजलियाँ प्रदान करते हैं, उनके जन्म से तर्पण के दिन तक के पापों का नाश हो जाता है। हमारे हिंदू धर्म-दर्शन के अनुसार जिस प्रकार जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु भी निश्चित है; उसी प्रकार जिसकी मृत्यु हुई है, उसका जन्म भी निश्चित है। ऐसे कुछ विरले ही होते हैं जिन्हें मोक्ष प्राप्ति हो जाती है। पितृपक्ष में तीन पीढ़ियों तक के पिता पक्ष के तथा तीन पीढ़ियों तक के माता पक्ष के पूर्वजों के लिए तर्पण किया जाता हैं। इन्हीं को पितर कहते हैं। दिव्य पितृ तर्पण, देव तर्पण, ऋषि तर्पण और दिव्य मनुष्य तर्पण के पश्चात् ही स्व-पितृ तर्पण किया जाता है। भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन कृष्णपक्ष अमावस्या तक के सोलह दिनों को पितृपक्ष कहते हैं। जिस तिथि को माता-पिता का देहांत होता है, उसी तिथी को पितृपक्ष में उनका श्राद्ध किया जाता है। शास्त्रों के अनुसार पितृपक्ष में अपने पितरों के निमित्त जो अपनी शक्ति सामर्थ्य के अनुरूप शास्त्र विधि से श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करता है, उसके सकल मनोरथ सिद्ध होते हैं और घर-परिवार, व्यवसाय तथा आजीविका में हमेशा उन्नति होती है। पितृ दोष के अनेक कारण होते हैं। परिवार में किसी की अकाल मृत्यु होने से, अपने माता-पिता आदि सम्मानीय जनों का अपमान करने से, मरने के बाद माता-पिता का उचित ढंग से क्रियाकर्म और श्राद्ध नहीं करने से, उनके निमित्त वार्षिक श्राद्ध आदि न करने से पितरों को दोष लगता है। इसके फलस्वरूप परिवार में अशांति, वंश-वृद्धि में रूकावट, आकस्मिक बीमारी, संकट, धन में बरकत न होना, सारी सुख सुविधाएँ होते भी मन असन्तुष्ट रहना आदि पितृ दोष हो सकते हैं। यदि परिवार के किसी सदस्य की अकाल मृत्यु हुई हो तो पितृ दोष के निवारण के लिए शास्त्रीय विधि के अनुसार उसकी आत्म शांति के लिए किसी पवित्र तीर्थ स्थान पर श्राद्ध करवाएँ। अपने माता-पिता तथा अन्य ज्येष्ठ जनों का अपमान न करें। प्रतिवर्ष पितृपक्ष में अपने पूर्वजों का श्राद्ध, तर्पण अवश्य करें। यदि इन सभी क्रियाओं को करने के पश्चात् पितृ दोष से मुक्ति न होती हो तो ऐसी स्थिति में किसी सुयोग्य कर्मनिष्ठ विद्वान ब्राह्मण से श्रीमद् भागवत् पुराण की कथा करवायें। वैसे श्रीमद् भागवत् पुराण की कथा कोई भी श्रद्धालु पुरुष अपने पितरों की आम शांति के लिए करवा सकता है। इससे विशेष पुण्य फल की प्राप्ति होती है। तथा एक बात मैं अपने विश्वास के साथ कह सकता हूं पितृपक्ष  का जो समय होता है,  माता पिता सपने में जरूर आते हैं यह मेरा स्वयं का विश्वास है। मैं अपने माजी, बाबूजी को सोचता रहता हूं यही कारण हो सकता है। परंतु कभी कदार सपने में मां-बाप आते हैं, परंतु यह पितृपक्ष में मैंने अनुभव किया है मैंने हमेशा अपने माता पिता को सपनों में मुझे आए और मैं सपने में बड़ा प्रसन्न महसूस करता था क्योंकि सपने में मां बाप मुझे बहुत कुछ ज्ञान की बातें बताते थे जॉन के जीवन काल में मां बाप बेटे के प्रति जो संबंध होते हैं और सब देखने के बाद जब सपना खुलता है तो फिर और एक सपना ही होता है। जिसे हम हकीकत समझ के देख रहे होते हैं जगने के बाद उसका रूप हकीकत से दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं होता है। मांजी बाबूजी कई जगह डांटते भी थे मां बीच में आ जाती थी, और बाबूजी को कहने लगती थी कि आप क्यों डांट रहे हो और इसी में मेरी जव आंख खुलती है। तब देखता हूं कि मैं बिस्तर पर हूं