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Saturday, September 5, 2020

कानपुर टीचर्स डे विशेष:- एक गुरु ऐसा भी

अलग-अलग देशों में शिक्षक दिवस अलग-अलग तारीखों पर मनाये जाते हैं। भारत में यह भूतपूर्व राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्म दिन 5 सितंबर को मनाया जाता है।

विश्व शिक्षक दिवस (अंग्रेज़ी:World Teacher's day) 5 सितम्बर  को मनाया जाता है इस दिन आध्यापकों को सामान्य रूप से और कतिपय कार्यरत एवं सेवानिवृत्त शिक्षकों को उनके विशेष योगदान के लिये सम्मानित किया जाता है।

इसे संयुक्त राष्ट्र द्वारा साल 1966 में यूनेस्को और अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की हुई उस संयुक्त बैठक को याद करने के लिये मनाया जाता है जिसमें अध्यापकों की स्थिति पर चर्चा हुई थी और इसके लिये सुझाव प्रस्तुत किये गये थे।


अतः इसे 1994 के बाद से प्रतिवर्ष लगभग सौ से अधिक देशों में मनाया जा रहा है और इस प्रकार वर्ष 2020में यह 26वाँ विश्व शिक्षक दिवस होगा। 

कानपुर संवाददाता गौरव शुक्ला:- आप सभी को बताते चले आज कानपुर में विपिन निगम किसी परिचय के मोहताज नहीं है उन्होंने कानपुर का तो नाम रोशन किया है साथ ही अपनी एक अलग पहचान बनाई मात्र 3 वर्षों की आयु से ही स्टेज में परफॉर्मेंस के साथ 11 वर्ष की आयु तक उन्होंने सैकड़ों पुरस्कार  भी हासिल किए एक नहीं दो नहीं पूरे सात नृत्य विधाओं के ज्ञाता है जिसमें से दो शास्त्रीय नृत्य कथक और भरतनाट्यम में प्रभाकर और विशारद की तीनों महाविद्यालयों से डिग्री प्राप्त है भरतनाट्यम डॉ0 सुचेता खन्ना और कत्थक की आचार्य मंजुला निगम से नृत्य की पूर्ण शिक्षा ली साथ ही भाव संगीत और तबले की शिक्षा रुचि द्विवेदी से ली 

कानपुर  80% स्कूलों में नृत्य की शिक्षा दे रहे विपिन पूरे भारत में 150 से अधिक स्टेज शो कर चुके हैं साथ ही कानपुर के बहुत फेमस डांडिया डांसर है लगभग सभी समाजों व क्लबों में नृत्य का हुनर दिखा चुके हैं एवं निर्णायक के रूप में भी रहे हैं इनकी सबसे बड़ी उपलब्धि कत्थक के पंडित बिरजू महाराज और भरतनाट्यम के जो श्री चंद्रशेखर का आशीर्वाद एवं उनके साथ स्टेज शेयर करना है साथ ही कानपुर में संगीत करा रहे हैं इनकी अभिलाषा है कि वह एक विद्यालय खोले जहां नृत्य प्रेमियों को निशुल्क शिक्षा दें और नृत्य कला को आगे बढ़ाएं


साथ ही विपिन निगम ने बताया नृत्य एक कला ही नहीं एक व्यवसाय बन गई है पहले यह कला बहुत ही कम लोगों को आती थी नृत्य कला पुराने समय में एक विशेष स्थान रखती थी इससे सीखने के लिए दूर दूर जाना पड़ता था और घराने ढूढ़ने पड़ते थे गुरु व शिष्य की एक ऐसी पदवी हुआ करती थी जो अब खत्म होती जा रही है  इस कला का रूप अब व्यवसाय में बदल चुका है  जिसे पुराने समय में कठिन साधना समझा जाता था उसे आज के युग में यूट्यूब व गूगल के माध्यम से सीखाना अत्यधिक आसान हो चुका है जो कि बिल्कुल गलत है इसे देखकर व्यक्ति कुछ समय के लिए तो कर सकता है पर इससे ज्ञान नही प्राप्त होता

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