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Monday, September 7, 2020

किसानों के फिर साथी बनेंगे हीरा-मोती

खेती में बैलों का बढ़ने लगा चलन

अन्ना जानवरों से निजात में हो सकती है भारी कमी

फतेहपुर, शमशाद खान । भारतीय कृषि वर्तमान में एक बदलाव के दौर से गुजर रही है। कृषि में बढ़ती लागत के कारण लोग फिर से बैलों से कृषि कार्य करने लगे हैं। कृषि कार्य में मशीनीकरण से हट कर फिर से पशुओं के प्रयोग होने से किसानों की सबसे बड़ी समस्या ‘अन्ना जानवर’ काफी हद तक कम हो सकती है। कृषि में बढ़ती लागत से परेशान  किसानों ने फिर से पशुओं के प्रयोग से खेतों में जुताई का काम करना शुरू कर दिया है। बैल का भारत की कृषि और पशुपालन से चोली दामन का साथ रहा है, लेकिन आधुनिकता के दौर में लोग हल-बैल की जगह ट्रैक्टर से जुताई करने लगे थे। गांवों में पहले खेती में बैलों का उपयोग बहुतायत में था। किसानों के दरवाजों पर एक से बढ़ कर एक बैलों की जोड़ियां बंधी होती थी। बैल किसान की मुख्य पहचान था, परन्तु आधुनिकता ने उसे कुछ समय से पछाड़ दिया था। गाय और उसके उर्जावान बछड़े हर किसान के दरवाजे की शोभा बढ़ाते रहे हैं।

बैल से खेत की जुताई करता किसान।

कोरोना संकट काल में घर लौटे प्रवासियों की जेब खाली है तो घर पर रहकर खेती करने वाले भी बहुत कुछ नहीं जुटा पाए। कुछ फसल बारिश की भेट चढ़ गई तो काफी कुछ लाॅकडाउन की ज्वाला में भस्म हो गयी। इन परिस्थितियों में उनके पास न तो डीजल के लिए पैसे बचे और न ही ट्रैक्टर की मंहगी होती जुताई के लिए हिम्मत रह गई है। शायद इन्ही सब समस्याओं से जूझते हुए झूरी ने हीरा- मोती का दामन थाम लिया और निकल पड़े खेतों की ओर। ऐरायां ब्लाक के आलमतारा गांव के किसान राजू मौर्या कुछ समय पहले बाहर रहकर कमाई करते थे। बाहर कमाई के दौरान बचत न कर पाने की वजह से अपने गांव वापस आ गए थे। इसके बाद महामारी की ऐसी मार पड़ी कि एक-एक रूपये को मोहताज हो गए। पास में पैसों की समस्या को देखते हुए इन्होंने अपने छुट्टा हीरा-मोती का सहारा लिया और खेतों की जुताई में जुट गए। इसी प्रकार बैलों की मदद से खेतों में जुताई करने वाले कुछ नामचीन किसानों ने बैलों से दोस्ती कर जुताई की विधि को लाभकारी बताया है। क्षेत्र के किसान बचान, उदयभान व विजेन्द्र सिंह कहते हैं कि एक बार ट्रैक्टर से एक बीघा की जुताई कराने में डेढ़ हजार रूपये लगते हैं। ऐसे में बैल बहुत काम आ रहे हैं। जुताई के खर्च के बराबर बैलों का एक महीने का दाना-पानी आ रहा है। संकट की इस घड़ी में किसान छुट्टा बैलों को भी खूंटे में बांधकर चारा-पानी देने लगे हैं। किसानों के बदलते विचारों से न सिर्फ बैलों से खेती को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि खेतों की उर्वरा शक्ति बढ़ाने के लिये गोबर की खाद भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध रहेगी। इससे रासायनिक खाद का प्रयोग कम होगा और रासायनिक खाद से तैयार होने वाली फसल से मानव जीवन के स्वास्थ्य पर पड़ने वाला दुष्प्रभाव की कमजोर पडेगा।

नोट- ऊपर वाली खबर का बाक्स 

बाक्स नं0 1

जिले में कुल गोशालायें- 18

तहसील व ग्रामीण क्षेत्र की गाय- 38117

शहरी क्षेत्र में गाय- 1391

शहरी व ग्रामीण क्षेत्र की मिलाकर कुल गाय- 39508

ग्रामीण क्षेत्रों में बैल व सांड- 12098

शहरी क्षेत्र में बैल व सांड- 114

शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में मिलाकर कुल बैल व सांड- 12212

कुल गौवंश गांव व शहर में- 51720

बाक्स नं0 2

खागा तहसील क्षेत्र की गौशाला में गौवंश

रोशनपुर टेकारी: नर-1 मादा-29

विक्रमपुर: नर-19 मादा-21

अंजनाभैरों: नर-8 मादा-18

उकाथू: नर-9 मादा-26

नहवइया हथगाम: नर-37 मादा-98

गौशाला में कुल नर-74

गौशाला में कुल मादा-192


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