जो सपना हकीकत के रूप में देख रहा था वो एक सपना था बहुत विचलित करने वाला वह समय मुझे महसूस होता है। उसके बाद मुझे नींद नहीं आती मैं सोच विचार में पड़ जाता हूं। और बचपन के सारे समय मां-बाप के साथ वह बीते बचपन से युवास्कूल जाने तक के वह क्षण सब याद आते हैं। फिर मैं सोचता हूं इसी का नाम जीवन है हिम्मत को बांधता हूं। और अपने मां बाप से आशीर्वाद लेता हूं मांजी बाबूजी  हैं ,परंतु आपका बेटा हर समय आपके पास आत्मा से जुड़ा हुआ है। क्योंकि वह सब एक एक समय के साथ बचपन से लेकर आप के रहते समय पर सब बातें हैं जो आपका प्यार सब कुछ याद आता है, अच्छी तरह याद है। जो मुझे याद करके बहुत विचलित कर देते हैं। श्राद्ध के समय यह हकीकत है सपने में कुछ ऐसे लोग भी आ जाते हैं जो अपने परिवार के सदस्य हैं जो अब इस दुनिया में नहीं है। उन्हें भी सपने में पितृपक्ष में कभी-कभी जरूर आते हैं। पितृपक्ष का बहुत बड़ा महत्व है। इंसान को कभी नहीं भूलना चाहिए हमेशा अपने दायित्वों को परिवार के प्रति हमारी क्या जिम्मेदारी है पूर्ण रुप से पालन करना चाहिए, गया जाने की सोच रहा था कई वर्षों से परंतु नहीं जा सका इस वर्ष पूरा प्रोग्राम था गया जाकर अपने माता पिता एवं अपने पूर्वजों का गया में उनकी आत्मा को शांति के लिए जो वहां पर कराया जाता है वह करूंगा, गया जाने का प्रोग्राम था परंतु कोरोना वायरस संक्रमित समय में जाना संभव नहीं हो सका जब ईश्वर की इच्छा होगी अवश्य गया जाऊंगा और अपने माता पिता जी के वहां पर जाकर उन्हें अपने दायित्व को पूरा करने का  मन बना लिया है जीवन में सब कुछ हो परंतु मां बाप ना हो तो जीवन बहुत खाली-खाली लगता है। लेकिन एक बात यह भी सत्य है जीवन में किसी के मां बाप जीवन भर  नहीं बैठे रहते हैं मुझे पिताजी की मृत्यु के बाद में काफी परेशान था डिप्रेशन में चला गया था मुझे डॉक्टर द्वारा दवा लेनी पड़ी परंतु मेरे घर में मेरी मौसी मेरी मां बहुत प्यार करते थे मुझे समझाते बेटा किसी के मां बाप जिंदगी भर नहीं रहते हिम्मत वनाओ ऐसे कैसे चलेगा इस तरह हिम्मत तोड़ोगे जीवन बहुत बड़ा है, मैं  बाबूजी के ना रहने से मेरी मां ने मुझे बहुत संभाला मेरी मौसी ने मुझे बहुत प्यार किया और मुझे समझाया की यही सृष्टि का नियम है किसी के मां बाप जीवन भर नहीं रहते हैं, मौसीऔर मांजी ने कहां  हमारे भी मां-बाप नहीं है तो जीवन तो चलता है बेटा इसलिए हिम्मत रखो और दुखी रहोगे तो उनकी आत्मा की दुखी रहेगी इस तरह मेरी मां मौसी ने मुझे बहुत प्यार दिया मैं सब भूल गया था मां के प्यार से लेकिन मां की 2006 मेंमृत्यु के बाद मैं फिर डिप्रेशन चला गया था, लेकिन मैंने डिप्रेशन की दवा डॉक्टर से संपर्क करके ली क्योंकि मैं बहुत ही भावनात्मक लगाव था मैं इतना ज्यादा मां-बाप के साथ टच था जिस कारण मुझे उनकी कमी बहुत परेशान करने लगी क्योंकि उस समय के लिए मैं पूरी तरह तैयार नहीं हो सका था । मैंने कभी सोचा ही नहीं था एक दिन वह आएगा जब मेरे मां-बाप नहीं रहेंगे मेरे मन में एक तनिक भी विचार नहीं आया जिस कारण में अपने को मजबूत कर सकता अचानक वो दिन आया मैं बहुत परेशान यह सब देख कर बहुत ही चिंतित रहने लगा था ।मेरे परिवार ने जहां तक मेरी मां मेरी मौसी और मेरी बहन ने मुझे बहुत प्यार स्नेह दिया और मुझे उन्हीं की हिम्मत से मैं आज अपने  को मजबूत तो नहीं कह सकते लेकिन इतना मां-बाप के विश्वास में मुझे जीने का तरीका सिखा दिया है।

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