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Monday, September 28, 2020

सोचने और करने का अंतर!

 कलमकारों / रचनाकारों से संवाद -11 (कमलेश कमल)

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क्या पर्याप्त ज्ञान और सर्जनात्मक अभिरुचि होने के बावजूद आप अपने विचारों को एकत्रित कर ठीक से अभिव्यक्त नहीं कर पा रहे हैं? अगर ऐसा है तो, यह आलेख आपके लिए ही है। 

 ऐसा देखा जाता है कि विषय वस्तु की अच्छी पकड़, विश्लेषण करने और लिखने की अच्छी क्षमता के बीच भी कभी-कभी रचनात्मकता खोने सी लगती है। इसका मूल कारण मस्तिष्क के विभिन्न पहलुओं व बौद्धिक क्षमताओं का रचनात्मकता से समन्वय नहीं होना है। 

 ऐसी स्थितियों को ग़ौर से देखने पर पता चलता है कि बाक़ी सभी कारकों की उपस्थिति के बावजूद भी लेखक या रचनाकार अपने मन में स्पष्ट रूप-रेखा नहीं बना पाता। उदाहरण के लिए, अगर किसी कुशल चित्रकार को एक लड़की की तस्वीर बनानी है तो आसानी से बना सकता है; लेकिन उसके मन में यही स्पष्ट नहीं है कि वह कैसी लड़की की तस्वीर बनाना चाहता है, कब बनाना चाहता है, किस आकार-प्रकार की बनाना चाहता है। यह एक ऊहापोह की स्थिति होती है, जिसे लेखकीय अवरोध (writer's block) आदि का नाम दे दिया जाता है।


इसे समझने के लिए पहले थोड़ा मानव-मन को समझना होगा। सभ्यता के इस दौर में वर्तमान मानव को एक उन्नत मस्तिष्क मिला हुआ है , जिसका कोर्टेक्स सच ही बहुत अद्भुत होता है। सोचकर विस्मय होता है कि मानव मस्तिष्क में लगभग 10 अरब मस्तिष्क कोशिकाएं या न्यूरॉन्स होती हैं। 

इनमें से हर न्यूरॉन अपनी संरचना में विशिष्ट होता है। इनके अंदर विद्युत रसायन मिश्रण (electro chemical mixture) और माइक्रो डाटा प्रॉसेसिंग ट्रान्समिशन सिस्टम होता है। अब ये न्यूरॉन्स आपस में इस तरह जुड़े होते हैं कि क्षण भर में ही सूचना और अनुभूतियों को एक  से दूसरे तक पहुँचा देते हैं। 

देखा जाए तो इस 10 अरब न्यूरॉन्स वाले मानव मस्तिष्क की क्षमता का सही आकलन अभी तक नहीं हो पाया है। हाँ, इतना तय है कि मानव मस्तिष्क में सोचने, याद करने, समस्या सुलझाने, कुछ रचनात्मक करने या फिर विश्लेषण करने की अद्भुत क्षमता होती है।

आधुनिक शोधों से यह भी पता लगा है की मस्तिष्क रेखीय गति में कार्य नहीं करता। यह कई दिशाओं में अपने विचारों का विकिरण करता है। इन बिखरे विचारों में से कुछ को छोड़ने और कुछ को जोड़ देने की क्षमता बहुत विशिष्ट है। सिर्फ़ एक विचार नहीं पकड़ना है, एक जैसे विचारों को पकड़ना है। 

जब हम कुछ विचारों को छोड़ देते हैं और कुछ विचारों को आपस में जोड़ देते हैं, तो स्पष्टता आ जाती है। इस सुयोग से लेखन, गायन या चित्रण में एक लय, एक सुसंबद्धता आती है। अगर विचार ही कड़वत रूप में नहीं जुड़े हैं, तो पैराग्राफ कैसे जुड़ेंगे?

इस तरह देखा जाए तो जिसमें जितनी स्पष्टता होगी, वह उतनी ही मात्रा में सुसंगत लेखन कर सकेगा।  वस्तुतः, जब हम ठान लेते हैं कि हमें लिखना ही है, चित्र बनाना ही है या कोई अन्य कार्य करना ही है, तो मस्तिष्क हमें यह मदद करता है कि कुछ असंबद्ध विचारों को पटल से हटा देता है। 

थोड़ी देर के लिए मानते हैं कि आपके मन में तीन ख्याल हैं  : 1.आज शाम पीवीआर में सिनेमा देखना है । 2. आज क्रिकेट मैच देखना है। 3. आज  बच्चे के साथ खेलना है। 

अब, अगर आप घर से निकल पड़े हैं -सिनेमा हॉल की तरफ;  तो आपका मस्तिक बच्चे के साथ खेलना और क्रिकेट मैच से जुड़े बहुत सारे विचारों को हटा देता है। ऐसे में  आपके मुख्य पटल पर अब यह है कि टिकट कैसे मिले, सीट कौन सी मिले, कितने बजे पहुँचना है आदि । 

इस घटना को लेखन के संदर्भ में देखें! जब आप यह तय कर लेते हैं कि आपको लिखना ही है, तो बहुत सारे असम्बद्ध विचारों को आपके मन से आपका मस्तिष्क हटा देता है। अब, जबकि आप यह तय करते हैं कि आपको किस विषय पर लिखना है, तो कुछ और चीजें आपका मस्तिष्क आपके पटल से हटा देता है। इस तरह आप लेखन की ओर अग्रसर होते हैं। 

लगातार लिखने से न्यूटन द्वारा दिया गया ‘गति का पहला नियम’ आपके साथ होता है और आप आगे बढ़ते जाते हैं। रुके रहने और नहीं लिखने से भी न्यूटन का पहला नियम या ‘जड़त्व का नियम’ आपके साथ आता है ..और आप नहीं लिख पाते हैं। तो, लगातार श्रम, और एक जैसे बिखरे विचारों को संकेंद्रित कर हम सफल हो सकते हैं। सारतः, हम जो सोचते हैं, वही होने लगता है।जिस दिशा में सोचते और करते हैं, उसी दिशा में प्रगति होती है। चुनाव आपका है !


आपका ही,

कमल

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